डॉ. शैलेश शुक्ला

हाँ, मैं ठेकेदार के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं वही जीव हूँ जो इस महान राष्ट्र की टूटी सड़कों, अधूरे पुलों, झूलते बिजली के खंभों, बरसात में बह जाने वाली नालियों, उद्घाटन से पहले ही झड़ती दीवारों, सरकारी योजनाओं, निविदाओं, कमीशनों, प्रतिशतों और “कार्य प्रगति पर है” वाले बोर्डों के बीच उसी आत्मविश्वास से जीवित रहता है जैसे सीवर में पलता कॉकरोच। मैं विकास का आधिकारिक व्यापारी हूँ। मैं वह आदमी हूँ जो जनता के टैक्स को सीमेंट, बालू, गिट्टी और बिलों में बदलता है। मैं आधुनिक भारत का वह चमत्कारी जीव हूँ जो सड़क बनने से पहले भी कमाता है, सड़क टूटने के बाद भी कमाता है और सड़क दोबारा बनने पर भी कमाता है।
पहले मैं भी सामान्य इंसान था। मुझे लगता था कि निर्माण का अर्थ विकास होता है। पुल बनेंगे तो लोग जुड़ेंगे। सड़कें बनेंगी तो गाँव आगे बढ़ेंगे। भवन बनेंगे तो समाज मजबूत होगा। फिर पहली बार सरकारी निविदा भरी। उसी दिन समझ आ गया कि निर्माण कार्य में सबसे कम महत्वपूर्ण चीज निर्माण होती है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ होती है संपर्क, प्रतिशत, स्वीकृति और “ऊपर तक सेटिंग”। मुझे बताया गया — “बेटा, केवल अच्छा काम करने से ठेका नहीं मिलता, अच्छा संबंध भी चाहिए।” उसी दिन मेरे भीतर का सीधा आदमी मरने लगा और कॉकरोच जन्म लेने लगा।
कॉकरोच की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह किसी भी वातावरण में जीवित रह सकता है। बिल्कुल मेरी तरह। सरकार बदले — मैं जीवित। विभाग बदले — मैं जीवित। नियम बदल जाएँ — मैं जीवित। जाँच बैठ जाए — मैं जीवित। सड़क टूट जाए — मैं फिर भी जीवित। मैं लोकतंत्र का वह अद्भुत प्राणी हूँ जो हर आपदा में अवसर खोज लेता है। बरसात में सड़क टूटे तो मेरे लिए नया ठेका। बाढ़ आए तो पुनर्निर्माण। पुल गिरे तो विशेष बजट। जितनी बड़ी तबाही, उतनी बड़ी संभावना। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि विकास और विनाश दोनों के बीच मैं ही स्थायी तत्व हूँ।
मुझे सबसे अधिक आनंद निविदा प्रक्रिया में आता है। क्या अद्भुत लोकतांत्रिक नाटक होता है! बाहर से सब पारदर्शी दिखाई देता है। अखबार में विज्ञापन छपता है। शर्तें जारी होती हैं। तकनीकी पात्रता होती है। वित्तीय बोली खुलती है। और भीतर? भीतर पहले से तय होता है कि किसे काम मिलना है। बाकी लोग केवल लोकतंत्र का मंच सजाने आते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो केवल इसलिए निविदा भरते हैं ताकि बाद में कह सकें — “प्रक्रिया निष्पक्ष थी।” वाह व्यवस्था! तुमने औपचारिकता को भी कितनी सुंदर गरिमा दे दी है।
कॉकरोच अँधेरे में पलता है। ठेकेदार अनुमानित लागत में। कोई भी परियोजना हो, उसका वास्तविक खर्च और कागजी खर्च दो अलग-अलग ग्रहों की चीजें होती हैं। कागज पर पुल इतना मजबूत होता है कि मानो हाथी भी नाच लें। जमीन पर पहला ट्रक चढ़ते ही वह दर्शनशास्त्र बन जाता है। लेकिन चिंता किसे है? उद्घाटन हो चुका। फीता कट चुका। फोटो छप चुकी। मंत्री जी भाषण दे चुके। जनता ने ताली बजा दी। अब यदि सड़क छह महीने बाद गड्ढा बन जाए तो वह भविष्य की निविदा का बीज है।
