— महेंद्र शर्मा

पानीपत, 24 मई। यदि हम हिन्दू राष्ट्र की कल्पना करते हैं, तो धर्मानुसार कुछ मूलभूत प्रश्नों का उत्तर देना भी आवश्यक हो जाता है। केवल नारों और भावनात्मक घोषणाओं से राष्ट्र की आत्मा निर्मित नहीं होती, बल्कि उसके पीछे आचरण, मर्यादा और वैचारिक गंभीरता का होना भी अनिवार्य है।
केनोपनिषद् में एक अत्यन्त गूढ़ वाक्य आता है, जो मनुष्य के अहंकार को विनम्रता में परिवर्तित कर देता है—
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्॥
अर्थात् — जो यह मानता है कि वह ब्रह्म को नहीं जानता, वही वास्तव में उसे जानने की दिशा में है; और जो यह मान बैठता है कि वह ब्रह्म को पूर्णतः जान चुका है, वह वस्तुतः उससे दूर है।
जब ज्ञानीजन स्वयं ब्रह्म की पूर्णता को अगम्य मानते हैं, तब सामान्य मनुष्य के लिए विनम्रता ही उचित मार्ग है। ब्रह्म का तात्पर्य केवल किसी दार्शनिक सत्ता से नहीं, बल्कि अनुशासन, मर्यादा और अंतर्मन की सूक्ष्म दृष्टि से भी है।
यदि विषय राजनीति और राष्ट्र-गरिमा का हो, तो स्वयं को “विश्वगुरु” घोषित करने से अधिक आवश्यक यह है कि हम अपने आचरण से विश्व का सम्मान अर्जित करें। किसी भी राष्ट्राध्यक्ष का सम्मान उसी प्रकार होना चाहिए, जैसा सम्मान हम अपने लिए अपेक्षित करते हैं।
भारत के भीतर राजनीतिक प्रभाव, दलबदल अथवा शक्ति-प्रदर्शन की शैली भले चल जाए, परन्तु अंतरराष्ट्रीय मंच पर मर्यादा, शिष्टाचार और राजनयिक संतुलन सर्वोपरि होते हैं। यूरोप के अनेक देशों में लोकतांत्रिक संस्थाएँ अत्यन्त स्वतंत्र और सशक्त मानी जाती हैं। वहाँ संवाद का स्तर व्यक्ति की संवैधानिक गरिमा के अनुरूप होता है।
यदि कोई भारतीय नेता अपनी सांस्कृतिक पहचान प्रदर्शित करना चाहता, तो वह भारतीय ज्ञान-परम्परा के प्रतीक ग्रंथ — जैसे श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस, चाणक्य नीति अथवा विदुर नीति — भेंट कर भारतीय संस्कृति और वैचारिक परिपक्वता का परिचय दे सकता था।
रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में कहा गया है—
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
अर्थात् काम, क्रोध, अहंकार और लोभ — ये सब पतन के मार्ग हैं।
राजनीति केवल लोकप्रियता का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र का दर्पण भी है। जब आचरण में गंभीरता और मर्यादा का अभाव दिखाई देता है, तो उसकी छवि सम्पूर्ण राष्ट्र पर पड़ती है।
आज का युवा प्रश्न कर रहा है। वह केवल इतिहास के गौरवगान से संतुष्ट नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्याओं, बेरोजगारी, संस्थागत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी उत्तर चाहता है। यदि देश में लोकतंत्र है, तो संविधान, नियम और संस्थागत मर्यादा पर स्पष्ट संवाद होना चाहिए।
भारतीय सनातन संस्कृति में नारी के सम्मान को अत्यन्त उच्च स्थान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है—
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का निवास होता है।
वेदों एवं स्मृतियों में स्त्री के अनेक रूपों को माता के समान सम्मान देने की परम्परा बताई गई है—
स्तनदात्री गर्भदात्री भक्ष्यदात्री गुरुप्रिया।
अभीष्टदात्री च पितुः पत्नी च कन्यका॥
सगर्भजा या भगिनी पुत्रपत्नी प्रियाप्रसू।
मातुर्माता पितुर्माता सहोदरस्य प्रिया तथा॥
मातुः पितुश्च भगिनी मातुलानी तथैव च।
जनानां वेदविहिता मातरः षोडश स्मृताः॥
अर्थात् — जन्म देने वाली माता, स्तनपान कराने वाली, भोजन कराने वाली, गुरु-पत्नी, विमाता, बहन, पुत्रवधू, सास, नानी, दादी, मौसी, बुआ, मामी आदि — ये सभी मातृतुल्य मानी गई हैं।
यदि हम स्वयं को सनातन संस्कृति का प्रतिनिधि मानते हैं, तो हमारे आचरण, भाषा और प्रतीकों में भी उसी मर्यादा और गंभीरता का प्रतिबिम्ब दिखाई देना चाहिए। संसार केवल हमारे शब्द नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार को भी देखता है।








