विदेशी नागरिकता, विदेशी जुड़ाव और लोकतांत्रिक जवाबदेही

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गजेंद्र सिंह …….. लोक नीति विश्लेषक

हाल के दिनों में आसाम से कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई की पत्नी एलिज़ाबेथ कोलबर्न की विदेशी नागरिकता और उनके पेशेवर संबंधों को लेकर चर्चा हुई है। इसी के साथ यह सवाल भी उठा है कि उनके दोनों बच्चों की नागरिकता को लेकर कोई स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी अब तक क्यों सामने नहीं आई है। यह बहस किसी व्यक्ति के निजी जीवन में झाँकने के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से जुड़ी पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित जैसे बड़े सवालों से जुड़ी है।

लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा केवल क़ानूनी अनुपालन तक सीमित नहीं होती। उनसे यह भी अपेक्षित होता है कि वे सार्वजनिक विश्वास के उच्चतम मानकों पर खरे उतरें, विशेषकर तब, जब बात नागरिकता, विदेशी पेशेवर संबंधों, दोहरी निष्ठाओं या संभावित हित-संघर्ष की हो—इन विषयों पर अस्पष्टता स्वयं में संदेह को जन्म देती है। इसलिए ऐसी जानकारियों का स्पष्ट, सत्यापित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना लोकतांत्रिक जवाबदेही का एक अनिवार्य तत्व माना जाता है।

यह प्रश्न भारत में नया नहीं है। पिछले दो दशकों में अनेक वरिष्ठ राजनेताओं, संवैधानिक पदाधिकारियों और शीर्ष नौकरशाहों के पारिवारिक सदस्यों—विशेषकर बच्चों—का विदेश में अध्ययन, निवास या पेशेवर करियर सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट होता रहा है। उदाहरणस्वरूप, पूर्व रिज़र्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन ने स्वयं स्वीकार किया कि उनका पेशेवर और पारिवारिक जीवन लंबे समय तक अमेरिका में केंद्रित रहा। इसी प्रकार विदेश मंत्री एस. जयशंकर के पुत्र ध्रुव जयशंकर ने जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की और अमेरिका में कार्य व निवास से जुड़े रहे हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के पुत्र विवेक डोभाल के ब्रिटिश नागरिक होने और इंग्लैंड में रहने की रिपोर्ट्स सामने आई हैं. वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के पुत्र ध्रुव गोयल ने हार्वर्ड से पढ़ाई कर न्यूयॉर्क में एक वेंचर फंड स्थापित किया. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की पुत्री वांग्मयी परकाला ने अमेरिका की नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त की. पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की पुत्री तिलोत्तमा ने यूनिवर्सिटी ऑफ़ वारविक से पढ़ाई की और अमेरिका में बसने की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में रही है।

इसी तरह, राजद नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी का अपने बच्चों को विदेश में बसने की सलाह वाला बयान सार्वजनिक विवाद का विषय बना. भाजपा नेता संजय धोत्रे के पुत्र नकुल धोत्रे ने कैलिफ़ोर्निया से इंजीनियरिंग कर वहीं बसने का रास्ता चुना. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के पौत्र और रोहिणी आचार्य के पुत्र आदित्य ने सिंगापुर की अनिवार्य नेशनल सर्विस के तहत बेसिक मिलिटरी ट्रेनिंग शुरू की. प्रियंका गांधी वाड्रा के दोनों बच्चों—रायहान और मिराया—ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा ग्रहण की. कांग्रेस सांसद शशि थरूर के जुड़वाँ पुत्र ईशान और कनिष्क थरूर का पालन-पोषण और करियर विदेशों में रहा है तथा सलमान खुर्शीद के बच्चों की शिक्षा और पेशेवर गतिविधियाँ भी यूके और अमेरिका से जुड़ी रही हैं। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि वैश्विक शिक्षा और करियर आज भारतीय सार्वजनिक जीवन की एक स्थापित वास्तविकता बन चुके हैं।

प्रशासनिक तंत्र में भी ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ कैबिनेट सचिव स्तर के अधिकारियों, संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े नौकरशाहों और नीति-निर्माताओं के बच्चे पश्चिमी देशों में बस चुके हैं, अक्सर उच्च शिक्षा या निजी कॉर्पोरेट करियर के कारण। यह अपने आप में न तो अपराध है और न ही किसी व्यक्ति की देशभक्ति पर सीधा प्रश्न लेकिन नीतिगत स्तर पर मूल प्रश्न कुछ और है— क्या संवेदनशील सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए पारिवारिक विदेशी जुड़ाव, नागरिकता स्थिति और वैश्विक हितों की पारदर्शी घोषणा का कोई स्पष्ट और समान मानक होना चाहिए?

यहीं से चीन की तथाकथित “नेकेड लीडरशिप पॉलिसी” की चर्चा प्रासंगिक हो जाती है। यह नीति उन अधिकारियों पर लागू होती है जिनके पति/पत्नी या बच्चे विदेश में रहते हैं, विदेशी नागरिकता रखते हैं या स्थायी निवास के धारक हैं। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का तर्क रहा है कि ऐसे अधिकारी विदेशी प्रभाव, ब्लैकमेल, हितों के टकराव और राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों के प्रति अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। इसी सोच के तहत 2010 के बाद चीन ने ऐसे अधिकारियों को संवेदनशील पदों से हटाने, पदोन्नति रोकने, अतिरिक्त निगरानी लागू करने और कई मामलों में अनिवार्य स्थानांतरण जैसे कदम उठाए। भ्रष्टाचार-विरोधी अभियानों में इस नीति का उपयोग एक संदेश के रूप में किया गया—कि राज्य सत्ता और निजी जीवन के वैश्विक हितों का टकराव स्वीकार्य नहीं है। निस्संदेह, चीन का मॉडल लोकतांत्रिक नहीं है और भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में उसकी नकल संभव भी नहीं। लेकिन इसका मूल सिद्धांत—नेतृत्व में पारदर्शिता, संस्थागत निष्ठा और बाहरी प्रभाव से दूरी—आज वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन चुका है।

अतः प्रश्न यह नहीं है कि भारत को चीन जैसी नीति अपनानी चाहिए या नहीं। असली प्रश्न यह है कि एक लोकतांत्रिक गणराज्य में, जहाँ सत्ता जनता के विश्वास पर टिकी है, संवेदनशील सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से पारिवारिक और वैश्विक हितों को लेकर कितनी पारदर्शिता अपेक्षित है? यह बहस व्यक्तियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्रीय हित, संस्थागत ईमानदारी और लोकतांत्रिक जवाबदेही के मानकों को स्पष्ट करने के लिए आवश्यक है।

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Author: Bharat Sarathi

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