वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब बना मानवीय संवेदना की मिसाल

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हिसार। कुछ संस्थाएँ नाम से पहचानी जाती हैं, और कुछ अपने कर्मों से। वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब, हिसार ने अपने एक-एक कार्य से यह सिद्ध किया कि वह केवल वरिष्ठ नागरिकों का संगठन नहीं, बल्कि संवेदना, सेवा और अपनत्व से जुड़ा एक ऐसा परिवार है, जहाँ जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी कोई अकेला नहीं रहता।

क्लब की सदस्य डॉ. स्वराज के जीवन के अंतिम दिनों में वानप्रस्थ ने जो भूमिका निभाई, वह समाज के लिए एक जीवंत उदाहरण है—ऐसा उदाहरण, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन, पर महसूस करना आसान है।

मार्च 2025 में जब डॉ. स्वराज का स्वास्थ्य बिगड़ा और उन्हें सपरा अस्पताल में भर्ती कराया गया, तभी से वानप्रस्थ के सदस्य उनके साथ खड़े हो गए। किसी ने अस्पताल में रातें बिताईं, किसी ने घर पर चौबीसों घंटे सेवा दी, तो किसी ने सिर्फ हाथ थामकर यह विश्वास दिलाया—आप अकेली नहीं हैं
बाहरी ऑक्सीजन पर रहते हुए भी डॉ. स्वराज का मन हार नहीं मानता था। संगीत, कला और रचनात्मक गतिविधियों से उनका रिश्ता अंतिम क्षणों तक बना रहा—और यह संभव हुआ वानप्रस्थ के स्नेहपूर्ण वातावरण के कारण।

जब उनकी स्थिति पुनः गंभीर हुई, तब क्लब के सदस्यों ने बिना किसी आग्रह या औपचारिकता के आर्थिक सहयोग किया और उन्हें पुनः सपरा अस्पताल में भर्ती कराया गया। उपचार के दौरान डॉ. सुनीता श्योकंद, डॉ. मंजुला भार्गव, श्रीमती सुनीता महतानी, डॉ. नीरू, डॉ. मनवीर सांगवान सहित अनेक सदस्यों ने निरंतर सेवा देकर यह सिद्ध किया कि मानवता आज भी जीवित है। डॉ. राजेश यादव ने चिकित्सकीय सहयोग देकर अपने दायित्व को मानवीय संवेदना से जोड़ा।

जब डॉ. स्वराज इस संसार से विदा हुईं, तो वानप्रस्थ के लिए यह केवल एक सदस्य का जाना नहीं था—यह परिवार के एक हिस्से का बिछुड़ना था। वानप्रस्थ परिसर में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में हर शब्द नम था, हर आँख भरी हुई थी। उनके सांस्कृतिक योगदान, रचनात्मक चेतना और सामाजिक सक्रियता को स्मरण करते हुए वातावरण श्रद्धा और करुणा से भर गया।

वानप्रस्थ ने उनकी अंतिम इच्छाओं का सम्मान करते हुए सभी संस्कार पूरे सम्मान और गरिमा के साथ संपन्न कराए। यह केवल परंपराओं का निर्वहन नहीं था, बल्कि एक बेटी, एक बहन, एक साथी के प्रति निभाया गया अंतिम कर्तव्य था।

आज वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब एक प्रश्न छोड़ जाता है— क्या हमारी सामाजिक संस्थाएँ केवल कार्यक्रमों तक सीमित हैं, या वे सचमुच जीवन के कठिन क्षणों में साथ खड़ी हो सकती हैं?

वानप्रस्थ ने इस प्रश्न का उत्तर अपने कर्मों से दे दिया है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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