राष्ट्रवादी होने का कोई गीत नहीं गाया जा सकता, राष्ट्रवाद अपने आप में एक जज्बा है, जूनून है
देश राष्ट्रवाद की ईंट है और इसमें जाति, धर्म, रंग, मजदूर, गरीब या अमीर का कोई रंग नहीं होता, बल्कि इन सबके मिलने और जुड़ने से ही राष्ट्रवाद बनता है
अमृतकाल में आपका स्वागत है।
आज अगर कांग्रेस की सरकार होती, तो आजादी के अमृत महोत्सव में घर घर तिरंगा अभियान में देश के 20% कट्टरपंथी लोग जो शुरू से ही तिरंगे के घोर विरोधी रहे हैं, वो कदापि हर घर तिरंगा अभियान में शामिल नहीं होते

अशोक कुमार कौशिक 

IMF की एक रिपोर्ट के अनुसार इस 15 अगस्त यदि हम सभी भारतीय सोशल मीडिया पर तिरंगे वाली  DP लगाते हैं तो देश की GDP में इस वर्ष लगभग 20 प्रतिशत का उछाल देखने को मिल सकता है। ध्यान रहे, GDP की इस वृद्धि में हर घर तिरंगा अभियान के लिए करोड़ों तिरंगे बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा शामिल नहीं है वरना यह आंकड़ा और भी ऊपर जा सकता है।

आजादी के 75 वर्षों बाद भी आज हम यदि विकसित  देशों की श्रेणी के नही है तो उसका कारण देश के वह स्वार्थी और आत्ममुग्ध लोग हैं जो एक दिन के लिए भी DP से अपनी फोटो हटाकर तिरंगे की फोटो नही लगाना चाहते। यह लोग एक ही फोटो को अलग अलग एंगल से खींचकर 10 बार DP बदल सकते है पर देशहित में तिरंगे वाली DP नही लगा सकते। पता नही अपनी ही फोटो को लेकर इतना obsession इन्होंने किससे सीखा है?  

हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका की जनता ने भी अपनी DP पर राष्ट्रीय ध्वज नही लगाया था और बताने की जरूरत नही कि फिर श्रीलंका का क्या हश्र हुआ। यह तो हमारे साहब की दूरदृष्टि हैं जो उन्होंने समय रहते समझ लिया कि देश की सारी समस्याओं का हाल तिरंगे से हो हो सकता है।

आप इस डिजाइनर वर्ग को DP बदलने के लिए कहेंगे तो यह लोग महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी जैसे व्यर्थ मुद्दों में आपको उलझा देंगे। DP बदलने से किसका भला होगा, इस तरह के बचकाने प्रश्न आपसे करने लगेंगे। इन स्वार्थी लोगो के लिए देश के नागरिक देश से अधिक महत्वपूर्ण हैं जबकि सच्चाई यह है कि देश से बढ़कर कुछ भी नही। देश के नागरिक चाहे भूखे मर जाए पर देश नही झुकना चाहिए। घर घर राशन चाहे न पहुंचे, पर हर घर तिरंगा जरूर पहुंचना चाहिए।

राष्ट्रवाद के रंग और भावना कैसा है कोई इसे हनुमान की तरह सीना फाड़कर कोई नहीं दिखा सकता। राष्ट्रवादी होने का कोई गीत नहीं गाया जा सकता। राष्ट्रवाद अपने आप में एक जज्बा है, जूनून है जिसे मौक़ा मिलने पर पूरी ताक़त से दिखाया जा सकता है। जैसे की पाकिस्तान के साथ बार बार हुए युद्ध। बंगलादेश का बनना, कश्मीर पर अभी तक आंच न आने देना, भारत की सीमाओं को सिकुड़ने ना देना। राष्ट्रवाद में धर्म का कोई रंग नहीं है। धर्म से राष्ट्रवाद को कोई ताकत भी नहीं है।

केवल सीमाओं को मजबूत रखने भर को ही राष्ट्रवाद से जोड़ना हमारी संकीर्णता या अल्पज्ञानता का परिचय होगा। 

राष्ट्रवाद सही मायने में देश के अंदर से पैदा होता है ओर बडा होकर सीमा पर पहरा देता है। लेकिन आजकल अंदर से खोखला होता राष्ट्रवाद धर्म के कंधों पर बैठ गया है। सीमा का प्रहरी भी अंदर से सीमा पर जाता है, लेकिन जब अंदर से खोखला हो जाये तो सीमा का जवान भी कमजोर ही होता है।

