पूजा और प्रशंसा से आगे बढ़कर सुरक्षा, सम्मान और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करने की जरूरत
डॉ. वेदप्रकाश

नारी शक्ति के सम्मान और सशक्तिकरण की घोषणाओं के बीच महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की घटनाएं एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं—आखिर बेटियां निर्भय होकर कब जी सकेंगी? शिक्षा, खेल, विज्ञान और सार्वजनिक जीवन में अपनी प्रतिभा का परचम लहराने वाली महिलाओं को यदि रोजमर्रा के जीवन में सुरक्षा की चिंता सताती रहे, तो विकास और समानता के हमारे दावे अधूरे हैं।
दिल्ली-एनसीआर में हाल की दुष्कर्म की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान लेना इसी चिंता को रेखांकित करता है। महिला सुरक्षा को लेकर पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही, संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों की निगरानी तथा प्रकाश और सीसीटीवी व्यवस्था की समीक्षा जैसे कदम जरूरी हैं। लेकिन इनकी सार्थकता तभी है, जब अदालत की चिंता जमीन पर ठोस कार्रवाई में बदले और महिलाओं को सुरक्षा का भरोसा मिले।
आश्वासन से आगे कब बढ़ेगी व्यवस्था?
महिलाओं के विरुद्ध अपराध की कोई घटना सामने आती है तो समाज में आक्रोश फैलता है। धरने-प्रदर्शन होते हैं, कठोर कार्रवाई की मांग उठती है और प्रशासन आश्वासन देता है। सवाल यह है कि इसके बाद व्यवस्था में कितना स्थायी सुधार होता है? शिकायत दर्ज कराने से लेकर जाँच, गवाही और न्याय तक पीड़िता तथा उसके परिवार को किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, इस पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार होना चाहिए।
जहां धनबल, बाहुबल अथवा राजनीतिक प्रभाव से जाँच प्रभावित होने की शिकायत उठे, वहां स्वतंत्र और पारदर्शी कार्रवाई आवश्यक है। किसी आरोपी का पद, परिचय या सामाजिक प्रभाव उसे संरक्षण नहीं दे सकता। अपराध की जाँच कमजोर करना, साक्ष्यों की अनदेखी करना अथवा पीड़िता पर समझौते का दबाव डालना न्याय की बुनियाद पर चोट है।
व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल गिरफ्तारी की घोषणा नहीं, बल्कि निष्पक्ष जाँच, ठोस साक्ष्य और न्यायालय में दोष सिद्ध होने पर उचित दंड होना चाहिए।
पूजन में सम्मान, व्यवहार में असुरक्षा
हमारी सांस्कृतिक चेतना में कहा गया है—“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” नवरात्र में कन्या पूजन होता है, स्त्री को गृहलक्ष्मी कहा जाता है और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का संदेश दिया जाता है। इन आदर्शों की वास्तविक कसौटी हमारा व्यवहार है। क्या परिवार, विद्यालय, कार्यस्थल और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं को बराबरी, स्वतंत्रता तथा सम्मान मिल रहा है?
साइना नेहवाल, मैरी कॉम और लवलीना जैसी खिलाड़ियों की उपलब्धियां बताती हैं कि अवसर और सहयोग मिलने पर बेटियां कितनी ऊंचाइयां छू सकती हैं। शिक्षा, शोध, प्रशासन और उद्यमिता में भी महिलाएं अपनी क्षमता सिद्ध कर रही हैं। उनकी उपलब्धियों पर गर्व करने वाले समाज को उनकी सुरक्षा के प्रश्न पर भी उतनी ही प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
किसी बेटी की सफलता पर तालियां बजाना आसान है; उसके लिए सुरक्षित रास्ता, संवेदनशील संस्थान और न्याय तक निर्बाध पहुंच सुनिश्चित करना हमारी असली जिम्मेदारी है।
कठोर कानून का प्रभावी पालन जरूरी
महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए कानून में कठोर दंड मौजूद हैं। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 65 के अनुसार, 16 वर्ष से कम आयु की लड़की से दुष्कर्म पर न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। 12 वर्ष से कम आयु की बच्ची से दुष्कर्म में न्यूनतम 20 वर्ष के कठोर कारावास से लेकर शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास तथा जुर्माना, अथवा मृत्युदंड का प्रावधान है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि ऐसे प्रत्येक मामले में फाँसी अनिवार्य है।
कठोर प्रावधानों के साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी आवश्यक है। समय पर शिकायत दर्ज हो, चिकित्सकीय और फॉरेंसिक साक्ष्य सुरक्षित रखे जाएं, गवाहों को संरक्षण मिले तथा अभियोजन अपनी जिम्मेदारी निभाए। इनमें कमी रह जाए तो पीड़िता के लिए न्याय की राह कठिन हो जाती है।
न्यायाधीश साक्ष्यों और कानून के आधार पर निर्णय देते हैं। इसलिए केवल कठोरतम सजा की मांग करके जाँच और अभियोजन की कमजोरियों से ध्यान नहीं हटाया जा सकता। जवाबदेही पूरी प्रक्रिया की तय करनी होगी।
