सपनों की सीमाओं से परे: एमबीबीएस की दुविधा

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विजय गर्ग ……….  सेवानिवृत्त प्रिंसिपल ‌ शैक्षिक स्तंभकार

भारत में एम्स, जेआईपीएमईआर और अन्य प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेज विश्व स्तरीय शिक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन हर साल हजारों ,छात्र विदेशों में एमबीबीएस करने के लिए मजबूर होते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल वित्तीय सीमाओं बल्कि भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली की चुनौतियों को भी दर्शाती है।

एक सपना, एक संघर्ष: अमित की कहानी

मलोट के 18 वर्षीय अमित का सपना डॉक्टर बनने का था। एनईईटी में 605 अंक लाने के बावजूद उन्हें सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिली। निजी कॉलेजों की भारी फीस उनके परिवार के लिए असंभव थी, इसलिए उन्होंने विदेश में मेडिकल शिक्षा का विकल्प चुना। लेकिन एक दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना ने उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया। अमित की त्रासदी उन हजारों छात्रों की हकीकत को दर्शाती है जो मेडिकल सीटों की सीमित उपलब्धता के कारण विदेश जाने के लिए मजबूर होते हैं।

भारत में मेडिकल सीटों की वास्तविकता

2024 में 23 लाख छात्रों ने एनईईटी दिया, लेकिन सिर्फ 1 लाख एमबीबीएस सीटें उपलब्ध थीं, जिनमें केवल 50,000 सरकारी कॉलेजों में थीं। निजी कॉलेजों की फीस ₹50 लाख से ₹1.5 करोड़ तक होती है, जो मध्यम वर्ग के लिए बहुत अधिक है। इसके विपरीत, रूस, यूक्रेन, फिलीपींस और कजाकिस्तान में मेडिकल शिक्षा ₹20-30 लाख में संभव है।

विदेश में एमबीबीएस: अवसर और चुनौतियाँ

विदेशी मेडिकल कॉलेज सस्ती ट्यूशन फीस, उन्नत बुनियादी ढांचे और अंग्रेजी माध्यम पाठ्यक्रम प्रदान करते हैं। लेकिन छात्रों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:

  • भाषा बाधा: रूस, चीन, यूक्रेन में स्थानीय भाषा सीखना आवश्यक होता है, जो नैदानिक प्रशिक्षण में मुश्किलें खड़ी करता है।
  • एफएमजीई परीक्षा: भारत में प्रैक्टिस के लिए अनिवार्य यह परीक्षा कठिन होती है, जिसमें सफलता दर मात्र 10-20% है।
  • मान्यता और लाइसेंसिंग: कई विदेशी मेडिकल डिग्रियों को भारत में पूर्ण स्वीकृति नहीं मिलती, जिससे छात्रों का भविष्य अनिश्चित हो जाता है।

समाधान की ओर एक कदम

विदेश में एमबीबीएस की प्रवृत्ति भारत की चिकित्सा शिक्षा प्रणाली की खामियों को उजागर करती है। सुधार के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं:

  1. सरकारी मेडिकल सीटों में वृद्धि: अधिक सरकारी कॉलेज खोलकर और सीटें बढ़ाकर प्रवेश की कठिनाइयों को कम किया जा सकता है।
  2. निजी कॉलेजों की फीस नियंत्रण: सस्ती और पारदर्शी फीस संरचना बनाकर चिकित्सा शिक्षा को अधिक सुलभ बनाया जाए।
  3. रिटर्निंग छात्रों के लिए समर्थन: विदेश से लौटने वाले डॉक्टरों के लिए परीक्षा प्रणाली को सुगम बनाना और अवसरों को बढ़ाना।

निष्कर्ष

विदेश में एमबीबीएस भारतीय छात्रों के लिए एक व्यवहारिक विकल्प है, लेकिन इससे जुड़ी चुनौतियाँ अनदेखी नहीं की जा सकतीं। अगर भारत में चिकित्सा शिक्षा अधिक सुलभ और किफायती बने, तो हजारों छात्रों को अपनी मातृभूमि छोड़ने की आवश्यकता नहीं होगी। भारत को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि हर इच्छुक छात्र अपने देश में ही डॉक्टर बनने का सपना साकार कर सके।

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Author: Bharat Sarathi

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