4 साल की मासूम से दरिंदगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, गुरुग्राम पुलिस को लगाई फटकार — “आरोपियों को बचाने में लगी रही पुलिस”

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POCSO की सख्त धारा लगाने से बचने पर कोर्ट नाराज़, तीन महिला IPS अधिकारियों की SIT गठित; CWC और डॉक्टर को भी नोटिस

गुरुग्राम, 26 मार्च 2026। चार साल की मासूम के साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए साफ कहा कि “पुलिस ने आरोपियों को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की।” अदालत की यह टिप्पणी न केवल पुलिस व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि न्याय व्यवस्था में आमजन के भरोसे को भी चुनौती देती है।

बुधवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुरुग्राम पुलिस के कई अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया। कोर्ट ने पाया कि जहां इस जघन्य अपराध में POCSO एक्ट की धारा 6 (कठोर सजा वाली धारा) स्पष्ट रूप से लागू होती थी, वहीं पुलिस ने इसे धारा 10 के तहत दर्ज कर मामले को कमजोर करने का प्रयास किया।

अदालत ने तीखे शब्दों में कहा, “रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि यह मामला धारा 6 के अंतर्गत आता है, लेकिन पुलिस ने अज्ञात कारणों से इसे कम गंभीर धारा में दर्ज किया। यह बेहद गंभीर और चिंताजनक है।”

SIT गठित, तीन महिला IPS संभालेंगी जांच

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन वरिष्ठ महिला IPS अधिकारियों—कला रामचंद्रन, नाजनीन भसीन और अंशु सिंगला—की एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित की है। यह टीम अब पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच करेगी।

CWC और डॉक्टर भी सवालों के घेरे में

सिर्फ पुलिस ही नहीं, बल्कि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (CWC) और मेडिकल जांच से जुड़े डॉक्टर भी कोर्ट की सख्ती से नहीं बच सके।
कोर्ट ने CWC सदस्यों को नोटिस जारी करते हुए पूछा कि पीड़िता के बयान को नजरअंदाज कर कमजोर रिपोर्ट क्यों तैयार की गई। साथ ही, मैक्स अस्पताल की उस डॉक्टर को भी नोटिस दिया गया है, जिसने पहले यौन उत्पीड़न की पुष्टि की और बाद में अपना स्टैंड बदल लिया।

पीड़िता को मिला दोहरा आघात

पीड़ित परिवार की याचिका में आरोप लगाया गया कि पुलिस की लापरवाही और असंवेदनशील रवैये के कारण बच्ची को बार-बार बयान देने के लिए मजबूर किया गया, जिससे उसे मानसिक रूप से और अधिक पीड़ा झेलनी पड़ी।
इस पर कोर्ट ने भी कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया ने पीड़िता के घाव भरने के बजाय उन्हें और गहरा किया है।

CBI जांच की मांग, पुलिस पर अविश्वास

परिजनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मामले की जांच CBI या SIT से कराने की मांग की थी। कोर्ट की टिप्पणियों से साफ है कि स्थानीय पुलिस पर भरोसा लगभग खत्म हो चुका है।

व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक जघन्य अपराध नहीं, बल्कि सिस्टम की संवेदनहीनता और जवाबदेही की कमी का भी आईना बन गया है। जब एक चार साल की बच्ची को न्याय दिलाने में ही इतनी बाधाएं खड़ी हो जाएं, तो यह पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

निष्कर्ष:

एक मासूम की चीखें अगर फाइलों में दब जाएं और न्याय के रखवाले ही सवालों के घेरे में खड़े हो जाएं, तो यह केवल कानून का नहीं, इंसानियत का भी संकट है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती उम्मीद की एक किरण जरूर है, लेकिन असली परीक्षा अब यह है कि क्या इस बच्ची को समय पर और सच्चा न्याय मिल पाएगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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