न्याय के साथ संस्थागत सुधार भी
कोलकाता के आर.जी. कर अस्पताल में महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना ने देश को झकझोर दिया था। इस मामले में निचली अदालत ने 20 जनवरी, 2025 को संजय रॉय को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसलिए मामले का उल्लेख करते समय इस न्यायिक निर्णय को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
ऐसी घटनाएं संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाती हैं। अस्पतालों, छात्रावासों, शिक्षण संस्थानों और कार्यालयों में महिलाओं के लिए सुरक्षित वातावरण बनाना प्रबंधन की स्पष्ट जिम्मेदारी होनी चाहिए। शिकायतों पर कार्रवाई, सुरक्षित आवागमन और आपात स्थिति में तत्काल सहायता की व्यवस्था कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सुरक्षा के उपायों को छोटा न समझें
स्ट्रीट लाइट, सीसीटीवी और पुलिस गश्त अपने आप में संपूर्ण समाधान नहीं हैं, लेकिन इन्हें निरर्थक भी नहीं कहा जा सकता। अंधेरे रास्तों पर पर्याप्त रोशनी, संवेदनशील स्थानों पर निगरानी और शिकायत पर शीघ्र पुलिस सहायता सुरक्षा व्यवस्था के जरूरी हिस्से हैं।
इनके साथ यह भी तय होना चाहिए कि खराब लाइट कौन ठीक करेगा, बंद कैमरा कितने समय में चालू होगा और बार-बार शिकायत के बावजूद कार्रवाई न करने वाले अधिकारी से जवाब कौन मांगेगा। सुरक्षा ऑडिट तभी उपयोगी है, जब उसकी कमियां दूर करने की जिम्मेदारी और समयसीमा स्पष्ट हों।
महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनकी पढ़ाई, नौकरी या आवाजाही पर प्रतिबंध लगाने की प्रवृत्ति भी बदलनी होगी। सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना शासन और समाज का दायित्व है।
कठोर कार्रवाई कानून के दायरे में हो
जघन्य अपराधों पर जनाक्रोश स्वाभाविक है। पीड़िता और उसके परिवार की पीड़ा समाज को कठोर कार्रवाई की मांग के लिए उद्वेलित करती है। लेकिन न्याय सुनिश्चित करने के लिए निष्पक्ष जाँच और विधिसम्मत दंड की प्रक्रिया को मजबूत करना होगा।
एनकाउंटर अथवा बिना विधिसम्मत प्रक्रिया संपत्ति ध्वस्त करने को महिला सुरक्षा का समाधान मानना उचित नहीं है। ऐसी कार्रवाई पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति केवल इसी कारण अपराधी नहीं हो जाता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और सरकार की जवाबदेही पर प्रश्न उठाने की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए।
अपराधियों में कानून का भय होना चाहिए—इस विश्वास के साथ कि निष्पक्ष जाँच होगी, प्रभावशाली व्यक्ति भी नहीं बच सकेगा और दोष सिद्ध होने पर कठोर दंड मिलेगा।
संस्कारों में बराबरी, व्यवहार में संवेदनशीलता
गार्गी, जीजाबाई और सावित्रीबाई फुले जैसी विभूतियां हमें स्त्री की विद्वत्ता, नेतृत्व और संघर्ष की समृद्ध विरासत से परिचित कराती हैं। उस विरासत का सम्मान वर्तमान की महिलाओं को गरिमा और अवसर देकर ही किया जा सकता है।
घर और विद्यालय में लड़कों को बचपन से बराबरी, सहमति और व्यक्तिगत सीमाओं का सम्मान सिखाना होगा। अश्लील टिप्पणी, पीछा करने या अवांछित व्यवहार को ‘मजाक’ कहकर टालना बंद करना होगा। पीड़िता के कपड़ों, समय या स्थान पर सवाल उठाकर अपराधी की जिम्मेदारी कम करने की मानसिकता भी बदलनी होगी।
महिलाओं को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण, आपात सहायता की जानकारी और अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता मिलनी चाहिए। लेकिन सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर डाल देना व्यवस्था की जवाबदेही से पीछे हटना होगा।
सुरक्षित नारी से ही सशक्त भारत
विकसित भारत के संकल्प में महिलाएं बराबर की भागीदार हैं। उनकी शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, कौशल और नेतृत्व के अवसर जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही आवश्यक उनकी सुरक्षा है। महिला प्रतिनिधित्व और आर्थिक सशक्तिकरण के प्रयास तभी व्यापक अर्थ पाएंगे, जब महिलाएं भयमुक्त होकर उनका लाभ उठा सकेंगी।
केंद्र और राज्य सरकारों, पुलिस, न्याय व्यवस्था, स्थानीय निकायों, शिक्षण संस्थानों तथा समाज को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। पीड़िताओं को चिकित्सा, कानूनी सहायता, परामर्श और पुनर्वास का सहारा भी मिलना चाहिए।
नारी को शक्ति कहने का अर्थ उसके अधिकारों की रक्षा करना है। जिस दिन कोई बेटी घर से निकलते समय भय के बजाय भरोसा महसूस करेगी और अन्याय होने पर उसे बिना अपमान तथा दबाव के न्याय मिल सकेगा, उसी दिन नारी सशक्तिकरण का संकल्प अपने वास्तविक अर्थ के निकट पहुंचेगा।








