डॉ. प्रवीण शुक्ल साहित्य सेवार्थ ‘सुरुचि सम्मान 2026’ से अलंकृत
शानदार काव्य प्रस्तुति ने श्रोताओं को किया भाव-विभोर, कवियों ने बिखेरे विविध रंग
गुरुग्राम। सुरुचि परिवार के तत्वावधान में रविवार, 31 मई 2026 को सायं 5 बजे “एक शाम डॉ. प्रवीण शुक्ल के नाम” कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। साहित्य, संवेदना और हास्य-व्यंग्य से सराबोर इस आयोजन में देश के प्रख्यात कवि डॉ. प्रवीण शुक्ल की प्रभावशाली काव्य प्रस्तुति ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ चिकित्सक एवं समाजसेवी डॉ. परमेश्वर अरोड़ा ने की, जबकि प्रख्यात समाजसेवी प्रमोद सलूजा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में कर्नल कुँवर प्रताप सिंह, जनरल सरीन, पूर्व कुलपति डॉ. अशोक दिवाकर, निर्मल यादव, डॉ. आर.पी. सिंह, मंजु भारती एवं जगदीश ग्रोवर प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सधा हुआ संचालन मदन साहनी ने किया।
प्रथम सत्र में वीणा अग्रवाल एवं द्वितीय सत्र में अंजलि श्रीवास्तव ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ हुआ।
इस अवसर पर हिंदी साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए डॉ. प्रवीण शुक्ल को साहित्य सेवार्थ ‘सुरुचि सम्मान 2026’ से सम्मानित किया गया। सम्मान ग्रहण करने के पश्चात डॉ. शुक्ल ने अपनी लोकप्रिय, भावनात्मक, प्रेरक, गंभीर एवं हास्य-व्यंग्य रचनाओं की प्रस्तुति देकर समूचे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया।
उन्होंने अपनी चर्चित पंक्तियाँ प्रस्तुत करते हुए कहा—

“कैसे कह दूँ थक गया हूँ मैं,
जाने किस-किस का हौसला हूँ मैं।”
इसके साथ ही उन्होंने बदलते सामाजिक मूल्यों पर कटाक्ष करते हुए सुनाया—
“समय था वह भी जब हर ओर अच्छे लोग रहते थे,
जलन, नफरत, घुटन से दूर ऐसे लोग रहते थे।
यहाँ महलों में भी पसरा है अब तो झूठ का साया,
कभी कच्चे मकानों में भी सच्चे लोग रहते थे।”
उनकी भावनात्मक रचना—
“कभी-कभी की बात नहीं है, मेरे संग अक्सर चलता है,
घर से बाहर रहता हूँ तो, मेरे भीतर घर चलता है।”
ने श्रोताओं को गहरे तक स्पर्श किया।
छंदबद्ध रचनाओं, गीत, ग़ज़ल, मुक्तक एवं हास्य-व्यंग्य की विविध विधाओं में अपनी प्रस्तुति से डॉ. प्रवीण शुक्ल ने साहित्यिक रंगों की अद्भुत छटा बिखेरी। जब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता “भीष्म प्रतिज्ञा” का पाठ किया तो पूरा सभागार खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ उनका अभिवादन करने लगा।
काका हाथरसी सम्मान से अलंकृत डॉ. प्रवीण शुक्ल की चर्चित हास्य-व्यंग्य रचना “भूकंप के बाद” ने भी खूब तालियाँ बटोरीं। सिंहावलोकन छंद के माध्यम से प्रस्तुत उनकी पंक्तियाँ—
“चोटी पर भी तो खायेगा वही चार रोटी”
पर श्रोताओं ने जोरदार ठहाके लगाए।
उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से चुनावी राजनीति और नेताओं के झूठे वादों पर तीखा व्यंग्य करते हुए कहा—
“सूरज को उत्तर दिशा में छुपवाऊंगा।”
तथा
“गदहे के सिंह जैसा गायब हुआ चमचा,
दुख आगे झुक कर पानी भरने लगे।”
कार्यक्रम के प्रथम सत्र में आयोजित काव्य गोष्ठी में मनोज अबोध, रानी श्रीवास्तव, माही राव, शुभ्रा पालीवाल, संजीव नादान, त्रिलोक कौशिक, राजेश्वर वशिष्ठ, राजपाल यादव, रमा त्यागी, रेणु मिश्रा, मोनिका शर्मा, रश्मि ममगाई, विमलेंदु सागर, वीणा अग्रवाल, एस.एस. यादव, मेघना शर्मा, सुरेंद्र मनचंदा एवं हरीश कुमार सहित लगभग 20 कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ कर विविध साहित्यिक रंग बिखेरे।
इस अवसर पर सुनील यादव, पिंकी शर्मा, रामलाल ग्रोवर, शशांक मोहन शर्मा, ज्योति श्रीवास्तव, आशीष श्रीवास्तव, अनिल श्रीवास्तव सहित अनेक कवि, साहित्यकार एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।









