अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस : 1 अक्टूबर :

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बढ़ती उम्र, बढ़ती चुनौतियां: कितना तैयार है भारत?

बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के बीच स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने की चुनौती

ओ.पी. पाल

दुनिया भर में हर वर्ष 1 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस वरिष्ठ नागरिकों के योगदान को सम्मान देने के साथ उनकी जरूरतों और अधिकारों पर गंभीरता से विचार करने का अवसर है। इंसान पहले से अधिक लंबा जीवन जी रहा है, लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा है—क्या जीवन के बढ़ते वर्षों को हम सुरक्षित, स्वस्थ और सम्मानजनक बना पा रहे हैं?

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने इस अवसर पर अपने संदेश में कहा है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या बढ़कर 2.1 अरब हो जाने का अनुमान है। उन्होंने रोजगार, पेंशन, आवास, स्वास्थ्य सेवाओं और जीवनभर सीखने के अवसरों से जुड़ी नीतियों को मजबूत करने तथा पीढ़ियों के बीच सहयोग बढ़ाने का आह्वान किया है। उनका संदेश स्पष्ट है कि लंबा जीवन अपनी पसंद, सुरक्षा और गरिमा के साथ जीने का अवसर भी बनना चाहिए।

बदल रही है दुनिया की उम्र

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2050 तक वैश्विक आबादी में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी लगभग 22 प्रतिशत हो सकती है। वर्ष 2020 में ही इस आयु वर्ग की संख्या पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों से अधिक हो चुकी थी। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि दुनिया में बुजुर्गों की संख्या समस्त युवा आबादी से अधिक हो गई है; वास्तविकता यह है कि आबादी की आयु-संरचना तेजी से बदल रही है।

स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार और जीवन परिस्थितियों में सुधार से मानव आयु में हुई वृद्धि हमारे समय की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इस उपलब्धि के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और देखभाल की व्यवस्था विकसित करना भी जरूरी है। बढ़ती उम्र को केवल व्यक्ति या परिवार की जिम्मेदारी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह सरकारों और समाज की दीर्घकालिक तैयारी का विषय है।

समाज की अमूल्य पूंजी हैं बुजुर्ग

भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को मार्गदर्शक और परिवार की रीढ़ माना जाता है। उनका अनुभव, ज्ञान और जीवन-संघर्ष अगली पीढ़ियों को दिशा देते हैं। परिवारों में बच्चों की देखभाल से लेकर सामाजिक संबंधों को मजबूत बनाने तक उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। वरिष्ठ नागरिक समाज के सक्रिय सहभागी हैं और उनकी क्षमताओं का सम्मान होना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस इसी सोच को व्यापक बनाने का अवसर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर 1990 को एक प्रस्ताव के माध्यम से 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के रूप में नामित किया था। इसका उद्देश्य वृद्धजनों के प्रति समाज का ध्यान आकर्षित करना और उनकी गरिमा तथा अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

बुजुर्गों का सम्मान केवल समारोहों, शुभकामनाओं या औपचारिक संबोधनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। परिवार के निर्णयों में उनकी राय, अपनी दिनचर्या चुनने की स्वतंत्रता और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी के अवसर भी उतने ही आवश्यक हैं।

भारत के सामने बदलती आबादी की चुनौती

अपनी बड़ी युवा आबादी के लिए पहचाने जाने वाले भारत में भी वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, वर्ष 2050 तक देश में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 34.7 करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है। यह बदलाव स्वास्थ्य, आवास, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं में बुजुर्गों की जरूरतों को केंद्रीय स्थान देने की मांग करता है।

विशेष रूप से अकेली रहने वाली बुजुर्ग महिलाओं और दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों के वृद्धजनों की परिस्थितियों पर ध्यान देना जरूरी है। नियमित आय, इलाज तक पहुँच और दैनिक देखभाल का अभाव उनकी कठिनाइयों को बढ़ा सकता है। जीवनसाथी की मृत्यु या बच्चों के रोजगार के लिए बाहर चले जाने पर आर्थिक निर्भरता के साथ भावनात्मक अकेलापन भी गंभीर चुनौती बन सकता है।

असंगठित क्षेत्र में जीवनभर काम करने वाले अनेक लोगों के पास वृद्धावस्था के लिए नियमित पेंशन या पर्याप्त बचत नहीं होती। ऐसे में बढ़ती उम्र के साथ आय घटने और खर्च बढ़ने की दोहरी स्थिति पैदा होती है। सामाजिक सुरक्षा की नीति बनाते समय इस वर्ग की जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी।