मुझे सबसे अधिक हास्य “गुणवत्ता जाँच” में आता है। निरीक्षण अधिकारी आता है। हेलमेट पहनता है। गंभीर चेहरा बनाता है। दीवार थपथपाता है। फाइल देखता है। फिर चाय पीता है। और अंत में लिख देता है — “कार्य संतोषजनक है।” यही भारतीय निर्माण व्यवस्था का सबसे महान साहित्यिक वाक्य है। दीवार टेढ़ी हो सकती है, नाली अधूरी हो सकती है, सड़क पहली बारिश में बह सकती है, लेकिन कागज पर सब “संतोषजनक” होता है। इस देश में वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली दस्तावेज होता है।
धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि निर्माण कार्य में सीमेंट से अधिक महत्वपूर्ण प्रतिशत होता है। परियोजना ऊपर से नीचे तक यात्रा करती है। हर स्तर पर उसका थोड़ा-थोड़ा वजन कम होता जाता है। अंत में जब काम जमीन पर आता है तो ठेकेदार सोचता है — “अब बचा क्या?” फिर वह बालू बढ़ा देता है, सीमेंट घटा देता है, लोहे की मोटाई कम कर देता है और जनता सोचती है कि भ्रष्टाचार केवल नेता करता है। अरे भाई, यह तो सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव है। यहाँ पूरी व्यवस्था मिलकर विकास को खाती है।
मुझे जनता पर बहुत प्रेम आता है। वही जनता जो नई सड़क देखकर प्रसन्न हो जाती है, चाहे वह अगले मानसून में गड्ढा बन जाए। उद्घाटन हमारे देश का सबसे बड़ा उत्सव है। परियोजना पूरी हो या न हो, उद्घाटन होना चाहिए। नेता आएँगे। नारियल फूटेगा। फीता कटेगा। माला पड़ेगी। मंच लगेगा। भाषण होगा — “यह विकास की ऐतिहासिक उपलब्धि है।” और पीछे मजदूर सोच रहा होगा कि उसका भुगतान कब मिलेगा।
कॉकरोच को मारना कठिन होता है। ठेकेदार को उससे भी कठिन। जाँच आयोग बैठ जाए? हम कागज दिखा देंगे। मीडिया शोर मचाए? हम दूसरी पार्टी के नेता से फोटो खिंचवा लेंगे। सरकार बदल जाए? हम नए रंग का गमछा पहन लेंगे। ठेकेदार भारतीय राजनीति का वह गिरगिट है जो विचारधारा नहीं, अवसर के अनुसार रंग बदलता है।
मुझे सबसे अधिक आनंद बरसात में आता है। बरसात भारतीय ठेकेदार का वार्षिक बोनस होती है। सड़कें टूटती हैं। नालियाँ उफनती हैं। पुलों में दरारें आती हैं। फिर आपात बैठक होती है। फिर मरम्मत का बजट आता है। फिर वही सड़क दोबारा बनती है। यही भारतीय विकास मॉडल का पुनर्जन्म सिद्धांत है। यहाँ सड़कें भी मोक्ष नहीं पातीं। वे हर वर्ष पुनर्जन्म लेती हैं।
धीरे-धीरे मैंने समझ लिया कि जनता को टिकाऊ काम नहीं, तात्कालिक चमक चाहिए। यदि सड़क चिकनी दिख रही है तो कोई उसकी मोटाई नहीं पूछता। यदि भवन रंगीन है तो कोई नींव नहीं देखता। इसलिए हमने भी प्रस्तुति की कला सीख ली। उद्घाटन तक सब चमकाओ। उसके बाद अगला ठेका देखो। यही आधुनिक विकास का व्यवहारिक दर्शन है।
मुझे सबसे अधिक हास्य तब आता है जब नेता मंच से कहते हैं — “भ्रष्टाचार पर शून्य सहनशीलता।” उसी समय पीछे कोई फुसफुसा रहा होता है — “भाई साहब का प्रतिशत पहुँचा कि नहीं?” वाह लोकतंत्र! यहाँ ईमानदारी भाषण में रहती है और व्यवस्था व्यवहार में।
कॉकरोच गंदगी में जीवित रहता है। ठेकेदार समझौतों में। मुझे इंजीनियर से भी निभाना है, नेता से भी, अधिकारी से भी, स्थानीय दबंग से भी, मजदूर से भी। यदि सबको संतुष्ट रख लिया तो परियोजना सफल। निर्माण विज्ञान बाद में आता है, संबंध विज्ञान पहले। यही कारण है कि कई बार सबसे अच्छा अभियंता नहीं, सबसे अच्छा जुगाड़ू आदमी सफल ठेकेदार बनता है।
