सभी दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों और प्रमुख सामाजिक संगठनों को शामिल करने की मांग
कहा—अनुसूचित जाति वर्ग के तीन सांसदों की उपेक्षा करना भेदभावपूर्ण
चंडीगढ़, 1 सितंबर। सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने संत शिरोमणि गुरु रविदास जी के 650वें प्रकाश पर्व के उपलक्ष्य में हरियाणा सरकार द्वारा गठित ‘श्री गुरु रविदास जी समरसता संकल्प अभियान’ की राज्यस्तरीय समिति के स्वरूप पर आपत्ति जताई है। उन्होंने सरकार से समिति का पुनर्गठन कर इसमें सभी राजनीतिक दलों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों और प्रमुख सामाजिक संगठनों को शामिल करने की मांग की।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि अंबाला से कांग्रेस सांसद वरुण चौधरी ने भी मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को पत्र लिखकर समिति के विस्तार और पुनर्गठन की मांग की है। समिति में केवल सत्ता पक्ष के सांसदों, विधायकों, पूर्व विधायकों और भाजपा नेताओं को स्थान दिया गया है, जबकि विपक्ष के निर्वाचित प्रतिनिधियों की उपेक्षा की गई है।
उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग से हरियाणा के तीन सांसद होने के बावजूद उन्हें समिति में शामिल नहीं किया जाना किसी को स्वीकार नहीं हो रहा। विपक्ष के किसी प्रमुख नेता को भी स्थान नहीं दिया गया है। सरकार का यह रवैया पक्षपातपूर्ण और सामाजिक समरसता की भावना के विपरीत है।
पावन आयोजन का राजनीतिकरण अनुचित
दीपेन्द्र हुड्डा ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार संत रविदास जी के 650वें प्रकाश पर्व को भी पार्टी प्रचार का माध्यम बनाने का प्रयास कर रही है। जनता के कर से प्राप्त धन का उपयोग किसी दल विशेष के राजनीतिक हितों के लिए करना लोकतांत्रिक और संवैधानिक मर्यादाओं के विरुद्ध है।
उन्होंने कहा कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी ने समाज को समानता, भाईचारे और समरसता का अमर संदेश दिया। इसके बावजूद सरकार द्वारा गठित समिति का दलगत और भेदभावपूर्ण स्वरूप उनके मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
‘संत रविदास पूरे मानव समाज के पथ-प्रदर्शक’
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि संत शिरोमणि गुरु रविदास जी किसी एक राजनीतिक दल के नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के पथ-प्रदर्शक हैं। उनके 650वें प्रकाश पर्व का आयोजन व्यापक जनभागीदारी और सच्ची सामाजिक समरसता के साथ होना चाहिए।
उन्होंने सवाल किया कि यदि समिति में केवल सत्ता पक्ष के नेताओं को शामिल किया जाएगा और विपक्ष तथा अनुसूचित जाति वर्ग के निर्वाचित प्रतिनिधियों की उपेक्षा होगी, तो इसे सामाजिक समरसता का अभियान कैसे कहा जा सकता है। सरकार को बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के समिति को सर्वदलीय और सर्वसमावेशी बनाना चाहिए।








