सैटेलाइट मैपिंग, जलाशय और इंजेक्शन ट्यूबवेल की योजना पर जोर
सवाल बरकरार—वर्षों के खर्च और बैठकों के बाद भी जिम्मेदारी तय क्यों नहीं?
गुरुग्राम, 2 सितंबर। केंद्रीय राज्य मंत्री एवं गुरुग्राम के सांसद राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि शहर में जलभराव का स्थायी समाधान केवल पंप लगाकर पानी निकालने से नहीं होगा। इसके लिए प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बहाल करने के साथ वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
राव इंद्रजीत सिंह ने बुधवार को पीडब्ल्यूडी विश्रामगृह में गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण, नगर निगम, जिला प्रशासन और हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर जलभराव की स्थिति की समीक्षा की। बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने प्रभावित नागरिकों के प्रति खेद जताया। इस दौरान विधायक मुकेश शर्मा और भाजपा जिला अध्यक्ष सर्वप्रिय त्यागी भी उपस्थित रहे।
अनियोजित विकास को बताया समस्या का कारण
केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि पिछले दो दशकों में गुरुग्राम का तेजी से विकास हुआ, लेकिन इस प्रक्रिया में अनेक स्थानों पर प्राकृतिक नदी-नालों और जल प्रवाह के रास्तों के साथ छेड़छाड़ हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2004 से 2012 के बीच लाइसेंस देते समय कई प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों को भी विकास क्षेत्र में शामिल कर लिया गया। बाद में हुए निर्माण और नालों में डाले गए निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट ने समस्या को और गंभीर बनाया।
पुराने जलमार्गों की होगी सैटेलाइट मैपिंग
उन्होंने बताया कि प्राकृतिक नदी-नालों और पुराने जल प्रवाह मार्गों की पहचान के लिए सैटेलाइट मैपिंग कराने पर काम किया जाएगा। जिन स्थानों पर इमारतों या अन्य निर्माण के कारण पुराने रास्ते बहाल करना संभव नहीं होगा, वहां भूमिगत बड़ी पाइपलाइन जैसे वैकल्पिक तकनीकी उपाय अपनाए जा सकते हैं।
तकनीकी और वैज्ञानिक समाधान तैयार करने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा अन्य विशेषज्ञ संस्थानों की सहायता लेने पर भी जोर दिया गया है।
खाली सरकारी जमीन पर बनेंगे जलाशय
राव इंद्रजीत सिंह ने कहा कि सरकारी एजेंसियों की अनुपयोगी जमीनों की पहचान कर वहां जलाशय विकसित किए जा सकते हैं। जलभराव वाले क्षेत्रों में तकनीकी रूप से उपयुक्त स्थानों पर इंजेक्शन ट्यूबवेल लगाने की संभावना भी तलाशी जाएगी। हालांकि भूजल में दूषित पानी पहुंचने से रोकने के लिए पानी का उपचार और उसकी गुणवत्ता की निगरानी जरूरी होगी।
उन्होंने जल प्रबंधन के लिए तीन प्राथमिकताएं बताईं—वर्षा जल का अधिकतम भूजल पुनर्भरण, जलाशयों का विकास तथा प्राकृतिक नालों और निकासी मार्गों की सफाई एवं पुनर्बहाली।
गिरते भूजल स्तर पर चिंता
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि गुरुग्राम में भूजल का दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण से कहीं अधिक है। उनके अनुसार वर्ष 2000 के आसपास भूजल स्तर करीब 18.8 मीटर था, जो वर्ष 2025 तक कई क्षेत्रों में लगभग 38.5 मीटर की गहराई तक पहुंच गया। उन्होंने परियोजनाओं की निरंतर निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए तकनीक आधारित व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया।
जनता के सवाल
केंद्रीय मंत्री ने जलभराव के कारण और समाधान तो गिनाए, लेकिन बैठक के बाद किसी परियोजना की समयसीमा, अनुमानित खर्च और जिम्मेदार अधिकारी के बारे में स्पष्ट घोषणा सामने नहीं आई। गुरुग्राम में करीब तीन दशकों से अनियोजित निर्माण, प्राकृतिक नालों पर अतिक्रमण और जल निकासी मार्ग बाधित होने की शिकायतें उठती रही हैं। सवाल है कि इन अनियमितताओं के लिए अब तक कितने अधिकारियों, योजनाकारों, लाइसेंस देने वाली एजेंसियों अथवा निर्माणकर्ताओं की जिम्मेदारी तय की गई?
जल निकासी और वर्षा जल प्रबंधन के नाम पर वर्षों से योजनाएं बन रही हैं तथा बड़ी धनराशि खर्च हो चुकी है। इसके बावजूद हर तेज बारिश के बाद शहर की सड़कें जलमग्न हो जाती हैं। बुधवार की बैठक में यह समीक्षा भी होनी चाहिए थी कि पिछली योजनाएं अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दे सकीं, कितना पैसा खर्च हुआ और विफलता के लिए कौन जवाबदेह है।
सैटेलाइट मैपिंग, जलाशय और इंजेक्शन ट्यूबवेल उपयोगी उपाय हो सकते हैं, लेकिन जनता को अब केवल नई योजना नहीं, बल्कि समयबद्ध कार्ययोजना, सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट और जवाबदेही चाहिए। जब तक गलती करने वालों पर कार्रवाई और काम पूरा करने की निश्चित समयसीमा घोषित नहीं होगी, ऐसी बैठकों को लेकर नागरिकों का भरोसा बहाल होना कठिन है।








