समाज को ‘अनसोशल’ बना रहा है ‘सोशल मीडिया’

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डॉ. शैलेश शुक्ला

“सोशल” शब्द अपने भीतर सहजता, आत्मीयता और मानवीय जुड़ाव का भाव समेटे होता है—लोगों से मिलना, संवाद करना और रिश्तों को जीवंत बनाए रखना। लेकिन जब यही शब्द “सोशल मीडिया” के साथ जुड़ता है, तो इसका अर्थ धीरे-धीरे बदलता हुआ नजर आता है। लोगों को जोड़ने के लिए बना यह माध्यम कई बार उन्हें भीतर से अलग-थलग भी कर रहा है।

यह विरोधाभास केवल तकनीकी नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है। सवाल यह नहीं कि सोशल मीडिया अच्छा है या बुरा, बल्कि यह है कि इसका प्रभाव हमारे रिश्तों, व्यवहार और संवेदनाओं पर किस दिशा में पड़ रहा है।

आज का व्यक्ति पहले से अधिक “कनेक्टेड” दिखता है, लेकिन भीतर से कहीं अधिक अकेला होता जा रहा है। हजारों “फॉलोअर्स” और सैकड़ों “लाइक्स” के बीच भी सच्चे संवाद का अभाव साफ महसूस होता है। यह वह दौर है, जहाँ बातचीत ज्यादा है, लेकिन संवाद कम; संपर्क अधिक है, लेकिन संबंध कम।

सोशल मीडिया ने संवाद की शैली बदल दी है। पहले आमने-सामने की बातचीत में भावनाओं की गहराई होती थी, अब वही संवाद शब्दों और इमोजी तक सीमित हो गया है। इससे अभिव्यक्ति आसान जरूर हुई है, लेकिन उसकी गहराई कम हो गई है। जब चेहरे के भाव, आवाज़ का उतार-चढ़ाव और उपस्थिति का एहसास गायब हो जाए, तो संवाद सतही बन जाता है।

इस बदलाव का सबसे अधिक असर रिश्तों पर पड़ा है। रिश्ते केवल संपर्क से नहीं, बल्कि समय, संवेदना और समझ से बनते हैं। सोशल मीडिया ने संपर्क आसान किया, लेकिन ध्यान और समय को खंडित कर दिया। आज हम कई लोगों से जुड़े हैं, पर किसी एक के साथ पूरी तरह मौजूद नहीं। यह “आधा-अधूरा जुड़ाव” रिश्तों की जड़ों को कमजोर करता है।

सोशल मीडिया हमारी सोच को भी प्रभावित कर रहा है। एल्गोरिदम हमें वही दिखाते हैं, जो हम पहले से पसंद करते हैं। इससे हम एक “डिजिटल घेरे” में सिमट जाते हैं, जहाँ अलग विचारों के लिए जगह कम होती जाती है। नतीजतन, आलोचनात्मक सोच कमजोर पड़ती है और असहमति को स्वीकार करने की क्षमता घटती है—जो किसी स्वस्थ समाज के लिए चिंता का विषय है।

इसके साथ ही, तुलना की संस्कृति भी तेजी से बढ़ी है। लोग अपने जीवन के सबसे बेहतर पहलुओं को साझा करते हैं, जिससे देखने वालों को लगता है कि दूसरों का जीवन उनसे अधिक बेहतर है। यह तुलना व्यक्ति के आत्मविश्वास और संतोष को प्रभावित करती है और उसे भीतर से असंतुष्ट बना सकती है।

समय के उपयोग में भी बड़ा बदलाव आया है। जो समय पहले परिवार और समाज के साथ बीतता था, वह अब स्क्रीन पर खर्च हो रहा है। इससे न केवल सामाजिक जुड़ाव कमजोर हो रहा है, बल्कि संवाद कौशल और संवेदनशीलता भी प्रभावित हो रही है।

हालांकि, यह भी सच है कि सोशल मीडिया केवल नकारात्मक नहीं है। इसने अभिव्यक्ति को मंच दिया, दूरियों को कम किया और कई सामाजिक आंदोलनों को गति दी। समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग में है।

जरूरत इस बात की है कि हम इसके उपयोग में संतुलन और सजगता लाएं। हमें तय करना होगा कि तकनीक हमारे जीवन को नियंत्रित करे या हम तकनीक को। हर “नोटिफिकेशन” जरूरी नहीं होता और हर “अपडेट” पर प्रतिक्रिया देना भी आवश्यक नहीं।

परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। बच्चों और युवाओं को शुरुआत से ही जिम्मेदार उपयोग सिखाना होगा, ताकि वे वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच संतुलन बना सकें।

अंततः, सच्चा “सोशल” होना केवल ऑनलाइन सक्रियता से नहीं आता, बल्कि वास्तविक जीवन में लोगों से जुड़ने, उन्हें समझने और उनके साथ समय बिताने से आता है। यदि हम इस मूल सत्य को भूल जाते हैं, तो हम तकनीकी रूप से जुड़े होने के बावजूद सामाजिक रूप से अकेले हो जाएंगे।

आने वाले समय में तकनीक और उन्नत होगी, लेकिन यह सवाल हमेशा रहेगा—क्या हम सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं, या सोशल मीडिया हमें उपयोग कर रहा है?

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Author: Bharat Sarathi

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