नई दिल्ली। भारतीय मुद्रा के मुकाबले अमेरिकी डॉलर ने पहली बार 93.30 रुपये का स्तर पार कर लिया है, जिससे देश के आर्थिक मोर्चे पर चिंता बढ़ गई है। रुपये में आई इस गिरावट को वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की निकासी से जोड़कर देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती और अमेरिका की सख्त मौद्रिक नीतियों के चलते उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर दबाव बना हुआ है। इसका सीधा असर भारतीय रुपये पर भी पड़ा है, जो लगातार कमजोर होता नजर आ रहा है।
रुपये की इस गिरावट का असर आम जनता पर भी पड़ सकता है। आयात महंगा होने से पेट्रोल-डीजल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका है। साथ ही, विदेश यात्रा और पढ़ाई भी महंगी हो सकती है।
हालांकि, निर्यातकों के लिए यह स्थिति कुछ हद तक राहत देने वाली हो सकती है, क्योंकि कमजोर रुपया उनके उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाता है।
सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही वैश्विक हालात में सुधार नहीं हुआ, तो रुपये पर दबाव आगे भी जारी रह सकता है।