स्वास्थ्य सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

भारत में वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का विस्तार किया गया है। आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना शामिल करने का प्रावधान है। आयुष्मान वय वंदना कार्ड के माध्यम से योजना के नियमों के अनुसार सूचीबद्ध अस्पतालों में अस्पताल में भर्ती होने वाले निर्धारित उपचारों के लिए सालाना पाँच लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर मिलता है।

इस व्यवस्था में कवर पारिवारिक आधार पर लागू होता है। जो परिवार पहले से आयुष्मान भारत योजना में शामिल हैं, उनके 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सदस्यों के लिए सालाना पाँच लाख रुपये तक का अतिरिक्त कवर निर्धारित है, जिसे परिवार के कम आयु वाले सदस्यों के साथ साझा नहीं करना पड़ता। इसलिए इसे प्रत्येक बुजुर्ग के लिए हर प्रकार के इलाज पर अलग से पाँच लाख रुपये की सुविधा के रूप में नहीं समझना चाहिए।

ऐसी पहल का वास्तविक लाभ तभी बढ़ेगा, जब बुजुर्गों को पंजीकरण, अस्पताल तक पहुँचने और उपचार प्राप्त करने में व्यावहारिक सहायता मिले। नियमित जाँच, दवाओं की उपलब्धता और घर के निकट स्वास्थ्य सेवाओं को भी समान महत्व देना होगा।

आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा का विस्तार

वरिष्ठ नागरिक बचत योजना बुजुर्गों के लिए सरकार समर्थित बचत का एक विकल्प है। हालांकि बचत आधारित योजनाओं के साथ उन लोगों के लिए पर्याप्त सहायता भी जरूरी है, जिनके पास निवेश करने योग्य धन नहीं है। जरूरतमंद वृद्धजनों के लिए पेंशन की समय पर उपलब्धता और आवेदन प्रक्रिया की सरलता विशेष महत्व रखती है।

अटल वयो अभ्युदय योजना के अंतर्गत वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा के लिए विभिन्न पहल संचालित की जा रही हैं। राष्ट्रीय हेल्पलाइन ‘एल्डरलाइन’ का टोल-फ्री नंबर 14567 वरिष्ठ नागरिकों को सूचना, मार्गदर्शन, भावनात्मक सहयोग और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने का माध्यम है।

इन व्यवस्थाओं की सफलता केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं आँकी जा सकती। यह देखना होगा कि जरूरतमंद बुजुर्ग तक सहायता कितनी आसानी से पहुँचती है और शिकायत होने पर उसका समाधान कितनी संवेदनशीलता से किया जाता है।

अकेलेपन और डिजिटल दूरी पर भी ध्यान

वृद्धावस्था की चुनौतियां आर्थिक सहायता और इलाज तक सीमित नहीं हैं। किसी से बात करने का अवसर, अपनापन और सामाजिक जुड़ाव भी जीवन की गुणवत्ता तय करते हैं। मोहल्लों और गाँवों में वरिष्ठ नागरिक समूह, सामुदायिक गतिविधियाँ और नियमित संवाद की व्यवस्था इस दिशा में उपयोगी हो सकती है।

डिजिटल होती सेवाओं के बीच उन बुजुर्गों का ध्यान रखना भी जरूरी है, जिन्हें मोबाइल एप, ऑनलाइन आवेदन या डिजिटल सत्यापन में कठिनाई होती है। बैंक, अस्पताल और सरकारी कार्यालयों में सहायता की सहज व्यवस्था होनी चाहिए। तकनीक सुविधाएँ बढ़ाए और उसके उपयोग में कठिनाई किसी व्यक्ति को उसके अधिकारों से वंचित न करे।

लंबे जीवन के साथ गरिमा की गारंटी

भारत की तैयारी का वास्तविक पैमाना यह होगा कि एक बुजुर्ग अपने घर, गाँव या शहर में कितना सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करता है। क्या उसे समय पर पेंशन मिलती है? क्या इलाज सुलभ है? क्या उसकी बात सुनी जाती है? क्या वह अपनी पसंद के अनुसार जीवन जी सकता है?

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस सरकार, समाज और परिवार—तीनों को अपनी जिम्मेदारी याद दिलाता है। बुजुर्गों के अनुभव को स्थान देने, उनकी जरूरतों को समझने और उनके अधिकारों की रक्षा करने से ही पीढ़ियों के बीच विश्वास मजबूत होगा। लंबी उम्र मानवता की उपलब्धि है; उसे सम्मानजनक और खुशहाल बनाना हमारी साझा जिम्मेदारी है।

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Author: Bharat Sarathi

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