समाज में ‘शुद्धीकरण’ की राजनीति कब तक?

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राजनीतिक असहमति को ‘शुद्ध-अशुद्ध’ की भाषा में बदलना लोकतंत्र और सामाजिक सद्भाव के लिए गंभीर खतरा

सौरभ वार्ष्णेय

समाज में बदलाव एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। समय के साथ विचार, मान्यताएं और सामाजिक संबंध भी बदलते हैं। कोई समाज तभी जीवंत माना जाता है, जब वह अपने भीतर सुधार की गुंजाइश रखता हो। लेकिन जब बदलाव की प्रक्रिया को ‘शुद्ध’ और ‘अशुद्ध’ की कसौटी पर परखा जाने लगे, तब मामला केवल सामाजिक सोच तक सीमित नहीं रहता। वह लोकतंत्र, संविधान और सामाजिक सद्भाव से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।

कांग्रेस अध्यक्ष एवं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के उत्तराखंड के हल्द्वानी में आयोजित कार्यक्रम के बाद कथित रूप से ‘शुद्धीकरण’ किए जाने की घटना इसी चिंताजनक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। किसी राजनीतिक नेता की उपस्थिति के बाद किसी स्थान का शुद्धीकरण करना केवल धार्मिक या व्यक्तिगत आस्था का विषय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब ऐसा कदम सार्वजनिक एवं राजनीतिक संदर्भ में उठाया गया हो।

लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन राजनीतिक असहमति को सामाजिक या धार्मिक ‘शुद्ध-अशुद्ध’ की भाषा में बदल देना निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

आस्था का अधिकार, अपमान का नहीं

सवाल यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को अपनी धार्मिक परंपराओं में विश्वास करने का अधिकार है या नहीं। संविधान प्रत्येक नागरिक को आस्था और धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक विरोधी की मौजूदगी को किसी स्थान या समाज को ‘अशुद्ध’ करने वाला मानना लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है?

यदि राजनीति में असहमति का जवाब तर्क और संवाद के बजाय शुद्धीकरण से दिया जाने लगे, तो यह स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के लिए शुभ संकेत नहीं है।

भारत की पहचान किसी एक धर्म, भाषा, जाति, संस्कृति अथवा विचारधारा से नहीं बनी। इसकी असली शक्ति विविधता में है। अलग-अलग आस्थाओं, परंपराओं, भाषाओं और जीवन-पद्धतियों के लोग सदियों से यहां साथ रहते आए हैं। यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता और शक्ति है।

‘शुद्धीकरण’ जैसे शब्दों का राजनीतिक इस्तेमाल इसलिए सावधान करता है। जब किसी व्यक्ति, समुदाय या विचारधारा को श्रेष्ठ और दूसरे को निम्न मानने की प्रवृत्ति मजबूत होती है, तब समाज में दूरियां बढ़ती हैं। इसकी शुरुआत प्रतीकों और शब्दों से होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह मानसिकता सामाजिक व्यवहार में उतरने लगती है। एक वर्ग दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखने लगता है और नागरिकों की साझा पहचान पीछे छूट जाती है।

सुधार और शुद्धीकरण में अंतर

सामाजिक सुधार और कथित सामाजिक शुद्धीकरण के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कुरीतियों, भेदभाव और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना सामाजिक सुधार है। शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और समानता को बढ़ावा देना सुधार है। लेकिन किसी व्यक्ति अथवा समुदाय को उसकी पहचान के आधार पर ‘शुद्ध’ या ‘अशुद्ध’ मानना सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक विभाजन की शुरुआत है।

राजनीति में पहचान का इस्तेमाल नया नहीं है। चुनावों के दौरान जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दे अक्सर भावनात्मक रूप ले लेते हैं। राजनीतिक दलों के लिए ऐसे मुद्दे तत्काल समर्थन जुटाने का आसान माध्यम हो सकते हैं, मगर चुनावी लाभ के लिए समाज में पैदा की गई दूरी का मूल्य अंततः पूरे समाज को चुकाना पड़ता है।

रोजगार की तलाश कर रहे युवा, महंगाई से परेशान परिवार, बेहतर शिक्षा की उम्मीद लगाए विद्यार्थी, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे नागरिक और अपनी उपज के उचित मूल्य की प्रतीक्षा कर रहे किसान—इनकी समस्याओं का कोई धर्म या जाति नहीं होती। बेरोजगारी, महंगाई और बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था प्रत्येक नागरिक को प्रभावित करती है। फिर राजनीति का केंद्र इन वास्तविक समस्याओं के बजाय पहचान की ‘शुद्धता’ क्यों बनने लगे?