देश राष्ट्रवाद की ईंट है और इसमें जाति, धर्म, रंग, मजदूर, गरीब या अमीर का कोई रंग नहीं होता, बल्कि इन सबके मिलने और जुड़ने से ही राष्ट्रवाद बनता है। देश का निर्माण इसी के हाथों की ताकत है। किसी भी निर्माण के लिए धर्म का बंटवारा कर समाज को खंडित कर खडी की गई भीड़ से नहीं हो सकता। बल्कि हर हाथ की ताकत और उसकी आंखों के सपनों से देश बनता है।

आजादी के ठीक बाद देश कुम्हार के घर की कच्ची ओर बिखरी मिट्टी की तरह था। आजादी से पहले की ताकत जिसमें सभी धर्म की ताकत थी ने सपने संजोए थे और उन सपनों को एक नेहरू के नाम के व्यक्ति का नैतृत्व मिला। मिट्टी को कुम्हार ने अपने शिल्पकारी हाथों से  कल्पनाओं के ढांचे में ढाल कर एक आकृति दी ओर उसी को दिशा बनाकर हम आगे बढ़े। उस शिल्पकार के बाद अनेकों और शिल्पकार आये ओर निर्माण करते गये। सभी ने अपने अपने जादू से, अपनी अपनी योग्यता से देश को नये नये रास्तों पर चलाया।

एक शिल्पकार 2014 में अपनी कृत्रिम कल्पना को जादूगरी बता कर देश में आया और देश को भ्रमित कर उन मजबूत ईंटों को खंडित करने लगा जिनको पूर्व के शिल्पकारों ने संवारा था।इस जादूगर को कोई जादू नहीं आया तो धर्म के रंगों को सड़कों पर ले आया, जाति,भाषा, वस्त्र, रंग, राज्य जो मिला, जैसा समझ आया को तबाह करता ओर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करता रहा। कुछ नहीं करने के कारण से ही नये नये आडंबर ओर ढकोसलों के सहारे खुद को मजबूत करने के षड़यंत्र रचता रहा। देश बिखरने लगा, ईंटे हिलने लगी।

राष्ट्रवाद सड़कों का श्रृंगार बना दिया गया, राष्ट्र का लिबास तिरंगे की बोलियां लगने लगी, गरीब के राशन पर इसे चिपका दिया गया। बेईमानों ने इसे अपने छुपाने का एक साधन बना लिया। मनोरंजन के लिए तिरंगा रैलियां को दिखाया गया। हर घर तिरंगा बिकने लगा। जनता में राष्ट्रवाद की होड़ पैदा की गई ताकि अपनी अज्ञानता को छुपाया जा सके। होड पैदा करने के लिए तिरंगा न फहराने या न खरीदने वाले को तिरंगे का अपमान और देश द्रोही होने जैसे तानो का सहारा लिया गया।

आज राष्ट्रवाद बदल गया है। आम आदमी को अपनी शरम के लिए तिरंगा उठाये रखना ही असली राष्ट्रवादी होना समझ लिया। रोजगार के बिना टूटे हाथों में झंडा थमा दिया गया। विकास की दौड़ में लंगडा हो चुका देश के मस्तक पर झंडा बांध विश्व मैराथन में दौडा दिया गया है। भूखे देश के पेट पर तिरंगा बांधकर विकास होना दिखा रहे हैं। झूठे नारों को राष्ट्रगीत में तब्दील कर दिया गया है। शिल्पकार ने अपनी अज्ञानता को राष्ट्रध्वज में ढक कर छुपा लिया है। बस आज यही हमारा राष्ट्रवाद है।

भारत 2022 में आज़ाद नहीं हुआ है, भारत आज़ाद हुआ है 1947 में। भारत 13 अगस्त को आज़ाद नहीं हुआ है, भारत आज़ाद हुआ 15 अगस्त को और भारत को आज़ादी दिलाने में आज के किसी भी नेता का रत्ती भर भी कोई योगदान नहीं है। मेरे प्यारे देशवासियों! तिरंगे की अहमियत को समझो। इस तरह ठेले पर, आटो पर, दुकानों पर, मकानों पर, खलिहानों पर तिरंगा फहरा रहे हो, ज़रुर फहराओ लेकिन तिरंगे के गौरव पर दाग़ न लगने पाए, इसकी पहले क़सम खाओ। ऐसा न हो कल को तिरंगे में लपेट कर सामान बेचने लगो। ऐसा न हो कल को तिरंगे से टेबल साफ़ करने लगो। ऐसा न हो कल को तिरंगे से साइकिल का, ठेले का चैन साफ़ करने लगो। ऐसा न हो कल को तिरंगे से धान की ओसौनी करने लगो। 

