तकनीक ने जिंदगी आसान बनाई, लेकिन स्क्रीन में सिमटती दिनचर्या ने सहज मेल-जोल और आत्मीय संवाद को कमजोर किया
डॉ. विजय गर्ग
हम असाधारण सुविधाओं के युग में जी रहे हैं। आज घर से बाहर निकले बिना किराना, कपड़े, दवाइयां और किताबें मोबाइल फोन के कुछ क्लिक से मंगाई जा सकती हैं। हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से बात करना और दुनिया के किसी कोने की घटना को तुरंत देखना संभव है। सचमुच, बाजार हमारे घर और दुनिया हमारी हथेली में आ गई है।
लेकिन इस सुविधा के साथ एक विडंबना भी जुड़ी है। जैसे-जैसे डिजिटल संपर्क बढ़ रहे हैं, वास्तविक और आत्मीय रिश्तों के लिए समय कम होता दिखाई दे रहा है।
एक समय बाजार जाना केवल सामान खरीदना नहीं था। वहां पड़ोसियों से मुलाकात होती, दुकानदार से बातचीत होती और परिचित लोगों का हालचाल पूछा जाता था। बच्चे गलियों और पार्कों में मिलकर खेलते तथा परिवार और रिश्तेदार बिना किसी पूर्व सूचना के एक-दूसरे के घर पहुंच जाते थे। बातचीत के लिए किसी नोटिफिकेशन या स्क्रीन की जरूरत नहीं होती थी।
आज व्यक्ति घर के एक कमरे में बैठकर भोजन मंगा सकता है, पढ़ाई और कार्यालय का काम कर सकता है, खरीदारी तथा मनोरंजन कर सकता है और संदेशों के माध्यम से लोगों से संपर्क भी बनाए रख सकता है। तकनीक ने हमारा समय बचाया है, लेकिन प्रश्न यह है कि उस बचे हुए समय का उपयोग किस प्रकार हो रहा है?
अक्सर परिवार के साथ बातचीत करने, मित्रों से मिलने और रिश्तों को मजबूत बनाने के बजाय वही समय भी स्क्रीन के सामने बीतने लगता है।
मोबाइल हमें सैकड़ों लोगों से जोड़ सकता है, लेकिन किसी अपने के पास बैठकर की गई आत्मीय बातचीत की गर्माहट नहीं दे सकता। संदेश सूचना पहुंचा सकता है, मगर आमने-सामने के संवाद जैसी भावनात्मक गहराई उसमें हमेशा संभव नहीं होती। वीडियो कॉल उपयोगी है, लेकिन प्रिय व्यक्ति के साथ टहलने, भोजन करने या कुछ पल चुपचाप बैठने का विकल्प नहीं बन सकती।
मानवीय रिश्ते समय, ध्यान और वास्तविक उपस्थिति से मजबूत होते हैं।
समस्या तकनीक नहीं, बल्कि उसका असंतुलित उपयोग है। तकनीक ने शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और व्यापार के क्षेत्र में अपार अवसर दिए हैं। ऑनलाइन सेवाएं बुजुर्गों, दिव्यांगजनों और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं। इसलिए तकनीक को अस्वीकार करना समाधान नहीं है। आवश्यकता उसके विवेकपूर्ण और संतुलित उपयोग की है।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सुविधा धीरे-धीरे हमें अकेलेपन की ओर न ले जाए। हर बात संदेश से कहने के बजाय कभी स्वयं जाकर मिलना चाहिए। सोशल मीडिया पर लगातार स्क्रॉल करने के स्थान पर परिवार के साथ बैठकर बातचीत करनी चाहिए। हर वस्तु घर मंगाने के बजाय कभी पास की दुकान तक पैदल जाना, पड़ोसी का अभिवादन करना और पार्क में कुछ समय बिताना भी आवश्यक है।
कभी-कभी चले गए कुछ कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
घर से बाहर निकलकर चलना केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि वास्तविक दुनिया से जुड़ने का माध्यम भी है। किसी पड़ोसी का अभिवादन, मित्र से कुछ मिनट की बातचीत या परिवार के साथ बिताया गया समय अपनापन बढ़ाता है। यह वह भावना है, जिसे कोई ऐप पूरी तरह प्रदान नहीं कर सकता।
विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को वास्तविक दुनिया में लोगों से मिलने-जुलने के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। मित्रता केवल लाइक, इमोजी और संदेशों से नहीं बनती। वह साझा अनुभवों, सहयोग, मतभेदों, बातचीत और हंसी-मजाक से विकसित होती है। ऐसे अनुभव बच्चों में सहानुभूति, संवाद-कौशल और भावनात्मक समझ पैदा करते हैं।
आज हमारे घरों में बाजार, कार्यालय, कक्षा और मनोरंजन का संसार मौजूद है। मोबाइल में पूरी दुनिया समाई हुई है, लेकिन मनुष्य को केवल सुविधा और इंटरनेट कनेक्शन की आवश्यकता नहीं होती।
उसे साथ चाहिए।
उसे संवाद चाहिए।
उसे ऐसे रिश्ते चाहिए, जिनका मूल्य स्क्रीन टाइम, फॉलोअर्स या नोटिफिकेशन की संख्या से तय न हो।
तकनीक का उद्देश्य मनुष्यों को करीब लाना होना चाहिए, उन्हें अनजाने में एक-दूसरे से दूर करना नहीं। आधुनिक युग की सबसे बड़ी चुनौती केवल इंटरनेट से जुड़े रहना नहीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़े रहना भी है।
इसलिए कभी-कभी फोन को एक तरफ रखकर घर का दरवाजा खोलना और कुछ कदम बाहर निकलना जरूरी है। बाजार भले घर में आ गया हो और दुनिया हाथ में समा गई हो, लेकिन सार्थक रिश्तों के लिए आज भी स्वयं उपस्थित होना पड़ता है।
तो क्यों न आज कुछ कदम चलकर किसी अपने, पड़ोसी या मित्र से दिल खोलकर बातचीत की जाए?









