कमलेश पांडेय

भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा मूलतः “सर्वधर्म समभाव” और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में राजनीति के एक वर्ग ने इसे सामाजिक संतुलन के बजाय एक विशेष वर्ग के तुष्टीकरण के औजार के रूप में इस्तेमाल किया। इसका परिणाम यह हुआ कि धर्मनिरपेक्षता की मूल भावना धीरे-धीरे कमजोर होती गई और आम जनता के बीच इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।
आज स्थिति यह है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति करने वाले दलों का गठबंधन, जिसे ‘इंडिया गठबंधन’ के नाम से प्रस्तुत किया गया, खुद अपने ही बनाए नैरेटिव के जाल में उलझता नजर आ रहा है। यह गठबंधन वैचारिक स्पष्टता के बजाय विरोध की राजनीति पर ज्यादा केंद्रित दिखाई देता है, जिसके कारण जनता के बीच इसका संदेश प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मनिरपेक्षता का अत्यधिक राजनीतिकरण और उसका चयनात्मक उपयोग जनता को अब स्वीकार नहीं है। मतदाता अब केवल नारों या भावनात्मक अपील के बजाय ठोस विकास, सुशासन और पारदर्शिता को प्राथमिकता दे रहा है। यही कारण है कि कई राज्यों के चुनाव परिणामों में ऐसे दलों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा।
इसके विपरीत, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक पहचान और विकास के मुद्दों को केंद्र में रखने वाली राजनीति को अधिक समर्थन मिलता दिख रहा है। यह बदलाव केवल चुनावी रणनीति का परिणाम नहीं, बल्कि समाज के भीतर हो रहे व्यापक वैचारिक परिवर्तन का संकेत है।
‘इंडिया गठबंधन’ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी विचारधारा को स्पष्ट करे और धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परिभाषा को पुनः स्थापित करे। यदि यह गठबंधन केवल विरोध की राजनीति तक सीमित रहा, तो उसकी सियासी पकड़ और कमजोर हो सकती है।
अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय लोकतंत्र में अब वही विचार और राजनीति टिकेगी, जो जनता के वास्तविक मुद्दों और आकांक्षाओं के अनुरूप होगी—न कि केवल वैचारिक मृगतृष्णा के सहारे।








