संविधान और कानूनों में लूपहोल का बढ़ता उपयोग *

वैश्विक स्तरपर सरकारों द्वारा अपना हित साधने, अध्यादेश संविधान संशोधन ग़जट में अधिसूचना इत्यादि बैसाखियों विशेषाअधिकारों का उपयोग करने का प्रचलन बढ़ा

-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

दुनियाभर में कानूनों और संविधानों में मौजूद खामियों का लाभ उठाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सरकारें अपने हितों को साधने के लिए अध्यादेश, संविधान संशोधन और विशेषाधिकारों का उपयोग करने लगी हैं। यह प्रवृत्ति केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी देखने को मिल रही है।

हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने तीसरे कार्यकाल की संभावना को लेकर एक बड़ा बयान दिया, जिससे अमेरिकी राजनीति में हलचल मच गई है। उन्होंने यह संकेत दिया कि अमेरिकी संविधान में संशोधन कर तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।

क्या है अमेरिकी संविधान का 22वां संशोधन?

अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के तहत कोई भी व्यक्ति दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं बन सकता, चाहे वह लगातार हो या अलग-अलग अवधि में। यदि ट्रंप तीसरी बार राष्ट्रपति बनना चाहते हैं, तो उन्हें इस संशोधन को बदलना होगा। इसके लिए अमेरिकी संसद और राज्यों से व्यापक समर्थन की आवश्यकता होगी।

संविधान संशोधन के लिए अमेरिकी सीनेट और प्रतिनिधि सभा में दो-तिहाई बहुमत से बिल पास कराना आवश्यक होगा। इसके अलावा, 50 अमेरिकी राज्यों में से कम से कम तीन-चौथाई राज्यों की विधानसभाओं से इसे मंजूरी मिलनी चाहिए। यह एक कठिन प्रक्रिया है, जिसे अमल में लाना लगभग असंभव माना जा रहा है।

क्या है ट्रंप की रणनीति?

ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा कि तीसरी बार राष्ट्रपति बनने के कई तरीके मौजूद हैं। जब उनसे पूछा गया कि वे कौन से तरीके हैं, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से जवाब दिया कि ऐसे कई रास्ते हैं जिनसे यह संभव हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप एक रणनीति के तहत किसी भरोसेमंद सहयोगी को राष्ट्रपति चुनाव लड़वा सकते हैं। अगर वह व्यक्ति चुनाव जीतने के बाद इस्तीफा दे देता है, तो ट्रंप उत्तराधिकारी के रूप में राष्ट्रपति पद ग्रहण कर सकते हैं। यह संविधान में मौजूद लूपहोल का उपयोग करने की एक संभावित रणनीति हो सकती है।

वैश्विक दृष्टिकोण से कानूनों में संशोधन का प्रभाव

यह पहली बार नहीं है जब किसी देश के कानूनों में संशोधन कर सरकार ने अपने हित साधने की कोशिश की हो। विभिन्न देशों में ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं:

इजरायल और पाकिस्तान में न्यायिक संशोधन

भारत में दिल्ली कानून अध्यादेश, जिसने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया

ऐसे मामलों में अक्सर तर्क दिया जाता है कि संशोधन जनता के हित में है, लेकिन पर्दे के पीछे राजनीतिक मकसद कुछ और ही होते हैं।

ट्रंप के बयान का प्रभाव और कानूनी बाधाएँ

संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप के इस बयान को कानूनी रूप से संदेहास्पद माना जा रहा है। नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के एक संवैधानिक कानून विशेषज्ञ का कहना है कि ऐसा करने के लिए कोई कानूनी आधार नहीं है।

हालांकि, ट्रंप की लोकप्रियता को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि वे अपनी राजनीतिक ताकत के बल पर इस मुद्दे को आगे बढ़ा सकते हैं। यदि ट्रंप इस रणनीति को अपनाते हैं, तो वे 2029 के बाद भी व्हाइट हाउस में बने रह सकते हैं।

निष्कर्ष

डोनाल्ड ट्रंप का तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का इशारा अमेरिका की संवैधानिक व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। हालांकि, संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया कठिन है, लेकिन ट्रंप अपने प्रभाव का उपयोग कर इसे संभव बनाने की कोशिश कर सकते हैं। वैश्विक स्तर पर सरकारों द्वारा अपने हितों को साधने के लिए संवैधानिक संशोधन और कानूनों में बदलाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय है।

संकलनकर्ता लेखक: क़ानूनी विशेषज्ञ, स्तंभकार, साहित्यकार, अंतरराष्ट्रीय लेखक, चिंतक, कवि, संगीत माध्यमा, सीए (एटीसी), एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

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