संरक्षित वन में अवैध निर्माण, सरकारी चुप्पी और डेवलपर को संरक्षण!

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गुरुग्राम मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख़्त दखल**

गुस्ताख़ी माफ़ हरियाणा- पवन कुमार बंसल

नई दिल्ली/गुरुग्राम। गुरुग्राम के अधिसूचित संरक्षित वनों में कथित अवैध वाणिज्यिक निर्माण का मामला अब केवल पर्यावरण उल्लंघन नहीं, बल्कि सरकार–डेवलपर–प्रशासन की मिलीभगत का गंभीर उदाहरण बनकर सामने आया है। इस पूरे प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) को नोटिस जारी किया जाना इस बात का संकेत है कि देश की सर्वोच्च अदालत को भी अब मामले की गंभीरता और संदिग्ध चुप्पी पर सवाल खड़े करने पड़े हैं।

वन भूमि पर निर्माण, लेकिन कार्रवाई शून्य

मामला गुरुग्राम के सिकंदरपुर–नाथूपुर बंध और नाथूपुर ड्रेन से लगे अधिसूचित संरक्षित वन क्षेत्र से जुड़ा है, जहां राज सिंह गहलोत के स्वामित्व वाली एम्बिएंस डेवलपर्स एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड ने “एम्बिएंस आइलैंड लैगून अपार्टमेंट्स” नामक वाणिज्यिक परियोजना खड़ी कर दी।

आरोप है कि यह निर्माण:

  • अधिसूचित संरक्षित वन भूमि पर किया गया,
  • वन संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और NGT के दिशा-निर्देशों का खुला उल्लंघन है,
  • और इसके बावजूद किसी भी स्तर पर निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई
प्रशासन की भूमिका: आंखें मूंदे बैठा सिस्टम

चौंकाने वाली बात यह है कि इस अवैध निर्माण के खिलाफ:

  • हरियाणा सरकार ने स्वयं पर्यावरण न्यायालय,फरीदाबाद में केस दर्ज किया,
  • लेकिन बाद में बिना सार्वजनिक कारण बताए केस वापस ले लिया गया

यही वह बिंदु है, जहां प्रशासन की भूमिका संदेह के घेरे में आती है।
प्रश्न उठता है—
➡️ जब निर्माण अवैध था तो केस वापस क्यों लिया गया?
➡️ किसके दबाव में सरकारी मशीनरी पीछे हटी?
➡️ क्या कानून डेवलपर के लिए अलग और आम नागरिक के लिए अलग है?

NGT से सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष

इस सरकारी चुप्पी और प्रशासनिक ढील के खिलाफ हरियाणा कैडर के सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी आर. के. शर्मा और वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता पवन कुमार बंसल ने मोर्चा खोला।

उन्होंने पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन:

  • 11 जुलाई 2024 को NGT की प्रधान पीठ ने उनकी अपील खारिज कर दी,
  • जिससे अवैध निर्माण को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिलने का आरोप लगा।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया।

सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी वाली कार्यवाही

6 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर–1 में हुई सुनवाई में:

  • मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत
  • और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने

👉 याचिकाकर्ताओं को Petitioner-in-Person के रूप में बहस की अनुमति दी,
👉 देरी को condone किया,
👉 और भारत संघ व CPCB को नोटिस जारी किया

न्यायालय ने साफ किया कि यह मामला केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्यावरण हित और संवैधानिक दायित्वों से जुड़ा है।
अगली सुनवाई 23 मार्च 2026 को तय की गई है।

केंद्र सरकार और CPCB कटघरे में क्यों?

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार और CPCB को नोटिस दिया जाना कई सवाल खड़े करता है:

  • क्या केंद्रीय एजेंसियों ने जानबूझकर आंखें मूंदे रखीं?
  • क्या पर्यावरणीय मंजूरियों की प्रक्रिया को तोड़ा-मरोड़ा गया?
  • क्या प्रभावशाली डेवलपर को बचाने के लिए नियमों को कमजोर किया गया?
मांगें जो सिस्टम को चुनौती देती हैं

याचिकाकर्ताओं की मांगें सीधे सत्ता–प्रशासन की कार्यशैली को चुनौती देती हैं:

  • अवैध निर्माण को ध्वस्त किया जाए,
  • वन भूमि को तत्काल हरियाणा वन विभाग को सौंपा जाए,
  • दोषी अधिकारियों और डेवलपर के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो,
  • और भविष्य में ऐसी “डेवलपर–सरकार गठजोड़” की पुनरावृत्ति रोकी जाए।
पर्यावरण बनाम पूंजी

यह मामला गुरुग्राम तक सीमित नहीं है। यह देशभर में तेजी से हो रहे उस विकास मॉडल पर सवाल उठाता है, जिसमें:

“जंगल कटते हैं, कानून झुकते हैं और सिस्टम मौन साध लेता है।”

अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि क्या वह:

  • केवल नोटिस तक सीमित रहेगा,
  • या इस संरक्षित वन–डेवलपर–सरकारी गठजोड़ पर निर्णायक प्रहार करेगा।
Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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