युद्ध की आग और शांति की राह

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

इतिहास गवाह है कि आम आदमी के सिर पर सत्ता की जिद, साम्राज्यवादी विस्तारवाद और रक्षा उद्योगों के मुनाफे ने हमेशा तलवार लटकाए रखी है। फिर भी, इतिहास यह भी सिखाता है कि भीषणतम रक्तपात के बीच से ही शांति की वह महीन धार निकलती है जो अंततः संवाद के पौधे उगाती है।

आज जब विश्व यूक्रेन से लेकर गाजा और लाल सागर तक फैली अशांति से थका हुआ है, तब यह समझना अनिवार्य है कि अतीत के युद्धों से शांति का मार्ग कैसे निकला और वर्तमान में नए प्रभावशाली भारत जैसे देश इस दिशा में क्या नई उम्मीद जगा रहे हैं। विश्व युद्ध पुराने हुए , यू एन ओ अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रहा, हाल के युद्धों की विवेचना समझी जा सकती है।

समाधान कैसे निकले?

इतिहास के बड़े संघर्ष केवल सैन्य जीत से नहीं बल्कि कूटनीतिक नवाचारों से ही समाप्त हुए हैं।

खाड़ी युद्ध (1991):

बहुपक्षीय कूटनीति का मॉडल इस युद्ध का अंत केवल ‘ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म’ की सैन्य श्रेष्ठता से नहीं हुआ, बल्कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के प्रस्ताव 687 के माध्यम से हुआ। इसे ‘मदर ऑफ ऑल रेजोल्यूशन’ कहा जाता है, जिसने युद्धविराम के लिए सीमांकन, निरीक्षण और क्षतिपूर्ति का एक कानूनी ढांचा तैयार किया। यहाँ शांति का सूत्र ‘सामूहिक सुरक्षा’ (Collective Security) था।

वियतनाम युद्ध:

जनमत और लंबी वार्ता वर्षों के संघर्ष के बाद 1973 के ‘पेरिस शांति समझौते’ ने रास्ता बनाया। यहाँ शांति का मुख्य कारण अमेरिकी घरेलू जनमत का दबाव और ‘फेस-सेविंग एग्जिट’ (सम्मानजनक वापसी) की कूटनीति थी।

शीत युद्ध का अंत:

व्यक्तिगत संवाद और विश्वास , रीगन और गोर्बाचेव के बीच ‘शिखर सम्मेलनों’ (Summit Diplomacy) ने साबित किया कि परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया को ‘हॉटलाइन’ और व्यक्तिगत विश्वास से बचाया जा सकता है।

वर्तमान संकट और भारत की वैश्विक भूमिका: शांति का नया ‘भारतीय मॉडल’

आज की वैश्विक राजनीति 1991 के मुकाबले कहीं अधिक जटिल है। शक्ति के केंद्र अब केवल पश्चिम में नहीं हैं। इस बदलते परिवेश में भारत की भूमिका एक ‘विश्वबंधु’ (Global Friend) के रूप में उभरी है।

खाड़ी (मिडल ईस्ट) में शांति के लिए भारत का प्रभाव

वर्तमान में खाड़ी क्षेत्र और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को कम करने में भारत निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर निर्णायक भूमिका निभा सकता है:

विश्वसनीय मध्यस्थ (Credible Mediator):

भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से है जिसके संबंध इजराइल और फिलिस्तीन, तथा ईरान और सऊदी अरब , दोनों ही पक्षों के साथ संतुलित और गहरे हैं। यह “डी-हाइफनेशन” (De-hyphenation) की नीति भारत को एक तटस्थ मेज़बान बनाती है, जो युद्ध रत पक्षों को एक टेबल पर बैठा सकता है।

आर्थिक एकीकरण (IMEC कॉरिडोर):

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) केवल व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि शांति का एक ढांचा है। जब राष्ट्रों के आर्थिक हित एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं, तो युद्ध की लागत (Cost of War) बहुत अधिक हो जाती है। भारत इस आर्थिक जुड़ाव के जरिए ‘स्थिरता’ का निर्यात कर रहा है।

मानवीय दृष्टिकोण और ‘Soft Power’:

यूक्रेन संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का मंत्र , “यह युद्ध का युग नहीं है”, अब वैश्विक शांति का नारा बन चुका है। भारत शांति को केवल रणनीतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक नैतिक अनिवार्यता के रूप में पेश करता है।

रणनीतिक स्वायत्तता:

भारत किसी सैन्य गुट का हिस्सा नहीं है। यह स्वायत्तता उसे वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज बनाती है, जिससे वह खाड़ी देशों को यह समझाने में सक्षम है कि क्षेत्रीय शांति के बिना वैश्विक विकास संभव नहीं है।

शांति की राह के स्थायी सूत्र

खाड़ी से यूक्रेन तक, शांति के लिए चार स्तंभ अनिवार्य समझ आते हैं:

संप्रभुता का सम्मान: जैसा कि भारत हमेशा कहता है, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का सम्मान और यूएन चार्टर का पालन ही बुनियादी शर्त है।

रोटी बनाम बारूद:

यूक्रेन के ‘ब्लैक सी ग्रेन इनिशिएटिव’ ने दिखाया कि जब दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो कट्टर दुश्मन भी समझौते के लिए मेज़ पर आते हैं।

क्षेत्रीय समाधान:

बाहरी हस्तक्षेप के बजाय क्षेत्रीय शक्तियों (जैसे भारत, तुर्की, सऊदी अरब) को समाधान की कमान संभालनी होगी।

डिजिटल और कूटनीतिक संवाद:

आज के दौर में युद्ध केवल मैदान पर नहीं, नैरेटिव में भी लड़े जाते हैं। भारत अपनी तकनीक और कूटनीति के मेल से भ्रामक सूचनाओं को रोककर शांति का माहौल बनाने में सक्षम है।

शांति , कमजोरी नहीं, सर्वोच्च साहस है

युद्ध शुरू करना सरल है, युद्ध रोकने के लिए ज्यादा साहस जरूरी होता है। युद्ध के लिए केवल अहंकार और सैन्य आदेश की आवश्यकता होती है। लेकिन शांति स्थापित करना साहस का काम है क्योंकि इसमें झुकना, सुनना और आम लोगों के साझा भविष्य के लिए समझौता करना पड़ता है।

आज भारत अपनी G20 अध्यक्षता की विरासत और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के विचार के साथ दुनिया को यह याद दिला रहा है कि शांति का मार्ग ‘शक्ति के संतुलन’ से नहीं, बल्कि ‘हृदय के संतुलन’ और साझा समृद्धि से निकलता है। यदि हम एक ऐसा वैश्विक नेतृत्व चुन सकें जो मिसाइलों के बजाय ‘सप्लाई चेन’ और ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ पर निवेश करे, तो भविष्य की पीढ़ियाँ युद्धों को समाचारों में नहीं, केवल इतिहास के पन्नों में देखेंगी।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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