जीवनरक्षक उपचार परिवारों की आर्थिक बर्बादी का कारण न बने; दवा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता और अस्पतालों की जवाबदेही जरूरी
– सुरेश गोयल धूप वाला , पूर्व जिला महामंत्री भाजपा जिला हिसार
जीवनरक्षक दवाओं का उद्देश्य पीड़ित व्यक्ति को नया जीवन देना है। लेकिन जब इन्हीं दवाओं का खर्च किसी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त कर दे, उसे कर्ज और बेबसी में धकेल दे, तो सवाल केवल इलाज की महंगाई का नहीं रहता। यह स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता, उसकी जवाबदेही और समाज के नैतिक मूल्यों का भी प्रश्न बन जाता है। बीमारी से लड़ते व्यक्ति को उपचार की उम्मीद चाहिए। दवाओं की कीमत ही उसके और जीवन के बीच दीवार बन जाए, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
दस गुने अंतर का लाभ किसे?
कैंसर की कुछ आवश्यक दवाओं के मूल्य में भारी अंतर पर सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों ने इस समस्या की ओर ध्यान खींचा है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत के सामने लगभग 2,700 रुपये के खुदरा विक्रेता मूल्य वाली दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य लगभग 27,000 रुपये होने का उदाहरण रखा गया। न्यायालय ने इस अंतर पर कड़ी नाराजगी जताते हुए “दिनदहाड़े डकैती” जैसी टिप्पणी की।
यहां यह समझना जरूरी है कि खुदरा विक्रेता को मिलने वाला मूल्य दवा की उत्पादन लागत नहीं होता। फिर भी, उस मूल्य और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच इतना बड़ा अंतर स्पष्ट जवाब मांगता है। आखिर अतिरिक्त राशि किसे मिलती है? उसकी उचित सीमा क्या होनी चाहिए और मरीज के हितों की रक्षा कौन करेगा?
यह प्रश्न किसी एक दवा या अस्पताल तक सीमित नहीं है। यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में मरीज और उसका परिवार पहले ही मानसिक, शारीरिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा होता है। ऐसे समय उसकी विवशता से असामान्य लाभ कमाना मानवीय संवेदनाओं के विपरीत है।
छूट के पीछे छिपा मूल्य का सवाल
समस्या केवल इतनी नहीं कि किसी दवा पर छूट मिल रही है या नहीं। मूल प्रश्न यह है कि उसका अधिकतम खुदरा मूल्य किस आधार पर तय हुआ है। यदि शुरुआती मूल्य ही अत्यधिक रखा गया हो, तो कुछ प्रतिशत छूट मिलने के बाद भी मरीज महंगा भुगतान कर सकता है।
एक ही दवा अलग-अलग विक्रेताओं के यहां अलग कीमत पर मिले, तो सामान्य व्यक्ति के लिए उचित मूल्य समझना कठिन हो जाता है। गंभीर बीमारी के दौरान परिवार के पास न दुकानों के चक्कर लगाने का समय होता है और न कीमतों की तुलना करने की मानसिक स्थिति। इसी मजबूरी के कारण मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता और भी आवश्यक हो जाती है।
अधिकतम खुदरा मूल्य मरीज के संरक्षण की सीमा होना चाहिए। उसे ऐसी व्यवस्था का आधार नहीं बनना चाहिए, जिसमें बड़ी छूट दिखाकर भी अत्यधिक लाभ कमाया जा सके।
अस्पताल की फार्मेसी से खरीदने की बाध्यता क्यों?
निजी अस्पतालों में अपनी ही फार्मेसी से दवाएं खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की शिकायतें भी गंभीर हैं। यदि वही दवा किसी अन्य अधिकृत विक्रेता के यहां कम कीमत पर उपलब्ध है, तो मरीज के विकल्प अनावश्यक रूप से सीमित क्यों किए जाएं?
