सच की आवाज़ को सुरक्षित रखना ही लोकतंत्र की असली रक्षा है
बाबूलाल नागा

हर वर्ष 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को मजबूत करने का अवसर है। किसी भी देश में प्रेस की स्वतंत्रता इस बात का प्रमाण होती है कि वहां अभिव्यक्ति की कितनी आजादी है। जहां मीडिया स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक होता है, वहां जनता जागरूक रहती है, सरकार जवाबदेह रहती है और लोकतंत्र मजबूत होता है।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की घोषणा संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1993 में की थी। इसका उद्देश्य दुनिया भर में प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को रेखांकित करना, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रति जनचेतना बढ़ाना था। आज जब सूचना का युग अपने चरम पर है, तब यह दिवस और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है।
मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ-साथ प्रेस जनता और सत्ता के बीच सेतु का काम करता है। मीडिया सरकार की नीतियों, योजनाओं और कार्यप्रणाली पर नजर रखता है तथा जनता की समस्याओं को सामने लाता है। यही कारण है कि स्वतंत्र मीडिया किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
लेकिन आज सबसे बड़ी चिंता यह है कि सच सामने लाने वाले पत्रकार खुद असुरक्षित होते जा रहे हैं। दुनिया भर में पत्रकारों को धमकियां दी जाती हैं, उन पर हमले होते हैं, झूठे मुकदमे दर्ज किए जाते हैं और कई बार उनकी हत्या तक कर दी जाती है। भारत में भी ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। कई पत्रकार भ्रष्टाचार, अपराध और सत्ता के दुरुपयोग का पर्दाफाश करते हुए अपनी जान गंवा चुके हैं। यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती।
पत्रकार जब किसी घोटाले, अन्याय, अपराध या जनविरोधी नीति का खुलासा करते हैं, तब वे केवल खबर नहीं देते, बल्कि समाज को सच से परिचित कराते हैं। उनका कार्य जनता के अधिकारों की रक्षा करना है। यदि पत्रकारों को डराकर चुप करा दिया जाएगा, तो समाज तक सच कैसे पहुंचेगा? इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा केवल पत्रकारों का मुद्दा नहीं, बल्कि जनता के जानने के अधिकार का मुद्दा है।
आज कई बार देखा जाता है कि सरकारों की आलोचना करने वाले मीडिया संस्थानों पर छापेमारी होती है, जांच एजेंसियों का दबाव बनाया जाता है, विज्ञापनों के जरिए आर्थिक दबाव डाला जाता है और विरोधी स्वरों को कमजोर करने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए घातक है। सत्ता को आलोचना सहने की क्षमता रखनी चाहिए, क्योंकि आलोचना ही लोकतंत्र को स्वस्थ बनाती है।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का अनुच्छेद 19 भी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मूल अधिकार मानता है। ऐसे में प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला सीधे-सीधे नागरिक अधिकारों पर हमला है। यदि मीडिया स्वतंत्र नहीं रहेगा तो जनता तक सही सूचना नहीं पहुंचेगी और भ्रम, डर तथा प्रचार का माहौल बनेगा।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि प्रेस को केवल “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कह देने से काम नहीं चलेगा। पत्रकारों को कानूनी सुरक्षा, सुरक्षित कार्य वातावरण और निष्पक्ष संस्थागत संरक्षण देना होगा। पत्रकार सुरक्षा कानून बनाया जाना चाहिए, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार निर्भय होकर अपना कर्तव्य निभा सकें।
साथ ही मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। पत्रकारिता का मूल धर्म सत्य, निष्पक्षता और जनहित है। यदि मीडिया स्वयं पक्षपात, सनसनी और कॉर्पोरेट दबाव में काम करेगा, तो उसकी विश्वसनीयता कमजोर होगी। इसलिए मीडिया संस्थानों को भी आत्मनियंत्रण, नैतिकता और तथ्यपरकता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
आज सोशल मीडिया और फेक न्यूज के दौर में स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है। झूठी सूचनाओं और अफवाहों के बीच वही मीडिया समाज को सही दिशा दे सकता है, जो तथ्यों पर आधारित हो और निर्भीक होकर सच कह सके।
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हमें उन साहसी पत्रकारों को नमन करना चाहिए जिन्होंने सच की राह में अपना जीवन तक बलिदान कर दिया। साथ ही यह संकल्प लेना चाहिए कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे, पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और लोकतंत्र की इस अमूल्य ताकत को कमजोर नहीं होने देंगे।
क्योंकि जब मीडिया स्वतंत्र होता है, तब जनता मजबूत होती है; जब जनता मजबूत होती है, तब लोकतंत्र सुरक्षित रहता है। इसलिए आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत है—आजाद, निष्पक्ष और निर्भीक मीडिया।








