समसामयिक: परीक्षा : प्रतिस्पर्धा नहीं,निर्माण यात्रा

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अध्ययन, संतुलन, तकनीकी, श्रम,विद्यालय, परिवार, छात्र, शिक्षक मिलकर बनाएं उत्सव। 

डॉ घनश्याम बादल

 बोर्ड परीक्षाएं सर पर है और परीक्षा को लेकर बच्चों, माता-पिता और विद्यालयों के मन में एक स्वाभाविक डर एवं बेचैनी है लेकिन डरना या परेशान होना किसी समस्या का हल नहीं होता. हल है उस समस्या का शांत मन एवं सही तरीके से सामना करना। 

अंक नहीं पहचान 

       आज का सबसे बड़ा सच यह है कि बच्चे असफलता से नहीं, अपेक्षाओं से डरते हैं। वे प्रश्नपत्र से नहीं, परिणाम से घबराते हैं। परीक्षा उनके लिए ज्ञान का उत्सव नहीं, बल्कि भय का उत्सव बनती जा रही है। ऐसे में सबसे पहली आवश्यकता मानसिक तैयारी की है। 

    बच्चे को यह समझाना जरूरी है कि परीक्षा जीवन नहीं है बल्कि जीवन का एक चरण मात्र है। अंक उनकी पहचान नहीं केवल  एक आकलन है । परिणाम चाहे जैसा हो उसके लिए तैयार भी रहना है लेकिन बेहतरी के लिए निरंतर प्रयास जरूर करना है। 

आत्मविश्वास और संतुलन

    आत्मविश्वास, धैर्य और संतुलन ही वास्तविक सफलता की नींव हैं। बच्चों को तुलना की संस्कृति से बाहर निकालना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि हर बच्चा अलग क्षमता,  गति और प्रतिभा लेकर जन्मता है। एक ही मापदंड से सबको तौलना न केवल अन्याय , बल्कि मानसिक हिंसा भी है।

   मानसिक संतुलन के लिए दैनिक जीवन में अभ्यास आवश्यक हैं। प्रतिदिन कुछ समय शांत बैठकर मन को स्थिर करना, अपनी चिंता को शब्दों में लिखकर बाहर निकालना, स्वयं से सकारात्मक संवाद करना और अपने लक्ष्य की स्पष्ट कल्पना करना छोटे मगर  बड़े परिणाम देने वाले उपाय हैं। 

नींद और खान पान

 इसके साथ-साथ खान-पान की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज बच्चों का भोजन स्वाद केंद्रित हो गया है, पोषण केंद्रित नहीं जबकि मस्तिष्क का विकास भोजन पर निर्भर करता है। दूध, दही, दाल, फल, सूखे मेवे, हरी सब्जियाँ, अंकुरित अनाज जैसे खाद्य पदार्थ न केवल शरीर को शक्ति देते हैं, बल्कि स्मरण शक्ति और एकाग्रता को भी मजबूत करते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक तला-भुना भोजन, कृत्रिम पेय, अत्यधिक मिठास और अनियमित भोजन दिनचर्या मानसिक थकान और चिड़चिड़ेपन को जन्म देती है। भोजन केवल पेट भरने स्वाद लेनेका साधन नहीं है, वह मस्तिष्क का ईंधन है।  इसलिए स्वाद या पेट भरने के लिए नहीं बल्कि अंदर से पुष्ट होने के लिए संतुलित भोजन जरुरी है। 

तैयारी और अध्ययन

   परीक्षा में सफलता का सबसे बड़ा आधार है बच्चों की खुद की तैयारी। यदि बच्चा केवल विद्यालय, शिक्षकों या बाहरी सहायता पर निर्भर है, तो उसकी तैयारी अच्छी नहीं हो सकती । लेकिन यदि वह स्वयं समय प्रबंधन, नियमित अध्ययन, आत्ममूल्यांकन और निरंतर अभ्यास सीख लेता है, तो उसकी सफलता तय है। रोज़ थोड़ा, पर नियमित पढ़ना, रटने की बजाय समझना, प्रश्नों के माध्यम से अभ्यास करना और बार-बार पुनरावृत्ति करना यें सरल सिद्धांत हैं, पर प्रभाव अत्यंत गहरा है।

