प्रधानमंत्री जी, कम से कम मातृ शक्ति को तो सियासत का केंद्र न बनाइये

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— राजेश श्रीवास्तव

कल जब सदन में महिला आरक्षण संशोधन बिल पारित नहीं हो सका, तभी से यह आशंका बनने लगी थी कि इसे जिस राजनीतिक उद्देश्य से लाया गया था, उसका अगला चरण जल्द ही सामने आएगा। और अपेक्षा के अनुरूप, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रात साढ़े आठ बजे देश के सामने आए। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार उनके संबोधन को लेकर कोई कौतूहल नहीं था—क्योंकि लोगों को पहले से अंदाज़ा था कि यह भाषण विपक्ष पर प्रहार और महिला मुद्दे के राजनीतिक उपयोग के इर्द-गिर्द ही रहेगा।

यहीं से महिला आरक्षण बिल पर सियासत ने स्पष्ट रूप ले लिया।

प्रधानमंत्री जी, जब देश वैश्विक तनावों, युद्ध जैसे हालात और आर्थिक दबावों से जूझ रहा था, तब आपने संवाद जरूरी नहीं समझा। जब जनता गैस सिलेंडर की कतारों में खड़ी थी, तब भी आप मौन रहे। जब अंतरराष्ट्रीय घटनाओं—जैसे ईरान के होर्मुज क्षेत्र में भारतीय टैंकरों पर हमले—ने चिंता बढ़ाई, तब भी आपकी ओर से कोई सीधा संवाद नहीं आया। लेकिन महिला आरक्षण बिल पर राजनीतिक संदेश देने के लिए आप तुरंत सामने आ गए।

आपने वही दोहराया, जो पिछले दो दिनों से सदन में आपकी पार्टी के नेता कह रहे थे।

प्रधानमंत्री जी, यदि वास्तव में महिलाओं को सशक्त करना है, तो इसके लिए विधेयक लाने की अनिवार्यता नहीं है। आप देश की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं—आप अपने स्तर पर अधिक महिलाओं को टिकट दे सकते हैं, उन्हें कैबिनेट और महत्वपूर्ण संस्थाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दे सकते हैं। सवाल नीयत का है, प्रक्रिया का नहीं।

जब मणिपुर में महिलाओं के साथ अमानवीय घटनाएं हो रही थीं, तब आपका “नारी शक्ति” के प्रति समर्पण क्यों नहीं दिखा? जब महिलाओं को सरेआम अपमानित किया जा रहा था, तब आपकी संवेदना सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं झलकी?

आपने अपने संबोधन में भारतीय जनता पार्टी की मंशा को सकारात्मक बताते हुए कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी और सपा को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही, आपने तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का उल्लेख भी किया—जहां निकट भविष्य में चुनाव होने हैं। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि यह पूरा घटनाक्रम चुनावी रणनीति का हिस्सा है।

प्रधानमंत्री जी, जनता अब समझदार हो चुकी है। वह हर कदम के राजनीतिक निहितार्थ को पहचानती है। यदि आपकी नीयत साफ है, तो वर्तमान 543 लोकसभा सीटों में से 33% महिलाओं को टिकट देकर उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।

सच यह भी है कि यह विधेयक पहले ही 2023 में पारित हो चुका था। यदि सरकार चाहती, तो 2024 से ही इसे लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे यह धारणा बनती है कि इसे परिसीमन जैसे जटिल मुद्दों से जोड़कर राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में कांग्रेस ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। इंदिरा गांधी का नेतृत्व, 1971 का युद्ध, प्रतिभा पाटिल का राष्ट्रपति बनना, सुचेता कृपलानी और शीला दीक्षित का लंबा शासन—ये सभी उदाहरण महिला नेतृत्व की मजबूती को दर्शाते हैं।

इसके अलावा, राजीव गांधी द्वारा लाए गए 73वें और 74वें संविधान संशोधन ने स्थानीय निकायों में महिलाओं को व्यापक प्रतिनिधित्व दिलाया, जो आज कई राज्यों में 50% तक पहुंच चुका है।

राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवाल—जैसे तत्काल लागू करने की बात और ओबीसी आरक्षण का अभाव—भी विचारणीय हैं।

एडीआर के आंकड़े बताते हैं कि 18वीं लोकसभा के लगभग 46% सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ गंभीर आरोप भी शामिल हैं। ऐसे में “नारी शक्ति” का नारा तभी सार्थक होगा, जब राजनीतिक दल अपने भीतर भी सुधार लाएं।

एक ओर “नारी शक्ति वंदन” का वादा है, दूसरी ओर जमीनी हकीकत में महिलाओं का अपमान भी दिखाई देता है। यह विरोधाभास सवाल खड़े करता है—क्या यह वास्तव में महिला सशक्तिकरण का प्रयास है या चुनावी रणनीति?

तीन विधेयकों को एक साथ लाना, विपक्ष को घेरना और फिर राजनीतिक संदेश देना—यह पूरी प्रक्रिया एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।

अंततः सवाल यही है—क्या यह नारी का सम्मान है, या चुनावी प्रबंधन का एक और अध्याय?

जनता अब जवाब चाहती है—नारे नहीं, नीयत।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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