· इंडो-यूएस ट्रेड डील जबरदस्ती थोपी गई आर्थिक गुलामी है, जो स्वीकार्य नहीं – दीपेंद्र हुड्डा
· बीजेपी का दावा मजबूत सरकार का था लेकिन वो मजबूर सरकार कैसे बन गयी-दीपेंद्र हुड्डा
· कौन सी ऐसी मजबूरी है जो बीजेपी सरकार ने किसान विरोधी फैसला लिया – दीपेंद्र हुड्डा
· देश की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं होने देंगे, क्योंकि राष्ट्र सर्वोपरि है – दीपेंद्र हुड्डा

चंडीगढ़, 19 फरवरी। सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि भाजपा सरकार ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की आड़ में देश के किसान, बिजली उपभोक्ताओं, डेटा प्राइवेसी समेत अलग-अलग सेक्टरों की बलि चढ़ाने का काम किया है। यह व्यापार समझौता नहीं, जबरदस्ती थोपी गई आर्थिक गुलामी है। ये स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि राष्ट्र सर्वोपरि है। आत्मनिर्भर भारत की बात करने वाले लोग आज अमेरिका-निर्भर भारत की तरफ कदम बढ़ा रहे है। कांग्रेस पार्टी देश की संप्रभुता के साथ समझौता नहीं होने देगी। उन्होंने आज पटना में कांग्रेस पार्टी की तरफ से विशेष पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। इस दौरान बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम, पूर्व CLP शकील अहमद खान, पूर्व CPS राव दान सिंह, प्रदेश प्रवक्ता राजेश राठौर समेत वरिष्ठ नेतागण मौजूद रहे।
दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि भारत के कृषि बाजार में अमेरिका के खेती व खाद्य उत्पादों का आयात किसान की रोजी-रोटी पर सीधा हमला है। ‘‘देशहित’’ ‘‘गिरवी’’ रख व्यापार समझौता ‘‘मंजूर नहीं’’ हो सकता। खेत-खलिहान-किसान की रोजी-रोटी पर हमला मंजूर नहीं और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़ मंजूर नही। व्यापार समझौते की आड़ में देशहित ओर लोकहित की बलि नहीं दी जा सकती। भारत के 144 करोड़ जनमानस इसे स्वीकार नहीं करेंगे। आज से पहले देश का कृषि सेक्टर कभी दुनिया के लिये इस तरह से खोला नहीं गया। क्योंकि हमारे किसान देश का पेट भरने में समर्थ हैं तो बाहर से क्यों मंगवाएं। ट्रेड डील में मक्के को डीडीजी लिखा गया है, इसी तरह ज्वार को लाल ज्वार लिखा गया है। यदि बाहर से मक्का, ज्वार, कपास शून्य टैरिफ पर हिन्दुस्तान में आएगा तो हमारा किसान कहां जायेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने किसान को सालाना (साल 2025) अमेरिकी डॉलर 16 बिलियन (₹1.45 लाख करोड़) की सब्सिडी देता है। इसके विपरीत, भारत के किसान से ₹6,000प्रति किसान परिवार सालाना देकर वही सब्सिडी महंगे डीज़ल-खाद-बिजली-कीटनाशक दवाईयों के माध्यम से ₹25,000 प्रति हेक्टेयर तक वापस ले ली जाती है। इसके बावजूद भी व्यापार समझौते में किसान विरोधी फैसला देश के किसानों पर वज्रपात साबित होगा।
सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि भारत का सालाना सोयाबीन उत्पादन 153 लाख टन (साल 2024-25) है। भारत में सोयाबीन की पैदावार मुख्यतः मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व कर्नाटक में होती है। अमेरिका में 12 करोड़ मीट्रिक टन सालाना सोयाबीन का उत्पादन होता है। अमेरिका से ड्यूटी-फ्री (जीरो शुल्क पर) सोयाबीन आयात से भारत के साधारण किसान की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा? व्यापार समझौते से कपास किसान पर दोहरी मार पड़ेगी। अमेरिका ने पड़ोसी देश, बांग्लादेश से व्यापार समझौता किया, जिसमें स्पष्ट तौर से कहा गया कि बांग्लादेश अमेरिकी कपास व धागा आयात कर जो कपड़ा व वस्त्र अमेरिका को निर्यात करेगा, उस पर अमेरिका में जीरो शुल्क लगेगा। इसके विपरीत, भारत जो कपड़ा व वस्त्र का बड़ा निर्यातक है, हमारे निर्यात पर 18 प्रतिशत शुल्क लगेगा। इससे पानीपत, तिरुपुर, सूरत, लुधियाना व पूरे देश के वस्त्र