निजी क्षेत्र का न्यूनतम वेतन भी सम्मानजनक हो

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समान योग्यता और समान श्रम के बावजूद सरकारी व निजी कर्मचारियों के वेतन में भारी अंतर सामाजिक असंतोष और आर्थिक विषमता को बढ़ा रहा है

डॉ. शैलेश शुक्ला

एक ही शहर में, समान योग्यता और लगभग एक जैसा काम करने वाले दो कर्मचारियों के वेतन में जमीन-आसमान का अंतर क्यों होना चाहिए? यह सवाल अब अनदेखा नहीं किया जा सकता। सरकारी कार्यालय में सबसे निचले वेतनमान पर नियुक्त कर्मचारी को वेतन के साथ महंगाई भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, जबकि उसी शहर की किसी निजी कंपनी में दस घंटे काम करने वाला कर्मचारी कई बार दस से बारह हजार रुपये मासिक वेतन में गुजारा करने को विवश होता है।

यह केवल वेतन के आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि दो अलग-अलग भारत बनने की कहानी है। एक भारत को नौकरी की सुरक्षा, नियमित वेतन, भत्ते और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है, जबकि दूसरा भारत बाजार की शर्तों और नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर है।

दक्षता नहीं, सस्ते श्रम का लाभ

इस असमानता के पक्ष में अक्सर तर्क दिया जाता है कि सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया कठिन होती है और निजी क्षेत्र में कर्मचारी को उसकी योग्यता एवं दक्षता के अनुसार वेतन मिलता है। सतह पर यह तर्क उचित दिखाई देता है, लेकिन व्यवहार में निजी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा दक्षता को पुरस्कृत करने के बजाय सस्ते श्रम की उपलब्धता का लाभ उठाता दिखाई देता है।

कर्मचारी की मजबूरी और बेरोजगारी का दबाव उसकी योग्यता का मूल्य निर्धारित करने लगते हैं। नौकरी जाने के भय से कर्मचारी कम वेतन, लंबे कामकाजी घंटे और सामाजिक सुरक्षा के अभाव को भी स्वीकार कर लेता है। देश की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होने के बावजूद उसके श्रमिकों को न्यूनतम जीवन स्तर से नीचे रखना किसी आर्थिक या सामाजिक तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता।

संविधान में भी है निर्वाह योग्य मजदूरी की भावना

संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में समान काम के लिए समान वेतन और कामगारों के लिए निर्वाह योग्य मजदूरी की भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है। अनुच्छेद 39(घ) समान कार्य के लिए पुरुषों और महिलाओं को समान वेतन देने की बात करता है, जबकि अनुच्छेद 43 राज्य से कामगारों के लिए निर्वाह योग्य मजदूरी और सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित करने का प्रयास करने को कहता है।

वेतन संहिता, 2019 में भी केंद्र सरकार को श्रमिकों के न्यूनतम जीवन स्तर को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम आधार वेतन निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है। प्रश्न यह है कि जब सरकार अपने कर्मचारियों के लिए महंगाई और जीवन-यापन की लागत को आधार बनाकर वेतन एवं भत्ते निर्धारित करती है, तो निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के मामले में वही मानवीय दृष्टिकोण क्यों नहीं अपनाया जाता?

सरकारी वेतन आयोग निजी कर्मचारियों पर सीधे लागू नहीं हो सकता, लेकिन उसकी गणनाओं से यह अवश्य समझा जा सकता है कि किसी कर्मचारी और उसके परिवार को सम्मानपूर्वक जीवन बिताने के लिए न्यूनतम कितनी आय चाहिए।

सम्मानजनक वेतन खर्च नहीं, निवेश है

आमतौर पर आशंका जताई जाती है कि निजी क्षेत्र में न्यूनतम वेतन बढ़ाने से उद्योगों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और रोजगार के अवसर घटेंगे। इस आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, विशेषकर छोटे कारोबारों के मामले में, लेकिन कम वेतन पर आधारित विकास को भी स्थायी आर्थिक नीति नहीं माना जा सकता।

