लोकतंत्र की बुनियाद जनता का विश्वास

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मताधिकार पर उठे सवालों का जवाब पारदर्शिता, प्रमाण और संवाद से देना होगा

सौरभ वार्ष्णेय

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का मताधिकार और चुनाव प्रणाली पर उसका विश्वास है। सत्ता किसके हाथ में रहेगी और कब बदलेगी, इसका निर्णय जनता करती है। इसी अधिकार की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत बनाती है। लेकिन जब चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, मतदाता सूचियों की शुद्धता को लेकर संदेह पैदा हो और विपक्ष कथित अनियमितताओं के विरोध में सड़क पर उतर आए, तब मामला केवल राजनीतिक दलों के आपसी संघर्ष तक सीमित नहीं रहता। वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख और जनता के भरोसे से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।

लोकतंत्र में जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है। यदि नागरिक के मन में यह आशंका बैठ जाए कि उसके मत का सम्मान नहीं होगा, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद कमजोर होने लगती है। इसलिए लोकतंत्र के प्रहरी कहलाने वाली संस्थाओं को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं, अपने कामकाज में निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। प्रत्येक मतदाता को यह भरोसा मिलना आवश्यक है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसका वोट सुरक्षित है और उसके निर्णय का सम्मान होगा।

राजधानी दिल्ली में मंगलवार, 6 अक्टूबर को हुए घटनाक्रम ने इस बहस को और गंभीर बना दिया। निर्वाचन आयोग की ओर बढ़ रहे विपक्षी सांसदों का मार्च पुलिस ने रोक दिया। इसके बाद आकाशवाणी भवन परिसर में राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेताओं का विरोध कई घंटे चला। शाम को पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया और बाद में रिहा कर दिया। इस घटनाक्रम ने चुनाव संबंधी शिकायतों के समाधान और विपक्ष से संवाद की आवश्यकता को फिर सामने रखा।

सवाल यह है कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर पैदा हुए संदेह का समाधान राजनीतिक टकराव से होगा या संस्थागत संवाद से? सड़क पर विरोध राजनीतिक असंतोष को सामने ला सकता है, लेकिन उसका स्थायी समाधान संबंधित संस्थाओं की जवाबदेही, तथ्यों की उपलब्धता और शिकायतों की निष्पक्ष पड़ताल से ही निकलेगा। संवाद बंद होने पर अविश्वास बढ़ता है और अविश्वास बढ़ने पर हर प्रशासनिक निर्णय राजनीतिक विवाद का विषय बनने लगता है।

विपक्ष मतदाता सूची और चुनाव प्रणाली में कथित अनियमितताओं को लेकर गंभीर आरोप लगा रहा है। ऐसे आरोपों को केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित रह जाने देना उचित नहीं होगा। यदि आरोप निराधार हैं, तो उन्हें स्पष्ट तथ्यों और अभिलेखों के साथ खारिज किया जाना चाहिए। यदि किसी स्तर पर गड़बड़ी के प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। लोकतंत्र में आरोपों की तीव्रता से अधिक महत्व प्रमाणों की प्रामाणिकता का है। जनता को ऐसा उत्तर चाहिए, जिससे संदेह दूर हो और वास्तविक स्थिति स्पष्ट दिखाई दे।

आयोग की साख, लोकतंत्र का भरोसा

यहां निर्वाचन आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है। उसकी निष्पक्षता में जनता का विश्वास ही चुनाव परिणामों की स्वीकार्यता का आधार बनता है। पराजित दल और उसके समर्थक भी परिणाम इसलिए स्वीकार करते हैं, क्योंकि उन्हें प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भरोसा होता है। इस भरोसे को बनाए रखना चुनाव संपन्न कराने जितना ही आवश्यक है।

जब चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठें, तब आयोग को अधिकतम पारदर्शिता के साथ अपना पक्ष जनता के सामने रखना चाहिए। मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया लोगों को स्पष्ट रूप से समझ में आनी चाहिए। जिस नागरिक का नाम हटे, उसे कारण जानने और अपनी शिकायत रखने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए। शिकायतों पर कार्रवाई समयबद्ध हो और उसका परिणाम संबंधित व्यक्ति तक पहुंचे। ऐसी व्यवस्था ही नागरिक को यह अनुभव कराती है कि संस्था उसके अधिकार की संरक्षक है।

निर्वाचन आयोग की प्रतिष्ठा केवल उसके संवैधानिक दर्जे से सुरक्षित नहीं रहती; वह उसके प्रत्येक निर्णय, उत्तर और व्यवहार से भी बनती है। इसलिए प्रश्न पूछने वालों के प्रति खुलापन संस्था की गरिमा को कम नहीं करता। स्पष्ट उत्तर और निष्पक्ष कार्रवाई उसकी विश्वसनीयता को मजबूत करते हैं।

विपक्ष की जिम्मेदारी भी तय हो

विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन गंभीर आरोपों के साथ ठोस प्रमाण प्रस्तुत करना उसका दायित्व भी है। ‘वोट चोरी’ जैसा आरोप करोड़ों मतदाताओं के विश्वास और पूरी चुनाव प्रक्रिया से जुड़ा है। इसलिए ऐसी शिकायतों को तथ्यों, संबंधित दस्तावेजों और स्पष्ट उदाहरणों के साथ सार्वजनिक तथा उपयुक्त संस्थागत मंचों पर रखा जाना चाहिए।