उद्योग पर भी विपरीत असर पड़ेगा। बांग्लादेश भारत से 50 प्रतिशत कपास का आयात करता है। अब कपास का भारत से बांग्लादेश को निर्यात भी बंद हो जाएगा। इससे महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक के कपास पैदा करने वाले किसान पर दोहरी मार पड़ेगी। भारत के फल और मेवा उत्पादकों यानी सेब, नाशपाती, अमरूद, संतरा, स्ट्रॉबेरी, केला आदि तथा बादाम, अखरोट, पिस्ता, मूंगफली और अन्य उत्पादकों को लगेगा क्योंकि अमेरिका से आयात को शुल्क-मुक्त किया जा रहा है। जब सभी फल और मेवे अमेरिका से शुल्क-मुक्त आधार पर आयात किए जाएंगे, तो हमारे किसानों की आजीविका की रक्षा कौन करेगा? हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों के लाखों किसान इससे गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।

केंद्र की बीजेपी सरकार द्वारा भारतीय हितों की तिलांजलि देने के विभिन्न पहलुओं को बताते हुए सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौते में मोदी सरकार ने भारत के किसानों व खेत-खलिहान के हितों की बलि दे डाली। व्यापार समझौते के पहले बिंदु में अमेरिका से आयात किए जाने वाले खाद्य व कृषि उत्पादों में ‘‘एडिशनल प्रोडक्ट्स’’ (अतिरिक्त उत्पाद) लिखा है। ये अतिरिक्त उत्पाद कौन सा – कौन सा और अनाज है? क्या मोदी सरकार बताएगी कि पिछले दरवाजे से अमेरिकी अनाज आयात करने के और क्या-क्या समझौते किए गए हैं? भारत की ऊर्जा सुरक्षा से सरेआम खिलवाड़ किया। भारत की डिजिटल स्वायत्ता व हमारी डेटा प्राईवेसी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। भारतीय हितों की रक्षा में मजबूती से खड़े होने की बजाय, एक मजबूर सरकार ने भारत की संप्रभुता व आत्मनिर्भरता से समझौता कर लिया। लोग पूछ रहे हैं – ‘‘मजबूत सरकार’’ या ‘‘मजबूर सरकार’’! ‘आत्मनिर्भर’ भारत या ‘अमेरिका-निर्भर’ भारत।
अमेरिका व्यापार समझौते के जरिए भारत की ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़ के बारे में बोलते हुए दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि भारत दुनिया में कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है, जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा का हिस्सा है। भारत 40 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से व 11 प्रतिशत कच्चा तेल ईरान से आयात करता आया है, यानी अपनी कुल जरूरत का लगभग 51 प्रतिशत।फरवरी, 2022 से जनवरी, 2026 के बीच भारत ने रूस से 168 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹15.24 लाख करोड़) का कच्चा तेल आयात किया और सस्ती दरों के चलते लगभग 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹1.81 लाख करोड़) की बचत हुई। अब भारत को व्यापार समझौते के तहत अमेरिका से कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा, जिसमें रूस और ईरान के बराबर कम कीमतों का कोई आश्वासन नहीं है। क्या यह सीधे-सीधे भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता से समझौता नहीं?
उन्होंने कहा कि व्यापार समझौते में भारत पर अमेरिका से 5 साल में 500 बिलियन डॉलर (₹45 लाख करोड़) का सामान खरीदने की बात कही गई है। वर्ष 2024 में भारत ने अमेरिका को 81 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान निर्यात किया और 43 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान आयात किया। यानी, अमेरिका से भारत का ट्रेड सरप्लस 38 बिलियन डॉलर है। 6 फरवरी, 2026 के व्यापार समझौते में इसे पूरी तरह से दरकिनार कर दिया और कहा गया कि भारत अगले 5 साल तक हर साल 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹9 लाख करोड़) का अमेरिकी सामान खरीदेगा। यानी 5 साल में 45 लाख करोड़। सवाल यह है कि व्यापार समझौता बराबरी के आधार पर है या जबरदस्ती के आधार पर?







