पांच साल के काम पर नहीं, नारों और दावों पर क्यों लड़ा जा रहा चुनाव?
गुरुग्राम/चंडीगढ़, 9 मई। हरियाणा में 10 मई को होने जा रहे नगर निकाय चुनावों को लेकर भारतीय जनता पार्टी पूरी ताकत से मैदान में है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली लगातार “ट्रिपल इंजन सरकार” के नाम पर जनता से वोट मांग रहे हैं। भाजपा नेतृत्व का दावा है कि जनता कमल खिलाने के लिए उत्सुक है और निकायों में भाजपा की जीत विकास और सुशासन को नई गति देगी।
लेकिन इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि जब पिछले पांच वर्षों से प्रदेश में भाजपा की सरकार, निकायों में भाजपा का नियंत्रण और केंद्र में भी भाजपा की सरकार थी, तब आम जनता को मूलभूत सुविधाओं के लिए क्यों जूझना पड़ा? यदि पहले से ही “ट्रिपल इंजन” जैसी स्थिति मौजूद थी, तो फिर शहरों में टूटी सड़कें, जाम सीवर, सार्वजनिक शौचालयों की कमी, आवारा पशुओं का आतंक और सफाई व्यवस्था की बदहाली जैसी समस्याएं आखिर क्यों बनी रहीं?
चुनाव प्रचार में विकास कार्यों की चर्चा गायब
निकाय चुनाव स्वाभाविक रूप से शहरों की समस्याओं और नगर निगमों के कार्यों पर केंद्रित होने चाहिए थे, लेकिन पूरे चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दों और निगमों के पिछले पांच साल के कामकाज पर गंभीर चर्चा लगभग नदारद दिखाई दी। भाजपा नेताओं के भाषणों में “विकसित हरियाणा”, “डबल इंजन”, “ट्रिपल इंजन” और “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मजबूत करने” जैसे राजनीतिक नारे तो खूब सुनाई दिए, लेकिन नगर निगमों द्वारा किए गए ठोस कार्यों का विस्तृत ब्यौरा सामने नहीं आया।
जनता यह जानना चाहती है कि जिन शहरों में भाजपा के मेयर और पार्षद पहले से थे, वहां बीते 1825 दिनों में नागरिक सुविधाओं को लेकर क्या बदलाव हुआ? जिन वार्डों में जलभराव, कूड़े के ढेर, खराब सड़कें और सीवर समस्या आज भी बनी हुई हैं, वहां जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
कर्मचारियों और विभिन्न वर्गों की नाराजगी भी बड़ा मुद्दा
निकाय चुनावों के बीच प्रदेश में कई वर्ग सरकार से नाराज दिखाई दे रहे हैं। नगर निगम कर्मचारियों की हड़ताल, फायर ब्रिगेड कर्मचारियों की मांगें, आंगनवाड़ी वर्करों के आंदोलन, अध्यापकों की समस्याएं, किसानों और व्यापारियों की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। ऐसे माहौल में भाजपा नेतृत्व का यह दावा कि “जनता भाजपा को जिताने के लिए बेताब है”, राजनीतिक बयानबाजी ज्यादा और जमीनी हकीकत कम प्रतीत होता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में अपने कार्यों को लेकर आश्वस्त होती तो चुनाव प्रचार में पिछले पांच वर्षों की उपलब्धियों, भ्रष्टाचार पर हुई कार्रवाई और भविष्य की स्पष्ट योजनाओं को प्रमुखता से रखा जाता। लेकिन प्रचार में स्थानीय निकायों की जवाबदेही की बजाय भावनात्मक और राजनीतिक अपीलें अधिक दिखाई दीं।
भ्रष्टाचार और जवाबदेही पर भी उठ रहे सवाल
पिछले वर्षों में कई नगर निकायों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप सामने आए। जनता यह भी जानना चाहती है कि उन मामलों में क्या कार्रवाई हुई और भविष्य में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सरकार की क्या योजना है। चुनाव प्रचार में इन मुद्दों पर स्पष्टता दिखाई नहीं दी।
आम नागरिकों का कहना है कि चुनाव के समय बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन समस्याओं से जूझ रही जनता के बीच नेता कम ही दिखाई देते हैं। कई स्थानों पर लोगों का आरोप है कि विधायक और जिला स्तर के पदाधिकारी भी आम जनता की समस्याएं सुनने के लिए नियमित रूप से मैदान में नजर नहीं आते।
जनता के सामने असली सवाल
निकाय चुनावों में इस बार जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल “ट्रिपल इंजन” का नारा शहरों की समस्याओं का समाधान कर देगा, या फिर जनता अब नारों से आगे बढ़कर अपने मोहल्लों और वार्डों की वास्तविक स्थिति के आधार पर फैसला करेगी?
नगर निगम चुनाव मूलतः स्थानीय विकास, सफाई, पानी, सड़क, स्ट्रीट लाइट, सीवर और नागरिक सुविधाओं का चुनाव माना जाता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता राजनीतिक नारों को प्राथमिकता देते हैं या फिर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों को।









