शुभ भावना से किया गया हर कर्म ही पुण्य, परमार्थ से जीवन बनता है स्वर्ग : महंत सर्वेश्वरी गिरि

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पिहोवा | प्रमोद कौशिक | 7 जनवरी – पिहोवा शिवपुरी मार्ग स्थित श्री गोविंदानंद ठाकुरद्वार आश्रम में आयोजित सत्संग के दौरान आश्रम की महंत सर्वेश्वरी गिरि जी महाराज ने पुण्य और परमार्थ के गूढ़ अर्थ को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि पुण्य केवल स्वार्थ से किया गया लाभकारी कर्म नहीं, बल्कि वह कर्म है जिससे दूसरों का भी कल्याण हो

महंत सर्वेश्वरी गिरि ने कहा कि पुण्य कर्मों का उद्देश्य केवल मृत्यु के बाद स्वर्ग की कामना करना नहीं होना चाहिए, बल्कि जीते-जी अपने जीवन और समाज को स्वर्ग समान बनाना ही वास्तविक पुण्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वर्ग की प्राप्ति के लिए पुण्य करना गलत नहीं, लेकिन परमार्थ की भावना से किया गया पुण्य कहीं अधिक श्रेष्ठ और स्थायी फल देने वाला होता है

उन्होंने सत्संग में कहा, “शुभ भावना के साथ किया गया प्रत्येक कर्म पुण्य है और अशुभ भावना से किया गया कर्म पाप। कर्म से अधिक उसकी भावना महत्वपूर्ण होती है।”

महंत जी ने आगे बताया कि जो कर्म भगवान को प्रिय होते हैं वही सच्चे अर्थों में पुण्य कर्म होते हैं। हमारे आचरण, व्यवहार, वाणी या किसी भी कृत्य से यदि किसी को दुख पहुँचता है, तो वह पुण्य नहीं हो सकता। उन्होंने लोगों से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि— “हमारा जीवन दूसरों के जीवन में समाधान बने, समस्या नहीं—यही पुण्य की पहचान है और यही परमार्थ का सच्चा मार्ग।

सत्संग में उपस्थित श्रद्धालुओं ने महंत सर्वेश्वरी गिरि के विचारों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया। वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मक चेतना से परिपूर्ण रहा।

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Author: Bharat Sarathi

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