धर्म का वास्तविक स्वरूप मानवता, सत्य और लोककल्याण का मार्ग : पं. अमर चन्द भारद्वाज

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धर्म केवल पूजा नहीं, मानवता और कर्तव्य पालन का मार्ग : पं. अमर चन्द भारद्वाज

“वसुधैव कुटुम्बकम्” ही सनातन धर्म की वास्तविक आत्मा

कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज

गुरुग्राम। आचार्य पुरोहित संघ के अध्यक्ष तथा दा पावर ऑफ हूमन राइट्स फाउंडेशन के राष्ट्रीय मीडिया सचिव एवं कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि “धर्म क्या है” यह प्रश्न जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहन और व्यापक अर्थों से भरा हुआ है। उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग धर्म को केवल पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद, व्रत-उपवास या कर्मकाण्ड तक सीमित मान लेते हैं, जबकि सनातन वैदिक दृष्टि में धर्म सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाली दिव्य शक्ति है।

पं. अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि शास्त्रों में कहा गया है — “धारयति इति धर्मः”, अर्थात जो सम्पूर्ण जगत को धारण करे वही धर्म है। धर्म वह शक्ति है जो मनुष्य को पशुता से उठाकर मानवता और फिर देवत्व की ओर ले जाती है। धर्म केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम, करुणा, मर्यादा और सदाचार का जीवन है।

उन्होंने कहा कि सनातन धर्म किसी एक पंथ, जाति, भाषा या देश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण मानवता और समस्त प्राणियों के कल्याण का मार्ग है। इसी कारण हमारी संस्कृति “वसुधैव कुटुम्बकम्” का संदेश देती है, जिसका अर्थ है कि सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। जहां संकीर्णता समाप्त होकर समस्त सृष्टि के प्रति प्रेम और करुणा जागृत होती है, वहीं से धर्म का वास्तविक आरम्भ होता है।

कथावाचक पं. अमर चन्द भारद्वाज ने बताया कि मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं — धैर्य, क्षमा, दया, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध। उन्होंने कहा कि केवल तिलक लगाने, माला पहनने या धार्मिक वेशभूषा धारण करने से कोई धार्मिक नहीं बन जाता। यदि मन में छल, कपट, अहंकार और द्वेष भरा हो तो बाहरी पूजा भी अधूरी रह जाती है। वहीं जो व्यक्ति सत्य बोलता है, दूसरों की सहायता करता है, भूखे को भोजन देता है, दुखियों का सहारा बनता है और अपने कर्तव्यों का पालन करता है, वही वास्तव में धर्मात्मा कहलाने योग्य है।

उन्होंने कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर छिपे दिव्य गुणों को जागृत करना है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को स्वधर्म अर्थात अपने कर्तव्य के पालन को सर्वोच्च धर्म बताया है। धर्म हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समस्त समाज और मानवता के लिए जीना सिखाता है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” ही सनातन धर्म की आत्मा है।

पं. अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि सत्य बोलना, न्याय करना, स्त्रियों का सम्मान करना, गौ, गंगा, प्रकृति और समस्त जीवों की रक्षा करना, राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा करना भी धर्म है। जहां सेवा, करुणा, त्याग और मानवता है, वहीं ईश्वर का वास है।

उन्होंने कहा कि भगवान राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” इसलिए कहा गया क्योंकि उन्होंने अपने जीवन से धर्म की स्थापना की। धर्म केवल उपदेश देने का विषय नहीं, बल्कि स्वयं आचरण में उतारने की जीवन पद्धति है। सनातन धर्म हमें क्रोध के स्थान पर क्षमा, घृणा के स्थान पर प्रेम, लोभ के स्थान पर संतोष और अहंकार के स्थान पर विनम्रता अपनाने की शिक्षा देता है।

उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज संसार में हिंसा, अशांति, भ्रष्टाचार, स्वार्थ और आपसी द्वेष का सबसे बड़ा कारण धर्म से दूरी है। लोग धर्म के नाम पर लड़ रहे हैं, जबकि सच्चा धर्म जोड़ना सिखाता है, तोड़ना नहीं। जिस धर्म से किसी का हृदय टूटे, वह धर्म नहीं हो सकता। धर्म वह है जिससे किसी दुखी को सहारा मिले, किसी निराश व्यक्ति को आशा मिले और समाज में सद्भाव स्थापित हो।

उन्होंने कहा कि प्रकृति स्वयं धर्म का सबसे बड़ा उदाहरण है। सूर्य बिना भेदभाव के सबको प्रकाश देता है, वायु सबको जीवन देती है, पृथ्वी सबका भार सहन करती है और नदियां सबकी प्यास बुझाती हैं। यही धर्म है — बिना स्वार्थ के सबका कल्याण करना।

अंत में पं. अमर चन्द भारद्वाज ने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल स्वर्ग प्राप्त करना नहीं, बल्कि इस पृथ्वी को स्वर्ग जैसा बनाना है। यदि मनुष्य अपने जीवन में सत्य, दया, सेवा, त्याग, संयम और सदाचार को धारण कर ले, तो वही सच्चा धार्मिक कहलाने योग्य है। धर्म कोई भय नहीं, बल्कि आत्मा का प्रकाश है और जीवन को मुक्त करने वाला मार्ग है।

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Author: Bharat Sarathi

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