कम वेतन पाने वाला कर्मचारी न तो पूरे मन से काम कर पाता है और न अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए पर्याप्त निवेश कर सकता है। लगातार आर्थिक तनाव उसकी कार्यक्षमता और स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कम वेतन पाने वाला कर्मचारी बाजार में उपभोक्ता के रूप में खर्च नहीं कर पाता।

जब करोड़ों कामगारों की क्रय शक्ति बढ़ेगी, तभी दुकानों में बिक्री, उद्योगों में उत्पादन और बाजार में मांग बढ़ेगी। इसलिए सम्मानजनक वेतन को केवल उद्योग का खर्च नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था में दीर्घकालीन निवेश माना जाना चाहिए।

सरकारी नौकरी की भीड़ का बड़ा कारण असुरक्षा

देश के युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति असाधारण आकर्षण का एक प्रमुख कारण निजी क्षेत्र की असुरक्षा और वेतन असमानता भी है। युवा सरकारी नौकरी की ओर केवल इसलिए नहीं भाग रहे कि वहां काम अधिक सृजनात्मक है, बल्कि इसलिए भी कि वहां नियमित आय, सामाजिक सुरक्षा और अपेक्षाकृत स्थिर भविष्य की संभावना दिखाई देती है।

यदि निजी क्षेत्र में भी सम्मानजनक वेतन, निर्धारित कार्य अवधि, भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा और रोजगार की न्यूनतम सुरक्षा सुनिश्चित हो जाए तो सरकारी नौकरियों के लिए लगने वाली अनावश्यक भीड़ कुछ हद तक कम हो सकती है। युवा अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार निजी क्षेत्र में भी भयमुक्त होकर भविष्य बना सकेंगे।

चरणबद्ध नीति ही व्यावहारिक समाधान

इस मांग का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक छोटी दुकान और सूक्ष्म कारोबारी को तत्काल केंद्र सरकार के वेतनमान लागू करने के लिए बाध्य कर दिया जाए। ऐसा करना व्यावहारिक नहीं होगा। छोटे कारोबारों, मध्यम उद्योगों और बड़ी कंपनियों की आर्थिक क्षमता में भारी अंतर है। इसलिए स्पष्ट और चरणबद्ध राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन ऐसा होना चाहिए जो भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा की वास्तविक लागत को पूरा कर सके। इसे महंगाई और अलग-अलग क्षेत्रों में जीवन-यापन की लागत से जोड़कर समय-समय पर संशोधित किया जाना चाहिए।

छोटे एवं मध्यम उद्योगों को नई व्यवस्था अपनाने के लिए पर्याप्त समय और आर्थिक सहायता दी जा सकती है। निर्धारित मानक का पालन करने वाली कंपनियों को कर संबंधी प्रोत्साहन, सस्ता ऋण और सरकारी खरीद में प्राथमिकता दी जा सकती है। इसके साथ ही भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा, समय पर वेतन भुगतान और अतिरिक्त काम के भुगतान से जुड़े प्रावधानों का कठोरता से पालन कराया जाना चाहिए।

श्रम का सम्मान विकसित भारत की पहली शर्त

विकसित भारत का निर्माण केवल सरकारी कर्मचारियों के बल पर नहीं हो सकता। इसे वे करोड़ों निजी कर्मचारी बनाएंगे, जो कारखानों, विद्यालयों, अस्पतालों, दुकानों, परिवहन सेवाओं और कार्यालयों में प्रतिदिन देश की अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं।

यदि हम उनके श्रम का उचित मूल्य निर्धारित नहीं करते तो समानता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प से पीछे हटते हैं। सरकारी और निजी क्षेत्र के वेतन में पूर्ण समानता तत्काल संभव न हो, लेकिन निजी कर्मचारी को सम्मानजनक जीवन जीने योग्य न्यूनतम वेतन देना निश्चित रूप से संभव और आवश्यक है।

सम्मानजनक न्यूनतम वेतन किसी नियोक्ता की दया नहीं, प्रत्येक कामगार का अधिकार है।
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Author: Bharat Sarathi

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