कुछ दवाओं में गुणवत्ता, प्रामाणिकता, भंडारण और तापमान संबंधी सावधानियां आवश्यक हो सकती हैं। लेकिन ऐसी जरूरतों का आधार स्पष्ट और चिकित्सकीय होना चाहिए। मरीज की सुरक्षा के नाम पर व्यावसायिक हितों को संरक्षण देना स्वीकार्य नहीं हो सकता।
अस्पतालों को दवाओं के नाम, मात्रा, मूल्य और उपलब्ध विकल्पों की स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। परिवार को यह समझने का अवसर मिलना चाहिए कि उससे किस मद में कितना भुगतान लिया जा रहा है।
चिकित्सा के विश्वास पर चोट
दवा कंपनियों, अस्पतालों और कुछ चिकित्सकों के बीच कथित व्यावसायिक गठजोड़ तथा अनुचित प्रोत्साहनों के आरोप समय-समय पर उठते हैं। हर आरोप की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। बिना जांच पूरे चिकित्सा समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन प्रमाणित अनियमितताओं को नजरअंदाज करना भी उतना ही गलत है।
डॉक्टर और मरीज का संबंध विश्वास पर टिका होता है। मरीज इस भरोसे के साथ उपचार कराता है कि उसे जो दवा लिखी जा रही है, वह उसकी चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुरूप है। यदि किसी निर्णय में रोगी के हित से अधिक आर्थिक लाभ को महत्व दिया जाए, तो इससे पूरे चिकित्सा पेशे की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
स्वास्थ्य संस्थानों के संचालन, कुशल कर्मचारियों, शोध और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं पर खर्च होता है। उचित आय की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उचित आय और रोगी की मजबूरी से असंगत लाभ कमाने के बीच स्पष्ट सीमा होनी चाहिए।
पारदर्शिता के साथ प्रभावी निगरानी
न्यायालय में उठे सवालों का उत्तर केवल आश्वासनों से नहीं दिया जा सकता। सरकार को दवा मूल्य निर्धारण, वितरण व्यवस्था और अस्पतालों की फार्मेसी से जुड़ी शिकायतों पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।
दवाओं के खरीद और बिक्री मूल्य के अंतर की जांच हो। मरीज को स्पष्ट एवं मदवार बिल मिले। अनुचित वसूली की शिकायत के लिए सरल व्यवस्था हो और प्रमाणित उल्लंघनों पर समयबद्ध कार्रवाई की जाए। गुणवत्ता सुनिश्चित करते हुए सस्ती जेनरिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई जाए तथा उपयुक्त विकल्पों के बारे में मरीज को जानकारी दी जाए।
मरीज को चिकित्सकीय आवश्यकताओं और सुरक्षित भंडारण की शर्तों के अनुरूप किसी लाइसेंस प्राप्त विक्रेता से दवा खरीदने का विकल्प भी मिलना चाहिए। साथ ही, सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है।
इलाज उम्मीद दे, आर्थिक विनाश नहीं
स्वास्थ्य सेवा किसी भी सभ्य समाज की पहचान होती है। यदि कोई व्यक्ति केवल दवा की कीमत के कारण उपचार अधूरा छोड़ने को विवश हो जाए, तो विकास की उपलब्धियों के बीच यह एक गहरी मानवीय विफलता है। इलाज तक पहुंच व्यक्ति की आर्थिक हैसियत पर इस कदर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि बीमारी पूरे परिवार का भविष्य निगल जाए।
सर्वोच्च न्यायालय में उठी चिंता सरकार, दवा उद्योग, अस्पतालों और चिकित्सा जगत—सभी के लिए आत्ममंथन का अवसर है। जरूरत ऐसे ठोस सुधारों की है, जिनका लाभ मरीज को उसके बिल में, दवा की उपलब्धता में और उपचार जारी रखने की क्षमता में दिखाई दे।
जीवनरक्षक दवाएं जीवन बचाने की उम्मीद हैं। इन्हें परिवारों के आर्थिक विनाश का कारण बनने से रोकना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।