ज़रा सोचो! अब से पहले हम कितना सम्मान करते थे अपने तिरंगे का, जब तक लाल क़िला पर प्रधानमंत्री तिरंगा फहरा न देते थे तब तक देश भर के लोग तिरंगे को बांधकर फूलों से नहला कर, इंतज़ार करते रहते थे। उस श्रध्दा और उस आस्था की कल्पना करो। सूरज डूबने से पहले या सूरज डूबते ही हम तिरंगा उतार लिया करते थे कि हमारे तिरंगे को अंधेरा घेर न ले, उसे ओस न लग जाए। हम इतना पाकीज़ा जज़्बा रखते थे अपने तिरंगे के बारे में, तो क्या हम उस वक़्त देश भक्त नहीं थे, क्या? आज से पहले तिरंगा देखकर हमारे दिलों में देशभक्ति का जज़्बा हिलोरें नहीं मारा करता था। हम सब सोचें, हमारा ब्रेन वाश किस सफाई से किया जा रहा है और किसके द्वारा किया जा रहा है।

आज अगर कांग्रेस की सरकार होती, तो आजादी के अमृत महोत्सव में घर घर तिरंगा अभियान में देश के केवल 80% वो नागरिक ही शिरकत करते जिनके खून में शुरू से ही तिरंगा है ! बाकी के 20% कट्टरपंथी लोग जो शुरू से ही तिरंगे के घोर विरोधी रहे हैं, वो कदापि घर घर तिरंगा अभियान में शामिल नहीं होते ! जिन्होंने कभी ह्रदय से इसका सम्मान नहीं किया, आज भी नहीं करते हैं !

* गुरु गोलवलकर जैसा कट्टरपंथी कहता था “आखिर ये तिरंगा हमारा राष्ट्रीय ध्वज कैसे हो सकता है, तिरंगे का कभी सम्मान नहीं होगा, उसके तीन रंग देश के लिए हानिकारक हैं, तिरंगा झंडा देश के लिए नुकसानदायी और अशुभ सिद्ध होगा” 

* अंग्रेजों से माफ़ी मांगने वाला और पेंशन लेने वाला माफीवीर पेंशनवीर सावरकर लिखता है, “तिरंगे को हिंदुस्तान में कभी राष्ट्रीय ध्वज की मान्यता नहीं दी जायगी इस तिरंगे का कोई हिंदू कभी सम्मान नहीं कर सकता” !

*  श्यामा प्रसाद मुखर्जी कहता था “जो लोग भाग्य से सत्ता में आए हैं, वो हमारे हाथ में भले ही तिरंगा पकड़ा दें, लेकिन इसका सम्मान और स्वामित्व कभी भी हिंदुओं के पास नहीं होगा” !

सोच कर देखिए कितनी विक्षिप्त और देशद्रोही मानसिकता रही होगी इनकी ! परंतु क्योंकि आज उन्हीं लोगों के राजनेतिक उत्तराधिकारी सरकार में हैं, इसीलिए ना चाहते हुए भी तिरंगे के घोर विरोधी लोगों को भी आज तिरंगे को पकड़ने पर  मजबूर और राजी होना पड़ा है ! जो तिरंगा सौ साल से हमारी आन-बान और शान रहा है, आज उन फर्जी राष्ट्रवादियों की छातियों पर चढ़ा शान से लहरा रहा है ! ये उनकी एकरंगी राष्ट्रध्वजा की सौ साल पुरानी परिकल्पना और साजिश के कान्तिविहीन और कमजोर होने का परिचायक भी है, जिसने इस देश को खंडित किया, और आज भी उसके लिए जी जान से प्रयासों में लगे हैं !

ये मौका है सभी देशवासियों के लिए एकजुट हो जाने का, हम इस तिरंगे की आन बान और शान पर आंच नहीं आने देंगे ! इसके स्वरुप को अक्षुष्ण रखेंगे और भले जितनी भी कुर्बानी देनी हो, देकर इस देश के झंडे के मोल को चुकाएंगे !

और हां, जिस प्रकार ये देश का असली टुकड़े टुकड़े गैंग राष्ट्रीय ध्वज के प्रति दुष्प्रचार करते रहे, ठीक ऐसे ही ये राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के लिए दुष्प्रचार करके उन्हें बदनाम करते रहे ! देख लीजिएगा जैसे आज उन्हें  सच्चाई को स्वीकार कर के तिरंगा को अपनाना पड़ रहा है, वैसे ही एक दिन गांधी और नेहरू को भी अपनाएंगे ।

अमृतकाल में आपका स्वागत है।

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