कमलेश पांडेय

पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया जारी है जिसमें लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाली एंट्रीज (जैसे माता-पिता का नाम मेल न खाना या आयु अंतर असंगत होना आदि की गहन जांच होती है। इसी को लेकर राज्य सरकार और केंद्रीय चुनाव आयोग के बीच उभरे विवाद को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 19-20 फरवरी 2026 को कलकत्ता हाईकोर्ट को वर्तमान और पूर्व न्यायिक अधिकारियों (जिला जज रैंक के) को तैनात करने का निर्देश दिया। ऐसा इसलिए कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग (ECI) के बीच विश्वास की कमी और सहयोग न होने से प्रक्रिया अटक गई थी।
लिहाजा इस अप्रत्याशित फैसले के राष्ट्रीय मायने अहम व दूरगामी साबित होंगे क्योंकि यह फैसला असाधारण परिस्थितियों में न्यायपालिका को निर्वाचन प्रक्रिया में सीधे शामिल करने का बेजोड़ उदाहरण है, जो राज्य-केंद्र संबंधों में तनाव को उजागर करता है। देखा जाए तो यह अन्य राज्यों (जैसे केरल, तमिलनाडु) में SIR विस्तार पर भी प्रभाव डाल सकता है, जहां समान विवाद हो सकते हैं। खास बात यह कि कोर्ट ने ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ और ‘ब्लेम गेम’ की आलोचना की, जो संवैधानिक संस्थाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता पर जोर देता है।
हालांकि इसको लेकर कुछ सार्वजनिक प्रभाव और चिंताएं दोनों हैं। यह ठीक है कि न्यायिक अधिकारियों की तैनाती से दावों-आपत्तियों का निपटारा तेज होगा, और उनकी निर्णय अदालती आदेश माने जाएंगे। हालांकि, इससे नियमित अदालती कार्य प्रभावित हो सकता है, जिसके लिए हाईकोर्ट को वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा गया है। यह बात अलग है कि राष्ट्रीय स्तर पर यह निर्वाचन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप को मजबूत बनाता है लेकिन राज्य सरकारों पर सहयोग न करने का दबाव बढ़ाता है।
यूँ तो इस फैसले से अन्य राज्यों पर सीधा कानूनी असर नहीं पड़ेगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे पश्चिम बंगाल की “असाधारण परिस्थितियों” (ट्रस्ट डेफिसिट और ब्लेम गेम) तक सीमित रखा। लेकिन जहां तक अन्य राज्यों में SIR स्थिति का सवाल है तो केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में जहां SIR पहले ही चल रहा था या विवादास्पद रहा, वहां बंगाल जैसी न्यायिक हस्तक्षेप की कोई तत्काल मांग नहीं दिख रही। वहीं 12 राज्यों (यूपी, बंगाल सहित) में SIR प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ चुकी, फॉर्म वितरण 95% पूरा हो चुका है।
जहां तक इस फैसले के संभावित प्रभाव की बात है तो यह फैसला अन्य राज्यों के लिए पूर्वाधार बन सकता है, जहां राज्य-ECI विवाद बढ़े तो न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का विकल्प खुले। चूंकि कोर्ट ने असाधारण कदम उठाने पर जोर दिया जो पारदर्शिता बढ़ाएगा लेकिन नियमित अदालती कार्य प्रभावित कर सकता है। फिर भी कोर्ट का यह रेयर ऑफ द रेयरेस्ट निर्णय/फैसला राज्य सरकारों को केंद्रीय संस्थाओं से सहयोग बढ़ाने का संदेश देता है, वरना समान निर्देश संभव है।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के दौरान सेंट्रल फोर्स की तैनाती की संभावना मजबूत दिख रही है, खासकर आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ में। इसलिए SIR सुनवाई के बाद चुनाव आयोग संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा पर विचार कर रहा है, क्योंकि प्रक्रिया में हिंसा, BLO धमकियां और विवाद बढ़े हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी हालात बिगड़ने पर पुलिस तैनाती की बात कही है और ECI के पास राज्य पुलिस न मानने पर सेंट्रल फोर्स लेने का अधिकार है। इसलिए मार्च में अंतिम मतदाता सूची प्रकाशन के बाद तनाव बढ़ने पर केंद्रीय बलों की तैनाती तय मानी जा रही है जो निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करेगी। विपक्ष इसे जरूरी बता रहा है जबकि राज्य सरकार राज्य पुलिस पर भरोसा जताती है लेकिन ECI अंतिम फैसला लेगा।









