कानपुर की घटना ने उठाए सवाल—क्या हम बच्चों को गढ़ रहे हैं या अनजाने में उन्हें तोड़ रहे हैं?
राजेश जैन

कानपुर की एक अदालत की पांचवीं मंजिल से कूदकर जान देने वाले 24 वर्षीय प्रशिक्षु अधिवक्ता प्रियांशु श्रीवास्तव की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया। मरने से पहले लिखे गए सुसाइड नोट में आर्थिक तंगी, प्रेम प्रसंग या करियर असफलता का कोई उल्लेख नहीं था। उसमें बार-बार बचपन से महसूस किए गए अपमान, भय, नियंत्रण और भावनात्मक घुटन का जिक्र था, जिसे उन्होंने अपने पिता की कठोरता से जोड़ा।
“पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो”— यह केवल एक बेटे की अंतिम पीड़ा नहीं, बल्कि उस परवरिश मॉडल पर सवाल है जिसमें अनुशासन के नाम पर अपमान और डर को सामान्य बना दिया गया है। सवाल साफ है—क्या हम बच्चों को संवार रहे हैं या तोड़ रहे हैं?
हालांकि यह बातें व्यक्तिगत आरोप हैं और उनकी पुष्टि जांच का विषय है, लेकिन यह घटना भारतीय पेरेंटिंग के उस कठोर चेहरे को उजागर करती है, जिस पर समाज लंबे समय से आंखें मूंदे बैठा है।
अनुशासन बनाम अपमान
हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा सफल और अनुशासित बने। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब अनुशासन सम्मान के साथ न होकर अपमान के साथ दिया जाने लगे।
जब हर गलती पर व्यक्तित्व पर हमला हो, हर असहमति को बदतमीजी कहा जाए और हर निर्णय भय से मनवाया जाए—तब अनुशासन धीरे-धीरे जुल्म में बदल जाता है।
सार्वजनिक बेइज्जती, हर गतिविधि पर नियंत्रण, लगातार शक और भावनाओं की अनदेखी—ये सुधार के नहीं, टूटन के कारण बनते हैं।
सख्ती को संस्कार मानने की सोच
हमारे समाज में अब भी यह धारणा गहरी है—“मार-डांट से ही बच्चे बनते हैं।”
कई माता-पिता इसे अपने अनुभव से सही ठहराते हैं। लेकिन यह तर्क इस सच्चाई को नजरअंदाज करता है कि हर पीढ़ी की मानसिक जरूरतें अलग होती हैं।
आज का बच्चा केवल आदेश नहीं, संवाद चाहता है।
वह नियंत्रण नहीं, सम्मान चाहता है।
डर से नहीं बनता चरित्र
लगातार डांट, ताने और तुलना झेलने वाला बच्चा धीरे-धीरे आत्मविश्वास खो देता है।
वह हर समय गलती के डर में जीता है और अपनी अभिव्यक्ति दबाने लगता है।
ऐसे बच्चे बाहर से अनुशासित दिख सकते हैं, लेकिन भीतर से वे चिंता, हीनता और भावनात्मक दबाव से जूझ रहे होते हैं।
कुछ विद्रोही बन जाते हैं, कुछ पूरी तरह चुप। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब बच्चा अपनी पीड़ा व्यक्त करना ही बंद कर दे।
थोपी गई अपेक्षाएं
भारतीय परिवारों में बच्चों पर करियर, विषय और जीवनशैली तक का दबाव आम है।
“हम तुमसे ज्यादा जानते हैं”—इस सोच के पीछे कई बार बच्चे की पहचान दब जाती है।
हर बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या वकील नहीं बनना चाहता।
जब उसकी क्षमता और रुचि की अनदेखी कर केवल अपेक्षाएं थोपी जाती हैं, तो वह अपने ही जीवन से कटने लगता है।
सार्वजनिक अपमान: गहरा घाव
लोगों के सामने डांटना सुधार नहीं करता, बल्कि आत्मसम्मान को तोड़ देता है।
घर वह जगह होना चाहिए जहां बच्चा सबसे सुरक्षित महसूस करे।
अगर वहीं उसे बार-बार अपमान मिले, तो उसके लिए कोई सुरक्षित स्थान नहीं बचता।
इरादे नहीं, तरीके गलत
यह भी सच है कि अधिकांश कठोर माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम करते हैं।
समस्या उनके इरादों में नहीं, बल्कि तरीकों में होती है।
बहुत से माता-पिता उसी माहौल में बड़े हुए होते हैं जहां संवाद की जगह डर था। वे वही दोहराते हैं जो उन्होंने सीखा।
लेकिन सम्मान के बिना प्रेम, नियंत्रण जैसा महसूस होने लगता है।
समाधान: संवाद आधारित पेरेंटिंग
आधुनिक पेरेंटिंग का मूल मंत्र है—“फर्म बट फेयर”।
सीमाएं स्पष्ट हों, लेकिन सम्मान के साथ।
गलत पर टोकें, लेकिन बच्चे की पहचान को गलत न ठहराएं।
व्यवहार की आलोचना करें, व्यक्तित्व की नहीं।
अच्छी पेरेंटिंग का अर्थ ढील देना नहीं, बल्कि ऐसा माहौल बनाना है जिसमें अनुशासन और आत्मसम्मान दोनों साथ चलें।
समाज के लिए चेतावनी
कानपुर की यह घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समय का सामाजिक आईना है।
यह बताती है कि कितने बच्चे और युवा बाहर से सामान्य दिखते हुए भीतर से टूट रहे हैं।
हर आत्महत्या अचानक नहीं होती—उसके पीछे अक्सर वर्षों की अनकही पीड़ा होती है।
निष्कर्ष
बच्चों को दिशा देना जरूरी है, लेकिन उनकी आत्मा तोड़कर नहीं।
अनुशासन जरूरी है, अपमान नहीं।
अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं, पर प्रेम शर्तों पर नहीं होना चाहिए।
अगर बच्चा अपने ही घर में बोलने से डरता है, तो वह घर सिर्फ मकान रह जाता है—परिवार नहीं।