केवल नारे और राजनीतिक आक्रोश किसी आरोप को प्रमाणित नहीं कर सकते। विपक्ष को यह भी बताना चाहिए कि कथित गड़बड़ी कहां हुई, उसका स्वरूप क्या था और उपलब्ध प्रमाण किस निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं। इससे जनता को विषय समझने में सहायता मिलेगी और संबंधित संस्था के सामने भी स्पष्ट जवाब देने की जिम्मेदारी बनेगी। प्रमाण आधारित सवाल लोकतंत्र को मजबूत करते हैं और सुधार का रास्ता खोलते हैं।

दूसरी ओर, सत्ता पक्ष को भी विपक्ष के प्रत्येक सवाल को देशविरोध या लोकतंत्र विरोध के चश्मे से देखने से बचना चाहिए। असहमति लोकतांत्रिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। सवालों का उत्तर देने से सरकार की प्रतिष्ठा घटती नहीं है। पारदर्शिता और जवाबदेही के जरिए संदेह दूर करना किसी आरोप को राजनीतिक बयान बताकर टाल देने से कहीं अधिक प्रभावी रास्ता है।

टकराव से आगे बढ़े संवाद

निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के विरोध और प्रशासन की कार्रवाई के बीच संतुलन भी आवश्यक है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है। साथ ही शांतिपूर्ण विरोध और अपनी बात रखने के लिए उचित अवसर उपलब्ध कराना लोकतांत्रिक व्यवस्था की परिपक्वता का परिचायक है। प्रदर्शनकारियों से संयम और नियमों के पालन की अपेक्षा होनी चाहिए, तो प्रशासन से भी संवेदनशीलता और अनुपातिक कार्रवाई की अपेक्षा स्वाभाविक है।

मुलाकात का समय, प्रतिनिधिमंडल का आकार और स्थान जैसे विषय बातचीत से तय किए जा सकते हैं। इन प्रक्रियात्मक प्रश्नों को ऐसा अवरोध नहीं बनना चाहिए कि मूल शिकायत ही पीछे छूट जाए। संबंधित संस्था और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद का व्यावहारिक रास्ता निकालना सभी पक्षों की जिम्मेदारी है। मुलाकात किसी आरोप की स्वीकृति नहीं होती; वह शिकायत सुनने और अपना पक्ष स्पष्ट करने का अवसर होती है।

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव केवल निर्धारित अंतराल पर होने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। वह जनता के विश्वास की अभिव्यक्ति है। मतदान केंद्र पर पहुंचने वाला नागरिक इस भरोसे के साथ वोट डालता है कि उसकी पसंद दर्ज होगी और परिणाम निष्पक्ष प्रक्रिया से सामने आएंगे। इस विश्वास में दरार पड़ने का नुकसान किसी एक दल तक सीमित नहीं रहता। उससे पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित होती है।

आज आवश्यकता मतदाता सूची, मतदान, मतगणना और चुनावी शिकायतों से जुड़े सवालों पर स्पष्टता बढ़ाने की है। जहां त्रुटि हो, वहां सुधार दिखाई देना चाहिए। जहां आरोप गलत हो, वहां उसका तथ्यपूर्ण उत्तर सामने आना चाहिए। राजनीतिक दलों, निर्वाचन आयोग और नागरिक समाज के बीच संवाद बना रहना चाहिए तथा जरूरत पड़ने पर उपलब्ध न्यायिक प्रक्रियाओं का सहारा लिया जाना चाहिए।

राहुल गांधी और विपक्ष का सड़क पर उतरना उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन मतदाता के विश्वास का प्रश्न किसी एक दल की रणनीति से बड़ा है। क्या प्रत्येक पात्र नागरिक अपने मताधिकार को लेकर आश्वस्त है? क्या उसे शिकायत होने पर सुनवाई और समाधान का भरोसा है? इन सवालों का संतोषजनक उत्तर भाषणों से नहीं, संस्थाओं के कामकाज से मिलेगा।

चुनाव जनता को सत्ता सौंपने और उसे वापस लेने का अवसर देते हैं। इसीलिए चुनाव प्रणाली पर उठने वाले प्रत्येक गंभीर सवाल को जिम्मेदारी से लेना आवश्यक है। सरकार विपक्ष की बात सुने, विपक्ष अपने आरोपों के प्रमाण दे और निर्वाचन आयोग पारदर्शिता तथा निष्पक्षता की कसौटी पर जनता का भरोसा मजबूत करे। राजनीतिक टकराव तभी सुधार के अवसर में बदल सकता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। इसकी रक्षा का अर्थ है मतदाता के अधिकार की रक्षा, उसकी शिकायत की सुनवाई और उसके प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर। जनता को यह विश्वास रहना चाहिए कि सत्ता चाहे किसी की भी हो, उसके वोट की ताकत सुरक्षित है।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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