विरोध का जवाब विचार से हो

लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि वह असहमति को कितनी जगह देता है। किसी नेता से असहमति हो सकती है, किसी पार्टी की नीतियों का विरोध किया जा सकता है और किसी विचारधारा को गलत माना जा सकता है। लेकिन विरोध की भाषा लोकतांत्रिक होनी चाहिए। तर्क का जवाब तर्क से और विचार का जवाब विचार से दिया जाना चाहिए।

किसी व्यक्ति को सामाजिक या धार्मिक रूप से ‘अशुद्ध’ ठहराने की कोशिश लोकतांत्रिक बहस को कमजोर करती है। इस प्रवृत्ति का एक खतरनाक पहलू यह भी है कि शुद्धीकरण की सीमा तय करना कठिन होता है। आज निशाने पर कोई राजनीतिक नेता है, कल कोई समुदाय हो सकता है। आज किसी के धर्म अथवा खान-पान पर प्रश्न उठाया जा रहा है, कल किसी की भाषा, वेशभूषा या विचारधारा को कसौटी पर कसा जा सकता है।

यदि समाज ने ऐसी प्रवृत्तियों को सामान्य मान लिया, तो असहिष्णुता धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन जाएगी।

नेताओं और मीडिया की जिम्मेदारी

राजनीतिक दलों और नेताओं की जिम्मेदारी सबसे अधिक है। सत्ता हासिल करना लोकतांत्रिक राजनीति का लक्ष्य हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की गरिमा बनाए रखना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय नेताओं के शब्दों और व्यवहार का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। इसलिए सभी दलों को ऐसे प्रतीकों, बयानों और गतिविधियों से बचना चाहिए, जो नागरिकों के बीच भय, घृणा या अविश्वास पैदा करें।

मीडिया की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। पत्रकारिता का दायित्व किसी घटना को केवल सनसनी में बदलना नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी मानसिकता पर सवाल उठाना भी है। आखिर ‘शुद्धीकरण’ की आवश्यकता किस आधार पर महसूस की गई? क्या राजनीतिक विरोध अब सामाजिक दूरी का कारण बनने लगा है? क्या ऐसी राजनीति के कारण जनता की वास्तविक समस्याएं पीछे नहीं छूट रही हैं?

सोशल मीडिया के दौर में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। एक उत्तेजक बयान कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। अफवाह और तथ्य के बीच अंतर करना लगातार कठिन होता जा रहा है। ऐसे में नागरिकों का दायित्व है कि वे किसी भी भड़काऊ सामग्री को सत्यापन के बिना आगे न बढ़ाएं। लोकतंत्र केवल नेताओं और दलों से नहीं चलता; नागरिकों का विवेक भी उसकी मजबूत नींव है।

भावी पीढ़ियों को कैसा भारत देंगे?

भारत की आने वाली पीढ़ी को ऐसा समाज चाहिए, जहां किसी बच्चे के अवसर उसके धर्म या जाति से तय न हों। जहां किसी युवा को उसके नाम अथवा पहचान के आधार पर रोजगार से वंचित न किया जाए। जहां किसी नागरिक की देशभक्ति उसके खान-पान, पहनावे या विचारों से नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक कर्तव्यों और नागरिक आचरण से आंकी जाए।

राजनीतिक असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। यदि हर विरोधी को दुश्मन और प्रत्येक असहमति को अपवित्र मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित होकर रह जाएगा। लोकतंत्र का अर्थ केवल बहुमत की सरकार नहीं, बल्कि अल्पमत और असहमति के सम्मान की संस्कृति भी है।

राजनीतिक दलों को अपना एजेंडा दोबारा जनता की वास्तविक समस्याओं पर केंद्रित करना होगा। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, किसानों की आय, महिला सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, पर्यावरण और आर्थिक अवसर राजनीति की प्राथमिकता बनने चाहिए। राजनीति का लक्ष्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं।

संविधान ही इसका उत्तर

शुद्धीकरण की राजनीति का जवाब किसी दूसरी विभाजनकारी राजनीति से नहीं दिया जा सकता। इसका उत्तर संविधान, समानता, संवाद और सामाजिक सद्भाव में है। भारत की आत्मा विविधता को स्वीकार करने में है, किसी एक पहचान को दूसरे पर थोपने में नहीं।

सवाल केवल यह नहीं है कि समाज में शुद्धीकरण की राजनीति कब तक चलेगी। बड़ा सवाल यह है कि हम कब तय करेंगे कि राजनीतिक विरोध को सामाजिक वैमनस्य में बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

राजनीति आती-जाती रहेगी, सरकारें बदलती रहेंगी और चुनाव होते रहेंगे, लेकिन समाज को चुनावों के बाद भी साथ रहना है। इसलिए राजनीतिक भाषा और प्रतीकों के दूरगामी प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना होगा।

लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या समुदाय को ‘शुद्ध’ करने की आवश्यकता नहीं होती। आवश्यकता विचारों को परिष्कृत करने, व्यवस्था को बेहतर बनाने तथा समाज में न्याय और समानता को मजबूत करने की है। राजनीति यदि वास्तव में जनसेवा है, तो उसका लक्ष्य समाज का कथित शुद्धीकरण नहीं, बल्कि उसे न्यायपूर्ण, शिक्षित, सुरक्षित, समतामूलक और समृद्ध बनाना होना चाहिए। यही लोकतंत्र की मर्यादा और भारत की विविधता की वास्तविक शक्ति है।

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Author: Bharat Sarathi

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