2011 में 110 डॉलर का कच्चा तेल और आज 110 रु. का पेट्रोल, आखिर असली अर्थशास्त्र क्या कहता है?

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डॉलर, टैक्स, महंगाई और वैश्विक राजनीति के बीच छिपा है पेट्रोल कीमतों का पूरा गणित

पंकज जायसवाल

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें हमेशा से राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक बहस का केंद्र रही हैं। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल यानी क्रूड ऑयल की कीमतों में बदलाव आता है, देश में ईंधन मूल्य वृद्धि पर चर्चा तेज हो जाती है। इन दिनों एक सवाल बार-बार उठाया जा रहा है—जब वर्ष 2011 में कच्चा तेल लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल था, तब पेट्रोल करीब 64 रुपये प्रति लीटर मिलता था, तो आज उसी स्तर के क्रूड ऑयल पर पेट्रोल 100 से 110 रुपये प्रति लीटर क्यों बिक रहा है?

पहली नजर में यह सवाल पूरी तरह तार्किक लगता है। आम नागरिक को लगता है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत लगभग समान है, तो भारत में पेट्रोल की कीमत भी लगभग 2011 जैसी होनी चाहिए। लेकिन वास्तविक अर्थशास्त्र इससे कहीं अधिक जटिल है। केवल डॉलर में क्रूड ऑयल की कीमत देखकर पेट्रोल की तुलना करना अधूरी तस्वीर देखने जैसा है।

भारत अपनी कुल जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। यानी भारत तेल खरीदता डॉलर में है, लेकिन बेचता रुपये में। इसलिए डॉलर और रुपये की विनिमय दर इस पूरे गणित का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। वर्ष 2011 में जब कच्चा तेल लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल था, तब डॉलर की कीमत करीब 45 से 50 रुपये के बीच थी। उस समय भारत को एक बैरल तेल लगभग 5,000 से 5,500 रुपये में पड़ता था, यानी प्रति लीटर लागत लगभग 30 से 33 रुपये बैठती थी।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। डॉलर वैश्विक स्तर पर मजबूत हुआ है और रुपये की कीमत काफी कमजोर हुई है। यदि आज 110 डॉलर प्रति बैरल का तेल खरीदा जाए तो उसकी लागत लगभग 10,000 से 11,000 रुपये प्रति बैरल तक पहुंच जाती है। यानी प्रति लीटर कच्चे तेल की लागत लगभग 60 से 66 रुपये तक बैठ सकती है। इसका अर्थ है कि भारत के लिए वास्तविक आयात लागत लगभग दोगुनी हो चुकी है।

यही कारण है कि केवल “2011 में 64 रुपये और आज 110 रुपये” की सीधी तुलना आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह सही निष्कर्ष नहीं देती। अंतरराष्ट्रीय कीमत भले समान दिखाई दे, लेकिन भारत के लिए भुगतान का वास्तविक बोझ कहीं अधिक बढ़ चुका है।

इसके अलावा पेट्रोल की खुदरा कीमत केवल कच्चे तेल से तय नहीं होती। उपभोक्ता तक पहुंचने से पहले इसमें कई स्तर जुड़ते हैं—रिफाइनिंग लागत, परिवहन और लॉजिस्टिक्स, डीलर कमीशन, मार्केटिंग मार्जिन, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों का वैट। इन सभी का संयुक्त प्रभाव अंतिम खुदरा कीमत तय करता है।

कई बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होता है, लेकिन सरकारें टैक्स कम नहीं करतीं, इसलिए उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिलती। वहीं जब वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तब सरकारें टैक्स घटाकर कुछ राहत देने का प्रयास भी करती हैं।

आज का तेल बाजार केवल मांग और आपूर्ति से संचालित नहीं होता, बल्कि वैश्विक राजनीति इसका सबसे बड़ा चालक बन चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, ईरान-इजराइल संघर्ष, ओपेक देशों की उत्पादन नीति और अमेरिका की रणनीतिक स्थिति—इन सभी का सीधा असर तेल कीमतों पर पड़ता है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर बड़ी रणनीतिक आर्थिक बचत की। भारत ने सस्ता रूसी क्रूड खरीदा, उसे रिफाइन किया और कई देशों को पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात भी किए। इससे भारतीय रिफाइनिंग उद्योग और विदेशी मुद्रा आय दोनों को लाभ मिला।

हालांकि दूसरी ओर युद्ध और वैश्विक तनाव के कारण शिपिंग लागत, बीमा लागत और मुद्रा दबाव भी बढ़े, जिनका असर अंततः उपभोक्ता कीमतों पर पड़ा।

सरकारी तेल कंपनियां—जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum—कई बार अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुरूप तुरंत मूल्य नहीं बढ़ातीं। राजनीतिक और महंगाई संबंधी कारणों से कीमतें चरणबद्ध तरीके से बढ़ाई जाती हैं, ताकि उपभोक्ताओं पर एक साथ बड़ा बोझ न पड़े।

कई रिपोर्टों के अनुसार हाल के समय में तेल कंपनियों को पेट्रोल और विशेषकर डीजल पर घाटा भी उठाना पड़ा। इसलिए हालिया मूल्य वृद्धि को कंपनियां लागत वसूली के रूप में देखती हैं।

यह प्रश्न भी अक्सर पूछा जाता है कि “सरकार तेल कितने में खरीदती है और कितने में बेचती है?” वास्तविकता यह है कि सरकार सीधे पेट्रोल नहीं बेचती। पेट्रोलियम उत्पादों का कारोबार तेल विपणन कंपनियां करती हैं, जबकि सरकार इन पर टैक्स लगाती है।

भारत में पेट्रोल और डीजल केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बड़ा राजस्व स्रोत हैं। अलग-अलग राज्यों में वैट की दरें अलग होने के कारण विभिन्न शहरों में पेट्रोल की कीमतें भी अलग होती हैं। यही वजह है कि ईंधन मूल्य का मुद्दा आर्थिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी बन जाता है।

एक महत्वपूर्ण पहलू महंगाई और “समय मूल्य” का भी है। वर्ष 2011 के 64 रुपये और 2026 के 64 रुपये की क्रय शक्ति समान नहीं है। पिछले 15 वर्षों में महंगाई, वेतन, परिवहन लागत और जीवनयापन खर्च में भारी वृद्धि हुई है। यदि 2011 के 64 रुपये को आज की क्रय शक्ति के अनुसार समायोजित किया जाए, तो वह लगभग 120 से 140 रुपये के बराबर माना जा सकता है।

अर्थात केवल अंकों की तुलना करना वास्तविक आर्थिक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता।

लब्बोलुआब यह है कि पेट्रोल की कीमतों को केवल “2011 में 64 रुपये और आज 110 रुपये” के सरल गणित से नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे डॉलर-रुपया विनिमय दर, वैश्विक भू-राजनीति, टैक्स संरचना, महंगाई, लॉजिस्टिक्स, युद्ध, ऊर्जा सुरक्षा और बाजार रणनीति जैसे अनेक कारक काम करते हैं।

अर्थशास्त्र हमेशा बहुआयामी दृष्टि की मांग करता है। यदि केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड ऑयल के डॉलर मूल्य को देखकर निष्कर्ष निकाला जाए, तो पूरी आर्थिक तस्वीर सामने नहीं आती। वास्तविकता यह है कि आज भारत जिस वैश्विक आर्थिक और मुद्रा संरचना में तेल खरीद रहा है, उसकी लागत 2011 की तुलना में कहीं अधिक जटिल और महंगी हो चुकी है।

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Author: Bharat Sarathi

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