राष्ट्रीय बालिका दिवस 2026 : बेटियों को दया नहीं, अधिकार चाहिए – ब्रह्मचारी कुलदीप शतरंज

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दिल्ली/भिवानी, 24 जनवरी 2026 – हर समाज की असली पहचान उसकी बेटियों की स्थिति से होती है। जिस समाज में बेटियां सुरक्षित, शिक्षित और आत्मनिर्भर होती हैं, वही समाज वास्तव में विकसित कहलाता है। भारत में हर वर्ष 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है, ताकि समाज को यह याद दिलाया जा सके कि बेटियां बोझ नहीं, बल्कि देश का भविष्य हैं।

आज भी विडंबना यह है कि कानून, योजनाएं और अधिकार होने के बावजूद अनेक बेटियां शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और अपने जीवन से जुड़े फैसलों से वंचित रह जाती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण अधिकारों की जानकारी का अभाव है। बेटियां तभी सशक्त बनेंगी, जब उन्हें यह पता होगा कि कानून पूरी ताकत से उनके साथ खड़ा है

अधिकारों की जानकारी ही असली सशक्तिकरण

बेटियों को सक्षम, समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने की शुरुआत उन्हें उनके अधिकारों से परिचित कराकर ही की जा सकती है। जब एक लड़की जानती है कि पढ़ना उसका हक है, सुरक्षा उसकी जिम्मेदारी नहीं बल्कि समाज और शासन की है, और शादी या करियर का निर्णय उसका अपना है—तब वह किसी दबाव के आगे झुकती नहीं।

आज भी कई परिवार अनजाने में या सामाजिक दबाव में बेटियों को कमतर समझते हैं। पढ़ाई छुड़वा देना, कम उम्र में शादी कर देना या फैसलों से दूर रखना—ये सब कानूनन अपराध हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में बेटियां चुप रह जाती हैं।

राष्ट्रीय बालिका दिवस : एक चेतावनी और संकल्प

राष्ट्रीय बालिका दिवस केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज के लिए एक चेतावनी है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बेटियों को दया या सहानुभूति नहीं, अधिकार और सम्मान चाहिए। और अधिकार तभी प्रभावी होते हैं, जब उन्हें जाना, समझा और उपयोग किया जाए।

भारत का संविधान और कानून हर लड़की को बराबरी का दर्जा देता है। शिक्षा से लेकर संपत्ति तक और सुरक्षा से लेकर आत्मनिर्णय तक—बेटियों के अधिकार स्पष्ट और मजबूत हैं।

हर बेटी को जानने चाहिए ये 8 मूल अधिकार

शिक्षा का अधिकार
हर लड़की को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। 6 से 14 वर्ष की आयु तक शिक्षा देना कानूनन अनिवार्य है। कोई भी बेटी को पढ़ाई से नहीं रोक सकता।

जन्म और पहचान का अधिकार
जन्म प्रमाण पत्र और पहचान हर लड़की का मूल अधिकार है, जिससे वह सरकारी योजनाओं और सुरक्षा सेवाओं से जुड़ सके।

बराबरी का अधिकार
कानून की नजर में बेटा और बेटी पूरी तरह समान हैं—चाहे संपत्ति हो, अवसर हों या सम्मान।

बाल विवाह से सुरक्षा का अधिकार
18 वर्ष से पहले विवाह अपराध है। दबाव की स्थिति में 1098 (चाइल्ड हेल्पलाइन) और 181 (महिला हेल्पलाइन) बेटियों की सुरक्षा के लिए मौजूद हैं।

स्वास्थ्य और पोषण का अधिकार
हर लड़की को पोषण, टीकाकरण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार है। सरकार की अनेक योजनाएं किशोरियों के लिए चलाई जा रही हैं।

सुरक्षा और सम्मान का अधिकार
छेड़छाड़, हिंसा या शोषण के खिलाफ कानून पूरी तरह बेटियों के साथ है। सहमति के बिना किया गया हर कृत्य अपराध है।

संपत्ति में बराबरी का अधिकार
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटी को पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार प्राप्त है, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित।

अपने जीवन के फैसले लेने का अधिकार
पढ़ाई, करियर और शादी जैसे फैसलों में लड़की की राय सर्वोपरि है। किसी भी तरह का दबाव कानूनन अपराध है।

सशक्त बेटी से सशक्त राष्ट्र

जब बेटियां अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं, तो वे केवल अपना भविष्य नहीं संवारतीं, बल्कि पूरे समाज को मजबूत बनाती हैं। एक शिक्षित और आत्मनिर्भर बेटी ही परिवार, समाज और राष्ट्र को नई दिशा देती है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस 2026 पर हमें संकल्प लेना होगा कि हम बेटियों को केवल बचाएंगे नहीं, बल्कि उन्हें उनके अधिकारों से लैस करेंगे। क्योंकि सशक्त बेटी ही सशक्त भारत की नींव है

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Author: Bharat Sarathi

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