सुप्रीम कोर्ट ने कहा- जातिगत आंकड़े जुटाना सरकार का वैध नीतिगत अधिकार
जनगणना 2027 बनेगी डिजिटल इंडिया और डेटा आधारित गवर्नेंस का सबसे बड़ा अभियान
सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को मिलेगा प्रमाणिक आधार
अदालत बोली- संभावित दुरुपयोग की आशंका से नीति को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता
मोबाइल ऐप, टैबलेट और रियल टाइम मॉनिटरिंग से होगी आधुनिक डिजिटल जनगणना
एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

भारत में जातिगत जनगणना को लेकर लंबे समय से चल रही बहस को 20 मई 2026 को नया मोड़ मिला, जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने इसके खिलाफ दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनगणना कराना और उसमें जातिगत आंकड़े शामिल करना सरकार का नीतिगत अधिकार है तथा जब तक कोई नीति संविधान का उल्लंघन नहीं करती, न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
अदालत ने कहा कि सरकार के लिए यह जानना आवश्यक है कि देश में अन्य पिछड़ा वर्ग और सामाजिक रूप से वंचित समूहों की वास्तविक संख्या कितनी है, ताकि उनके लिए प्रभावी कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें। अदालत ने यह भी माना कि केवल संभावित दुरुपयोग की आशंका के आधार पर किसी नीति को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
भारत की जनगणना 2027 को डिजिटल इंडिया और डेटा आधारित गवर्नेंस के सबसे बड़े प्रशासनिक अभियानों में माना जा रहा है। पहला चरण अप्रैल–मई 2026 में हाउस लिस्टिंग और आवासीय सर्वेक्षण के रूप में शुरू हो चुका है, जिसमें आवास, बिजली, पानी, इंटरनेट और सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं से जुड़ा डेटा एकत्र किया गया। दूसरा चरण 2027 में होगा, जिसमें परिवारों की आयु, शिक्षा, रोजगार, भाषा और जातिगत जानकारी दर्ज की जाएगी।
इस बार मोबाइल ऐप, टैबलेट आधारित डेटा एंट्री, ऑनलाइन सत्यापन और रियल टाइम मॉनिटरिंग जैसी डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य केवल आंकड़े जुटाना नहीं, बल्कि डेटा आधारित नीति निर्माण को मजबूत करना है।
विशेषज्ञों के अनुसार 1931 के बाद देश में व्यापक जातिगत आंकड़ों का अभाव रहा, जिसके कारण सामाजिक न्याय, आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को लेकर लगातार बहस होती रही। ऐसे में जनगणना 2027 को भारत की सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने वाला ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
हालांकि विरोधियों का तर्क है कि इससे सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, लेकिन सरकार और अदालत दोनों ने स्पष्ट किया है कि सामाजिक कल्याण के लिए प्रमाणिक आंकड़े जुटाना लोकतांत्रिक शासन का वैध और आवश्यक हिस्सा है।
अतः सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक याचिका खारिज करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में सामाजिक न्याय, पारदर्शी प्रशासन और डेटा आधारित शासन व्यवस्था को नई दिशा देने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र








