महिला आरक्षण की आड़ में सत्ता संतुलन का खेल? संसद में उत्तर बनाम दक्षिण की सीधी टक्कर

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महिला आरक्षण बिल पर सहमति, लेकिन परिसीमन से जोड़ने पर टकराव; विशेष सत्र में सियासी ध्रुवीकरण तेज

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

नई दिल्ली/गोंदिया, 16 अप्रैल 2026। महिला आरक्षण का ऐतिहासिक वादा अब देश की सबसे बड़ी सियासी खींचतान में बदल गया है। संसद के विशेष सत्र में पेश विधेयकों ने साफ कर दिया कि यह मुद्दा अब महिलाओं के अधिकारों से आगे बढ़कर सत्ता संतुलन, क्षेत्रीय वर्चस्व और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुका है।

भारत की संसदीय राजनीति इस समय एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहां एक ओर महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रयास दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर परिसीमन (डेलिमिटेशन) के माध्यम से राजनीतिक शक्ति संतुलन में संभावित बदलाव ने व्यापक विवाद को जन्म दिया है।

विशेष संसद सत्र में सरकार द्वारा पेश महिला आरक्षण से संबंधित संवैधानिक संशोधन, परिसीमन बिल और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े संशोधन विधेयकों ने राजनीतिक माहौल को पूरी तरह गर्मा दिया है। इनमें सबसे अधिक ध्यान महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर केंद्रित रहा।

वोटिंग के दौरान सरकार को 251 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 185 सांसदों ने विरोध किया। ध्वनि मत के बजाय डिवीजन की मांग ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह मुद्दा केवल नीतिगत नहीं बल्कि गहरे राजनीतिक और क्षेत्रीय विभाजन का विषय बन चुका है।

यदि प्रस्तावित व्यवस्था लागू होती है, तो लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 850 करने और उनमें से लगभग 272 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है।

यहां असली विवाद महिला आरक्षण को लेकर नहीं, बल्कि उसे परिसीमन और जनगणना से जोड़ने को लेकर है। विपक्ष का कहना है कि महिला आरक्षण को तुरंत लागू किया जाना चाहिए, न कि इसे जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़कर टाला जाए।

परिसीमन का मूल आधार जनसंख्या होता है, और यही इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है। यदि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है, तो उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को लाभ मिल सकता है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है।

दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, और अब उन्हें कम प्रतिनिधित्व देकर सजा दी जा रही है। यह स्थिति भारत के संघीय ढांचे के लिए चुनौती बन सकती है।

सरकार का पक्ष है कि सभी राज्यों में सीटों की संख्या संतुलित रूप से बढ़ाई जाएगी और किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा। वहीं विपक्ष इसे सत्ता संतुलन बदलने की रणनीति के रूप में देख रहा है।

एक और बड़ा सवाल यह है कि क्या परिसीमन नई जनगणना के आधार पर होना चाहिए। विपक्ष का कहना है कि बिना ताजा आंकड़ों के परिसीमन करना तर्कसंगत नहीं होगा, जबकि सरकार ने इसमें लचीलापन रखा है।

लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करना अपने आप में ऐतिहासिक कदम है। इससे प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, लेकिन साथ ही निर्णय प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है।

“यह सिर्फ महिला आरक्षण का सवाल नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के ‘पावर री-इंजीनियरिंग’ का ब्लूप्रिंट है। यदि इसे परिसीमन से जोड़कर लागू किया गया, तो यह महिलाओं को अधिकार देने से ज्यादा राजनीतिक समीकरण साधने का औजार बन सकता है।”

विश्लेषण

महिला आरक्षण बनाम परिसीमन: असली टकराव
विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, बल्कि उसे परिसीमन से जोड़ने का विरोध कर रहा है।

परिसीमन का गणित और क्षेत्रीय असंतुलन
उत्तर भारत को संभावित लाभ और दक्षिण भारत को संभावित नुकसान की आशंका ने बहस को क्षेत्रीय रूप दे दिया है।

सत्ता संतुलन पर राजनीतिक आशंका
विपक्ष को डर है कि परिसीमन के बाद संसद में सत्ता संतुलन और अधिक एकतरफा हो सकता है।

जनगणना का सवाल
बिना नई जनगणना के परिसीमन करने पर पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

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Author: Bharat Sarathi

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