नीट और बेरोजगारी पर आवाज़ बुलंद, लेकिन छात्रों की मौजूदगी पर सवाल
छात्रों की आवाज़ या संगठन का शक्ति प्रदर्शन? कार्यक्रम के बाद उठे सवाल
गुरुग्राम। कांग्रेस और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) ने गुरुग्राम के सेक्टर-36 स्थित मोहम्मदपुर क्षेत्र से “छात्रों की गूंज” अभियान की शुरुआत करते हुए नीट पेपर लीक, बढ़ती बेरोजगारी और शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आंदोलन का शंखनाद किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता गुरुग्राम ग्रामीण कांग्रेस के अध्यक्ष वर्धन यादव ने की, जबकि हरियाणा एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष अविनाश यादव मुख्य अतिथि रहे।
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि नीट पेपर लीक जैसी घटनाओं ने लाखों छात्रों के भविष्य और अभिभावकों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। वर्धन यादव ने कहा कि कांग्रेस छात्रों और युवाओं के अधिकारों की लड़ाई संसद से लेकर सड़क तक लड़ेगी। उन्होंने शिक्षा के निजीकरण और बढ़ती बेरोजगारी को युवाओं के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बताया। कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी की ओर से तैयार की गई नीट अभ्यर्थियों से जुड़ी प्रस्तुति भी दिखाई गई और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग उठाई गई।
हालांकि, कार्यक्रम के बाद इसकी तस्वीरों और स्वरूप को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि जिस कार्यक्रम को “छात्रों की गूंज” बताया गया, उसमें तस्वीरों में अधिकांश लोग कांग्रेस और एनएसयूआई के पदाधिकारी अथवा कार्यकर्ता नजर आए, जबकि बड़ी संख्या में छात्र या हाल के वर्षों में नीट परीक्षा से प्रभावित अभ्यर्थी स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दिए।
आलोचकों का कहना है कि यदि किसी आंदोलन का उद्देश्य छात्रों की आवाज़ को बुलंद करना है तो उसमें वास्तविक छात्र समुदाय की व्यापक भागीदारी दिखाई देनी चाहिए। उनका तर्क है कि केवल मंचीय भाषण, पुस्तिका विमोचन और संगठनात्मक उपस्थिति से छात्र आंदोलन की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आती। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तव में छात्र आंदोलन था या संगठन की सक्रियता प्रदर्शित करने वाला कार्यक्रम।
दूसरी ओर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि “छात्रों की गूंज” केवल एक दिवसीय आयोजन नहीं बल्कि देशव्यापी अभियान की शुरुआत है, जिसे आने वाले समय में कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और छात्रों के बीच व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा।
फिलहाल यह कार्यक्रम अपने उद्देश्य से अधिक उसके स्वरूप को लेकर चर्चा में है। आने वाले दिनों में यदि इस अभियान में बड़ी संख्या में छात्र और प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थी जुड़ते हैं, तो यह तय होगा कि यह आंदोलन वास्तव में छात्रों की आवाज़ बन पाता है या केवल राजनीतिक गतिविधि तक सीमित रह जाता है।








