-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

भारत जैसे 142 करोड़ से अधिक आबादी वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में करोड़ों बच्चे प्रतिदिन विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं। विद्यालय केवल पाठ्यपुस्तक ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक विकास और राष्ट्र के भविष्य की प्रयोगशाला हैं। ऐसे में यदि स्कूल परिसर ही असुरक्षित हो जाए, तो यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाता है।
धमतरी की घटना: चेतावनी की घंटी
हाल ही में धमतरी जिले के कुरूद स्थित एक सरकारी स्कूल में 7वीं-8वीं कक्षा के 35 बच्चों द्वारा ब्लेड से अपनी कलाई काटने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। काउंसलिंग में सामने आया कि बच्चों ने “देखा-देखी” में यह कदम उठाया। यह तथ्य किशोरावस्था में समूह प्रभाव (Peer Influence) की तीव्रता को दर्शाता है।
यह घटना केवल अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संवाद और विद्यालयी वातावरण की गंभीर कमी की ओर संकेत करती है। प्रश्न यह है—
- क्या स्कूलों में नियमित मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग की व्यवस्था है?
- क्या शिक्षक बच्चों के व्यवहार में सूक्ष्म बदलाव पहचानने के लिए प्रशिक्षित हैं?
- क्या बच्चों को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का सुरक्षित मंच मिलता है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक हैं, तो शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं को पुनर्संतुलित करने का समय आ चुका है।
जर्जर भवन और न्यायपालिका की चिंता

इसी क्रम में Rajasthan High Court की जयपुर बेंच ने सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों को लेकर राज्य सरकार के बजट को “ऊंट के मुंह में जीरा” बताया। यह टिप्पणी केवल एक राज्य की समस्या नहीं, बल्कि देशभर में स्कूल अवसंरचना की दयनीय स्थिति का प्रतीक है।
जब छतें कमजोर हों, दीवारों में दरारें हों, बिजली के तार खुले हों और शौचालय अनुपयोगी हों, तब बच्चों की सुरक्षा खतरे में पड़ना स्वाभाविक है। बजट और वास्तविक आवश्यकता के बीच की खाई को पाटना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) के माध्यम से मरम्मत, पुनर्निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जीवन रक्षा का कार्य है, न कि केवल प्रशासनिक प्रक्रिया।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: विकसित देशों से सीख
विकसित राष्ट्र भी इस चुनौती से अछूते नहीं हैं। 2022 में Uvalde के Robb Elementary School में हुई गोलीबारी ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया। इससे पहले 1999 में Columbine High School में हुई घटना ने वैश्विक स्तर पर स्कूल सुरक्षा पर बहस छेड़ दी थी।
इन घटनाओं ने सिद्ध किया कि आर्थिक समृद्धि और तकनीकी उन्नति स्वतः सुरक्षा की गारंटी नहीं देतीं। सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें जोखिम मूल्यांकन, निगरानी, प्रशिक्षण और सामुदायिक सहयोग की निरंतर आवश्यकता होती है। भारत को इन अनुभवों से सीखकर बहु-स्तरीय सुरक्षा मॉडल विकसित करना चाहिए।
नीति और प्रशासन की भूमिका
भारत में शिक्षा मुख्यतः राज्यों का विषय है, परंतु राष्ट्रीय नीति निर्माण में Ministry of Education की केंद्रीय भूमिका है। National Education Policy 2020 ने गुणवत्ता और नवाचार पर बल दिया है, किंतु सुरक्षा को स्वतंत्र और अनिवार्य स्तंभ के रूप में संस्थागत करने की आवश्यकता अभी भी शेष है।

स्कूल सुरक्षा नीति में निम्न प्रावधान अनिवार्य किए जाएँ—
- भवन एवं अग्नि सुरक्षा मानक
- विद्युत सुरक्षा और नियमित ऑडिट
- स्वच्छ पेयजल एवं उपयोगी शौचालय
- सीसीटीवी निगरानी प्रणाली
- प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी
- आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र
- वार्षिक अनिवार्य “स्कूल सेफ्टी ऑडिट” और सार्वजनिक रिपोर्टिंग
जिला प्रशासन और मुख्यमंत्री की जवाबदेही
जिला कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को नियमित औचक निरीक्षण करने चाहिए। निरीक्षण केवल कागजी न होकर उपकरणों की वास्तविक कार्यशीलता का परीक्षण करे। अग्निशामक यंत्र, सीसीटीवी, आपातकालीन निकास मार्ग, खेल मैदान और प्रयोगशालाएँ—सबकी भौतिक जाँच आवश्यक है।
साथ ही, मुख्यमंत्री स्तर पर त्रैमासिक समीक्षा बैठकें हों, जिनमें प्रत्येक जिले की सुरक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए। जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था से ही व्यवस्था प्रभावी बन सकती है।
समाज और अभिभावकों की सहभागिता
विद्यालय केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की साझी जिम्मेदारी हैं। अभिभावकों, स्थानीय निकायों, स्वयंसेवी संगठनों और पूर्व विद्यार्थियों को स्कूल प्रबंधन समितियों में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियान, जीवन कौशल प्रशिक्षण और नियमित संवाद कार्यक्रम बच्चों को सुरक्षित और आत्मविश्वासी बना सकते हैं।
निष्कर्ष
धमतरी की घटना एक चेतावनी है—यदि हम अब भी नहीं जागे तो भविष्य हमें माफ नहीं करेगा। शिक्षा की गुणवत्ता, डिजिटल नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक बच्चों का जीवन और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित न हो।
विद्यालयों को “ज्ञान का मंदिर” कहने से पहले उन्हें “सुरक्षा का किला” बनाना होगा। प्रशासनिक जवाबदेही, नियमित निरीक्षण, अंतरराष्ट्रीय मानकों की अनिवार्यता और समाज की सक्रिय भागीदारी ही इस दिशा में ठोस कदम हो सकते हैं।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र









