चुनाव प्रचार के अंतिम दिन मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का एक महिला प्रत्याशी के घर पहुंचना कई सवाल खड़े करता है

चंडीगढ़, 8 मई। पंचकूला नगर निगम चुनाव के अंतिम चरण में हरियाणा की राजनीति ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं और भाजपा के तथाकथित ‘नारी वंदन’ के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए। शुक्रवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सैनी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मोहन लाल बडौली स्वयं वार्ड नंबर 12 से निर्दलीय चुनाव लड़ रही पूर्व पार्षद ओमवती पूनिया के घर पहुंचे और उन्हें भाजपा में शामिल कराया।
प्रदेश अध्यक्ष मोहनलाल बडोली ने ओमवती पूनिया को भाजपा का पटका पहनाकर पार्टी में “घर वापसी” कराई, जिसके बाद उन्होंने भाजपा प्रत्याशी राकेश जगोता को अपना समर्थन देने की घोषणा की। ओमवती पूनिया ने कहा कि अब वह भाजपा प्रत्याशी को भारी बहुमत से जिताने के लिए पूरी मेहनत करेंगी। इस अवसर पर भाजपा प्रदेश सह-प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद सुरेंद्र सिंह नागर, प्रदेश उपाध्यक्ष बनतो कटारिया और जिलाध्यक्ष अजय मित्तल भी मौजूद रहे।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव प्रचार के अंतिम दिन एक महिला निर्दलीय प्रत्याशी के घर जाकर उसे चुनाव मैदान से प्रभावी रूप से हटाने और समर्थन लेने के लिए मनाना उचित माना जा सकता है?
भाजपा अक्सर ‘नारी वंदन’ और महिला सम्मान की बात करती है, लेकिन क्या किसी महिला उम्मीदवार पर राजनीतिक दबाव बनाकर उसे अपने पक्ष में झुकाना वास्तव में महिला सम्मान का उदाहरण है? यदि एक महिला लोकतांत्रिक अधिकार का उपयोग करते हुए चुनाव मैदान में उतरती है, तो क्या सत्ता के सर्वोच्च चेहरे उसके दरवाजे तक पहुंचकर उसे समर्थन बदलने के लिए प्रेरित करें — यही लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा है?
यह घटनाक्रम केवल एक वार्ड का राजनीतिक मामला नहीं, बल्कि सत्ता के प्रभाव और राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न भी है। आम कार्यकर्ता और प्रत्याशी जहां सीमित संसाधनों में चुनाव लड़ते हैं, वहीं मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेताओं का स्थानीय स्तर पर इस प्रकार सक्रिय होना यह संकेत देता है कि भाजपा स्थानीय निकाय चुनावों को भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरी सरकारी और संगठनात्मक ताकत झोंक रही है।
“नारी वंदन भाजपा का नारा” — लेकिन यदि एक महिला प्रत्याशी को चुनावी मैदान से हटाकर सत्ता पक्ष के समर्थन में खड़ा करना ही राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी, तो यह नारी सशक्तिकरण कम और राजनीतिक दबाव की तस्वीर अधिक दिखाई देती है।