मुझे मजदूरों को देखकर कभी-कभी सचमुच शर्म आती है। धूप में जलते हुए, बारिश में भीगते हुए, आधी मजदूरी पर काम करते हुए वे लोग शहर खड़े करते हैं जिनमें रहने का अधिकार उन्हें कभी नहीं मिलता। मंच पर नेता कहता है — “देश निर्माण हो रहा है।” लेकिन देश वास्तव में उन मजदूरों की हड्डियों पर खड़ा होता है जिनका नाम कहीं दर्ज नहीं होता। मैं ठेकेदार हूँ, इसलिए सच जानता हूँ — सबसे सस्ता माल कई बार सीमेंट नहीं, इंसान होता है।
धीरे-धीरे निर्माण कार्य भी अभिनय बन चुका है। परियोजना शुरू होने से पहले मॉडल तैयार होता है। चित्र जारी होते हैं। विज्ञापन छपते हैं। जनता सपने देखने लगती है। फिर वर्षों तक काम चलता है। बीच में लागत बढ़ती है। फिर संशोधित स्वीकृति आती है। फिर समय सीमा बढ़ती है। अंत में जब काम पूरा होता है तो लागत इतनी बढ़ चुकी होती है कि जनता सोचती है — “इतने में तो नया शहर बन जाता।” लेकिन तब तक नया उद्घाटन तैयार हो चुका होता है।
मुझे सबसे अधिक हँसी “विश्वस्तरीय” शब्द पर आती है। हमारे देश में हर परियोजना विश्वस्तरीय होती है। विश्वस्तरीय सड़क। विश्वस्तरीय बस अड्डा। विश्वस्तरीय पार्क। फिर पहली बारिश आती है और विश्वस्तरीय गड्ढे पैदा हो जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमारे विकास की सबसे बड़ी दुश्मन मानसून नहीं, ईमानदारी है।
कॉकरोच की एक और विशेषता होती है कि वह हर दरार में छिप जाता है। ठेकेदार भी। राजनीति में ठेकेदार। शिक्षा में ठेकेदार। स्वास्थ्य में ठेकेदार। सफाई में ठेकेदार। यहाँ तक कि राष्ट्रभक्ति भी अब ठेके पर चलती दिखाई देती है। हर जगह कोई न कोई परियोजना है और हर परियोजना में कोई न कोई प्रतिशत।
मैं मानता हूँ कि अनेक ठेकेदार ईमानदारी से काम करते हैं। कई लोग सचमुच गुणवत्तापूर्ण निर्माण करना चाहते हैं। लेकिन पूरी व्यवस्था ऐसी बन चुकी है कि यदि कोई आदमी पूरी ईमानदारी से काम करे तो या तो घाटे में चला जाए या अगली बार उसे काम ही न मिले। यही इस तंत्र का सबसे बड़ा व्यंग्य है — भ्रष्टाचार केवल व्यक्ति का दोष नहीं, कई बार व्यवस्था का पुरस्कार बन जाता है।
आज मैं पूरी ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ — हाँ, मैं ठेकेदार के रूप में कॉकरोच हूँ। मैं धूल उड़ाती मशीनों, सीमेंट की गंध, फाइलों की स्वीकृतियों, कमीशनों की गर्मी और उद्घाटन समारोहों की चमक के बीच जीवित रहने वाला जीव हूँ। मैं हर सरकार के अनुसार अपना झंडा बदल लेता हूँ। मैं हर नियम में रास्ता खोज लेता हूँ। मैं हर टूटती सड़क में अगला अवसर देख लेता हूँ। और सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि मैं विकास के नाम पर निर्माण करता हूँ, जबकि भीतर-ही-भीतर जानता हूँ कि इस पूरे खेल में सबसे कमजोर नींव जनता के भरोसे की है।
रात में जब निर्माण स्थल खाली हो जाता है, अधूरा पुल अँधेरे में खड़ा रहता है, सीमेंट की बोरियाँ भीग रही होती हैं, मजदूर दूर झोपड़ियों में सो चुके होते हैं और मैं अगले भुगतान की गणना कर रहा होता हूँ — तब कभी-कभी सचमुच लगता है कि मैं इंसान नहीं रहा।
मैं इस महान विकासशील राष्ट्र की दरारों में पलता हुआ एक अनुभवी, टिकाऊ, अवसरवादी ठेकेदार कॉकरोच बन चुका हूँ।








