महंगाई की मार: छोटे सिलेंडर के दाम बढ़े, प्रवासी मजदूरों का बिगड़ा बजट, उद्योग जगत चिंतित

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औद्योगिक इकाइयों की रीढ़ हैं प्रवासी श्रमिक, सरकार से राहत की मांग—विनोद बापना

गुरुग्राम (जतिन/राजा): कमर्शियल गैस सिलेंडरों के साथ-साथ 5 किलोग्राम वाले छोटे सिलेंडरों की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी ने प्रवासी मजदूरों की आर्थिक स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इस मुद्दे पर भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) हरियाणा काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य एवं कैपेरो मारुति के सीईओ विनोद बापना ने गहरी चिंता जताई है।

उन्होंने कहा कि गुरुग्राम जैसे औद्योगिक हब में रहने वाले लाखों प्रवासी मजदूर अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए छोटे सिलेंडरों पर निर्भर हैं। मानेसर, उद्योग विहार और पटौदी जैसे क्षेत्रों में रहने वाले श्रमिकों के लिए ये सिलेंडर इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे कम लागत में उपलब्ध होते हैं और एकमुश्त बड़े खर्च से बचाते हैं।

बढ़ती कीमतों ने इन मजदूरों की बचत को लगभग खत्म कर दिया है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि उनके सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो रहा है। बापना ने कहा कि प्रवासी मजदूर औद्योगिक इकाइयों की असली ताकत और रीढ़ हैं। यदि उनकी बुनियादी जरूरतों, विशेषकर रसोई गैस, की कीमतों में लगातार वृद्धि होती रही तो इसका सीधा असर उनकी कार्यक्षमता और उत्पादन पर पड़ेगा।

उन्होंने सरकार से अपील की कि मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए 5 किलोग्राम वाले सिलेंडरों की कीमतों पर पुनर्विचार किया जाए और इनमें कटौती की जाए, ताकि मजदूर वर्ग को राहत मिल सके।

बापना ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर महंगाई का दबाव इसी तरह बढ़ता रहा तो प्रवासी मजदूर अपने गांवों की ओर लौटने को मजबूर हो सकते हैं, जिससे उद्योगों में श्रमिकों की कमी पैदा हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि गुरुग्राम की औद्योगिक इकाइयां पूरी तरह से इन श्रमिकों के कौशल पर आधारित हैं। उनकी आर्थिक अस्थिरता उद्योगों की विकास दर को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में प्रवासी मजदूरों के हितों की रक्षा करना केवल सामाजिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भी बेहद जरूरी है।

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Author: Bharat Sarathi

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