विष्णु नागर………जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष

बिना शिखा और बिना जनेऊ के आधुनिक चाणक्य जी अपने चंद्रगुप्त को पश्चिम बंगाल की विजयश्री भेंट करना चाहते थे। लेकिन तमाम हिकमतों के बावजूद जब पहले चरण में 92.9 प्रतिशत मतदान हो गया—और वह भी उन इलाकों में जहां सबसे कड़ी किलेबंदी की गई थी—तो उनकी सिट्टी-पिट्टी ही नहीं, गिट्टी भी गुम हो गई।
फिर भी उन्हें पूरा भरोसा है कि चुनाव आयोग ऐसा कोई कमाल जरूर दिखाएगा कि 4 मई को नतीजे सबको चौंका देंगे—और उनकी चाणक्यगिरी सुरक्षित रह जाएगी।
दरअसल, उनका असली प्लान यह साबित करना था कि उनका राजा चंद्रगुप्त मौर्य हो या न हो, लेकिन वे स्वयं चाणक्य हैं—इस पर कोई संदेह नहीं रहना चाहिए। इस भ्रम के लिए वे अकेले जिम्मेदार नहीं हैं; इसमें पत्रकार, गोदी मीडिया और यहां तक कि उनके विरोधियों का भी बड़ा योगदान है, जिन्होंने बार-बार उन्हें “चाणक्य” कहकर उनका दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा दिया।
इतना कि वे यह भी भूल बैठे हैं कि वे अमित शाह हैं—और नरेंद्र मोदी की सरकार में गृहमंत्री हैं। अब वे चाणक्य होने के मुगालते में एसी कमरों में पसीना बहा रहे हैं।
उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि यह इक्कीसवीं सदी है—चाणक्य के करीब ढाई हजार साल बाद का समय। अब यहां राजा नहीं होते। जो खुद को राजा समझने लगते हैं, वे इतिहास के पन्नों में इतने नीचे दब जाते हैं कि उनकी आह तक सुनाई नहीं देती।
असली चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य का नाम तो इतिहास में दर्ज है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के इन ‘चाणक्यों’ और ‘चंद्रगुप्तों’ का जिक्र शायद फुटनोट में भी न मिले। हालांकि इन्हें किताब और फुटनोट का अंतर समझना भी जरूरी नहीं—“एंटायर पॉलिटिकल साइंस” के विद्यार्थियों को एमए करने के लिए अब किताबें पढ़ने की जरूरत जो नहीं रही!
चाणक्य होने के भारी बोझ तले दबे शाह जी आज यह साबित करने में जुटे हैं कि आधुनिक भारत के असली चाणक्य वही हैं। बल्कि सच तो यह है कि उनके अनुसार तीसरी-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद अगर कोई चाणक्य पैदा हुआ है, तो वह सिर्फ वे ही हैं।
क्योंकि वे चाणक्य हैं, इसलिए उनका राजा चंद्रगुप्त है—वरना उस बेचारे की क्या हैसियत! यानी वे हैं, इसलिए मोदी जी ‘मौर्य’ हैं; जिस दिन वे चाणक्य नहीं रहेंगे, उस दिन ‘मौर्य’ भी धराशायी हो जाएंगे।
चाणक्य जी बजरंग बली का नाम लेकर बंगाल की रणभूमि में कूदे—अकेले नहीं, बल्कि चुनाव आयोग, ईडी, सीबीआई, अर्द्धसैनिक बलों, नेताओं की फौज, धन की थैलियों और हिंदू-मुसलमान के समीकरणों जैसे सैकड़ों औजारों के साथ।
उन्होंने ऐसा भय का वातावरण बनाया, जिसकी मिसाल आजाद भारत में दुर्लभ है। अब वे चतुरंगिणी नहीं, “बहुरंगिणी सेना” के सेनापति हैं—साम, दाम, दंड, भेद के साथ-साथ उन हथियारों से लैस, जिनकी कल्पना असली चाणक्य ने भी नहीं की होगी।
न ईडी थी, न सीबीआई, न चुनाव आयोग—और न ही वोट चोरी या वोट कटाई जैसी कलाएं। हिंदू-मुसलमान का खेल भी तब राजनीति का हिस्सा नहीं था।
इस लिहाज से आधुनिक चाणक्य के सामने प्राचीन चाणक्य कहीं नहीं ठहरते।
‘दीदी ओ दीदी’ जैसे नारों के बावजूद पिछली बार ममता बनर्जी को हराना संभव नहीं हुआ था। इस बार भी उम्मीद चुनाव आयोग और बजरंग बली पर ही टिकी है।
अगर इस बार भी चाणक्यगिरी काम न आई, तो ‘मौर्य’ पहले से मौजूद विवादों के चलते और संकट में आ जाएंगे—और साथ में चाणक्य जी का भी बंटाधार तय है। बारह साल की ‘मेहनत’ पर पानी फिर सकता है।
हे चुनाव आयोग के प्रभु, इन दोनों ने आप पर इतना भरोसा किया है—तो कुछ करिश्मा दिखाइए भी। आखिर ‘निष्पक्ष’ चुनाव करवाने के पीछे कोई तो मकसद होगा!
और जहां तक संविधान का सवाल है—अब वह एक ऐसा ग्रंथ बन चुका है, जिसके आगे सिर झुका देना ही उसका पालन माना जाता है।
क्यों मौर्य साहब, मैंने कुछ गलत कहा?