माता-पिता और परिवार

  माता-पिता की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में सबसे निर्णायक होती है। आज अनेक बच्चे परीक्षा से नहीं, घर के दबाव से टूटते हैं। जब घर तुलना का केंद्र बन जाता है, जब संवाद की जगह उपदेश ले लेता है, जब भरोसे की जगह नियंत्रण आ जाता है, तब बच्चा भीतर से अकेला हो जाता है। आदर्श माता-पिता वह नहीं  जो केवल अच्छे परिणाम पर गर्व करें बल्कि वे होते हैं जो प्रयास पर गर्व करना सिखाते हैं। बच्चे को यह भरोसा देना कि परिणाम कुछ भी हो, परिवार उसके साथ खड़ा है, यही भावनात्मक सुरक्षा उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनती है। शांत वातावरण, सकारात्मक भाषा, धैर्यपूर्ण संवाद और संवेदनशील व्यवहार बच्चों के भीतर साहस पैदा करता है।

शिक्षक और विद्यालय

  विद्यालयों की भूमिका भी केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विद्यालय यदि केवल अंक उत्पादन केंद्र बनेंगे तो बच्चे संवेदनशील मनुष्य नहीं, थके हुए यंत्र बनेंगे। विद्यालय का कार्य केवल परीक्षा की तैयारी नहीं, जीवन की तैयारी होना चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद, जीवन कौशल की शिक्षा, व्यक्तित्व विकास के कार्यक्रम, मार्गदर्शन सत्र और नैतिक मूल्यों का संस्कार – यह सब विद्यालयी व्यवस्था का अनिवार्य अंग होना चाहिए। शिक्षा यदि केवल प्रतियोगिता सिखाएगी, तो समाज असंवेदनशील बनेगा; यदि सहयोग सिखाएगी, तो समाज मानवीय बनेगा।

    शिक्षकों की भूमिका भी केवल विषय विशेषज्ञ की नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की होनी चाहिए। एक सच्चा शिक्षक वह है जो बच्चे के भीतर डर नहीं, विश्वास पैदा करे। जो दंड नहीं, दिशा दे। जो तुलना नहीं, प्रेरणा दे। शिक्षक यदि बच्चे को स्वयं पर भरोसा करना सिखा दे, तो वही शिक्षा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

  मोबाइल और तकनीक

 डिजिटल साधनों का संतुलित उपयोग भी आज अत्यंत आवश्यक है। तकनीक ज्ञान का साधन बने, लत नहीं। मोबाइल और डिजिटल माध्यम पढ़ाई में सहायक हों, बाधक नहीं। बच्चों को यह अनुशासन सिखाना जरूरी है कि हर सुविधा का उपयोग हो लेकिन सीमाओं के साथ।

  अंततः यह समझना होगा कि परीक्षा की पुरानी सोच बदलनी होगी। परीक्षा को डर और दबाव का माध्यम नहीं, विकास और आत्मनिर्माण का अवसर बनाना होगा।

स्पर्धा नहीं, निर्माण यात्रा

   और हां, सफलता का अर्थ केवल अच्छे अंक लाना नहीं है. सफलता का अर्थ है,  आत्मविश्वास, संतुलन, स्थिरता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि क्योंकि अंक केवल भविष्य की दिशा दिखाते हैं लेकिन जीवन की दिशा चरित्र तय करता है। यदि हम बच्चों को केवल सफल विद्यार्थी नहीं, बल्कि सशक्त मनुष्य बनाना चाहते हैं तो परीक्षा की तैयारी को प्रतिस्पर्धा नहीं, निर्माण यात्रा बनाना होगा।

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Author: Bharat Sarathi

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