श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग : शिवतत्व, ज्ञान और मुमुक्षत्व का सनातन संदेश

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सोमनाथ का संदेश : आस्था के साथ ज्ञान, आत्मबोध और लोककल्याण ही वास्तविक शिवोपासना

आचार्य डाॅ महेन्द्र शर्मा ‘महेश’ ……..पानीपत

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माने जाने वाले श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का भारतीय अध्यात्म, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। मान्यता है कि आदिकाल में नक्षत्राधिपति चन्द्रदेव ने यहां भगवान शिव की कठोर उपासना कर क्षय रोग के श्राप से मुक्ति प्राप्त की थी। यही कारण है कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि तप, त्याग और पुनर्जागरण का प्रतीक बन गया।

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि अनेक आक्रमणों और विध्वंसों के बाद भी सोमनाथ की आस्था कभी समाप्त नहीं हुई। 1783 ईस्वी में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका पुनर्निर्माण कराया और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जनसहयोग से इसका भव्य पुनरुद्धार हुआ। यह पुनर्निर्माण केवल पत्थरों का निर्माण नहीं था, बल्कि भारत की आत्मा के पुनर्जागरण का प्रतीक था।

परंतु प्रश्न यह भी है कि क्या केवल मंदिर निर्माण ही धर्म है? क्या धर्म केवल अभिषेक, पूजा और उत्सवों तक सीमित है? सनातन चिंतन स्पष्ट करता है कि धर्म का वास्तविक अर्थ लोककल्याण, ज्ञान और चेतना का विकास है। यदि समाज शिक्षित नहीं होगा, तो वह धर्म के गूढ़ रहस्यों को कैसे समझेगा? यदि उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा और विज्ञान का विस्तार नहीं होगा, तो मानव जीवन में वास्तविक कल्याण कैसे आएगा?

भगवान शिव का “शिवत्व” केवल रुद्राभिषेक में नहीं, बल्कि समष्टि कल्याण में निहित है। जल चढ़ाने से अधिक महत्त्वपूर्ण जल-स्रोतों का संरक्षण है; दीप जलाने से अधिक आवश्यक ज्ञान का प्रकाश फैलाना है। शिव का अर्थ ही है — “परम कल्याणकारी”।

शिव=परम कल्याणकारी चेतना

चाणक्य की नीति में कहा गया है—

“मुक्तिमिच्छामि चेत्तात् विषयान् विषवत्यज।
क्षमाSर्जव दया शौचं सत्यं पीयूषवद् भज।।”

अर्थात यदि मनुष्य मुक्ति चाहता है तो उसे विषय-विकारों को विष के समान त्याग देना चाहिए तथा क्षमा, दया, सरलता, शुचिता और सत्य को अमृत के समान धारण करना चाहिए। यही शिवतत्व है और यही वास्तविक धर्म।

भारतीय परंपरा में ज्ञान को सर्वोच्च माना गया है। जहां से भी श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त हो, उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। हमारी पौराणिक परंपरा में भगवान दत्तात्रेय का उदाहरण मिलता है, जिन्होंने प्रकृति और समाज के विविध रूपों से 24 गुरु धारण किए। यह संदेश देता है कि बुद्धिमान व्यक्ति हर क्षण और हर परिस्थिति से सीख ग्रहण करता है।

इसी प्रकार माता, पिता और गुरु को भारतीय संस्कृति में ईश्वरतुल्य स्थान दिया गया है। माता प्रथम गुरु है, पिता पालनकर्ता और गुरु जीवन का प्रकाश। ये तीनों मनुष्य को संस्कारित, शिक्षित और सभ्य बनाते हैं।

भगवान शिव और गणेश के संवाद की कथा इसी गूढ़ रहस्य को प्रकट करती है। गणपति ने जब शिव के विरक्त स्वरूप पर प्रश्न किया, तब शिव ने दिव्य सौंदर्य का रूप धारण किया। उस तेजस्वी स्वरूप को देखकर समस्त देवगण विस्मित हो उठे। अंततः गणपति ने स्वयं प्रार्थना की कि शिव पुनः अपने मूल रुद्रस्वरूप में लौट आएं। यह कथा केवल सौंदर्य-वर्णन नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और वैराग्य की महिमा का दार्शनिक प्रतीक है।

श्रावण मास उसी शिव को समर्पित है, जो स्वयं कष्ट सहकर संसार पर कृपा-वृष्टि करते हैं। पिता भी शिव के समान अपने परिवार के लिए संघर्ष करता है, स्वयं कठिनाइयाँ सहता है, पर सन्तान के जीवन में अभाव नहीं आने देता।

“नाSस्ति मातृ समा: तीर्थ:
नाSस्ति पितृ समा: सागर:
नाSस्ति गुरु समा: ईश्वर:
इह लोके परत्र च।”

अर्थात माता के समान कोई तीर्थ नहीं, पिता के समान कोई सागर नहीं और गुरु के समान कोई ईश्वर नहीं।

शिव और शक्ति के संबंध को भी सनातन दर्शन में अद्वैत रूप में देखा गया है—

“न शिवेन विना शक्ति:
न शक्ति शिवेन विना।”

अर्थात शिव बिना शक्ति के अपूर्ण हैं और शक्ति बिना शिव के अस्तित्वहीन। यही समन्वय सृष्टि का आधार है।

आत्मज्ञान की दृष्टि से शिवतत्व मनुष्य को भय और शोक से मुक्त करता है। जब मनुष्य आत्मा और ब्रह्म की अभिन्नता को समझ लेता है, तब जन्म-मरण का भय समाप्त हो जाता है। यही मोक्ष का मार्ग है।

“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं सिद्धम्।
नित्यानन्दैक रसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति।।”

ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनंत है। वही नित्य आनंद का स्रोत है और वही परम चेतना शिवतत्व के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है।

अतः सोमनाथ केवल एक ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का वह प्रकाशस्तंभ है जो हमें यह सिखाता है कि धर्म का सार बाह्य आडंबर नहीं, बल्कि ज्ञान, करुणा, आत्मबोध और लोककल्याण है।

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Author: Bharat Sarathi

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