औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम 1940 और सीडीएससीओ की सख्ती से ब्यूटी इंडस्ट्री में मचा हड़कंप
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

गोंदिया – आज के डिजिटल और ग्लैमर प्रधान दौर में सुंदर दिखने की चाहत ने कॉस्मेटिक और ब्यूटी इंडस्ट्री को अरबों के कारोबार में बदल दिया है। इंस्टेंट ग्लो, स्किन व्हाइटनिंग, एंटी-एजिंग और बिना सर्जरी खूबसूरती पाने के दावे युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रहे हैं। लेकिन इसी चमक-दमक के पीछे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट भी तेजी से बढ़ रहा है।
इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार की दवा नियामक संस्था Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) ने 21 मई 2026 को कड़ा सार्वजनिक नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी कॉस्मेटिक उत्पाद का उपयोग इंजेक्शन के रूप में नहीं किया जा सकता। ऐसा करना सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन माना जाएगा और दोषियों के खिलाफ Drugs and Cosmetics Act, 1940 के तहत कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सरकार ने साफ कहा है कि कॉस्मेटिक उत्पाद केवल बाहरी उपयोग के लिए होते हैं। इन्हें इंजेक्शन, इन्फ्यूजन या शरीर के भीतर प्रवेश कराने वाली किसी प्रक्रिया में उपयोग करना खतरनाक और अवैध है। यदि कोई उत्पाद शरीर के भीतर इंजेक्ट किया जाता है, तो वह सामान्य कॉस्मेटिक नहीं बल्कि चिकित्सीय श्रेणी में आता है, जिसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण, सुरक्षा मानक और विशेष अनुमति आवश्यक होती है।

कानूनी दृष्टि से देखें तो अधिनियम की धारा 18, 17सी, 26ए और 27ए के तहत मिसब्रांडेड, भ्रामक अथवा नियम-विरुद्ध कॉस्मेटिक उत्पादों के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध है। उल्लंघन की स्थिति में एक वर्ष तक की कैद, 20 हजार रुपये तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं, जबकि नकली या मिलावटी उत्पादों पर तीन वर्ष तक की सजा और भारी आर्थिक दंड का प्रावधान है।
सरकार की चिंता केवल कानून तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में ग्लूटाथियोन इंजेक्शन, इंस्टेंट ग्लो थेरेपी, स्किन व्हाइटनिंग इंजेक्शन और फेस लिफ्ट इंजेक्शन जैसे तथाकथित उपचार तेजी से लोकप्रिय हुए हैं। अनेक मामलों में बिना प्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा ये प्रक्रियाएं की जा रही हैं, जिससे संक्रमण, एलर्जी, नसों को नुकसान, हार्मोनल असंतुलन, त्वचा विकृति, लीवर-किडनी पर असर और यहां तक कि जानलेवा स्थितियां पैदा हो रही हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर “पहले और बाद” की तस्वीरों और चमत्कारी दावों के जरिए लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। कई बार इन्फ्लुएंसर और सेलिब्रिटी प्रचार के माध्यम से ऐसे उत्पादों को सुरक्षित और प्रभावी बताकर युवाओं को प्रभावित करते हैं, जबकि वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सीमित होते हैं। यही वजह है कि सरकार अब केवल उत्पादों पर नहीं, बल्कि उनके विज्ञापनों और प्रचार तंत्र पर भी नजर रख रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कॉस्मेटिक्स और मेडिकल ट्रीटमेंट के बीच का अंतर समझना बेहद आवश्यक है। क्रीम, लोशन और मेकअप जैसे उत्पाद केवल बाहरी सौंदर्य के लिए होते हैं, जबकि इंजेक्शन आधारित प्रक्रियाएं शरीर की जैविक संरचना को प्रभावित करती हैं। इसलिए इन्हें केवल योग्य चिकित्सकों द्वारा, नियंत्रित वातावरण में और वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
सरकार ने आम जनता से अपील की है कि किसी भी ब्यूटी ट्रीटमेंट से पहले उसकी वैधता और चिकित्सकीय सुरक्षा की जांच अवश्य करें। यदि कहीं कॉस्मेटिक के नाम पर इंजेक्शन लगाए जा रहे हों या भ्रामक विज्ञापन चलाए जा रहे हों, तो इसकी जानकारी संबंधित प्राधिकरण को दें।
अंततः यह स्पष्ट है कि सुंदरता तभी सार्थक है जब वह स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ जुड़ी हो। त्वरित और कृत्रिम सौंदर्य के लालच में स्वास्थ्य से समझौता करना गंभीर परिणाम दे सकता है। सीडीएससीओ की यह चेतावनी केवल प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि समाज को यह संदेश है कि “सेफ्टी फर्स्ट” का सिद्धांत सौंदर्य उद्योग पर भी समान रूप से लागू होता है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र








