महिला आरक्षण बिल अटका, प्रतिनिधित्व अब भी सीमित—“कोटा में कोटा” की बहस में क्या फिर खो गई बराबरी की आवाज?
गजेंद्र सिंह

17 अप्रैल 2026 , महिलाओं को आरक्षण देने से जुड़ा संवैधानिक संशोधन बिल संसद में पास ना हो सका । नारी शक्ति वंदन अधिनियम (128वाँ संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2023) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था । कहने को इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं जैसे परिसीमन की आवश्यकता, उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या के आधार पर सीटों का बंटवारा, और “कोटा में कोटा” की मांग लेकिन इन सभी तर्कों के बीच एक मूल सवाल कहीं खो जाता है । आज़ादी के 80 साल बाद भी महिला सिर्फ “महिला” नहीं है, कभी अनुसूचित जाति, कभी जनजाति, कभी पिछड़ा वर्ग, और सोशल मीडिया की सोच के अनुसार, वो सामान्य वर्ग से कम और इलीट क्लास अथवा गोरी चमड़ी की महिला है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम समाधान खोज रहे हैं या बहानों की एक नई परत गढ़ रहे हैं? सवाल यह भी है कि क्या हम महिलाओं को एक राजनीतिक नागरिक के रूप में देख रहे हैं या या सिर्फ पहचान के खांचों में बांटते हैं? अगर हर प्रतिनिधित्व नई श्रेणियों में बंटेगा, तो क्या लोकतंत्र और जटिल नहीं हो जाएगा?
यदि वर्तमान स्थिति देखें तो 18वीं लोकसभा के 543 सांसदों में से केवल 74 (लगभग 14%) महिलाएँ हैं, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि देश में महिला प्रतिनिधित्व सीमित है। ये महिला सांसद 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आई हैं जबकि केरल जैसे बड़े राज्य से एक भी महिला सांसद का निर्वाचित न होना इस असंतुलन को और उजागर करता है। दलगत दृष्टि से देखें तो भाजपा के सबसे अधिक 31 महिला सांसद हैं, इसके बाद कांग्रेस के 13 और तृणमूल कांग्रेस के 11 महिला सांसद हैं जो यह दिखाता है कि सभी प्रमुख दलों में महिला भागीदारी अभी भी सीमित दायरे में ही है। राष्ट्रीय दलों में भाजपा ने सबसे अधिक लगभग 16% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया। इसके बाद कांग्रेस और सीपीआई-एम ने लगभग 13-13% महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जबकि बसपा ने करीब 8% महिलाओं को टिकट दिया । वहीं आम आदमी पार्टी ने अपने 22 उम्मीदवारों में से किसी भी महिला को मौका नहीं दिया, जबकि एनपीपी ने अपने कुल 3 उम्मीदवारों में से 2 महिलाओं को चुनाव में उतारा, जो दलों के बीच महिला प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग प्राथमिकताओं को दर्शाता है ।
राज्य स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के 43,348 विश्लेषित उम्मीदवारों में से केवल 4,295 (लगभग 10%) महिला उम्मीदवार थीं जो चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं की सीमित भागीदारी को दर्शाता है। राज्यवार देखें तो ओडिशा (14%), दिल्ली (14%) और छत्तीसगढ़ (13%) में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत सबसे अधिक रहा जबकि नागालैंड (2%), अरुणाचल प्रदेश (5%) और जम्मू-कश्मीर (5%) में यह सबसे कम है। वहीं देशभर की विधानसभाओं में कुल 4,123 विधायकों में से केवल 390 (लगभग 9%) महिलाएँ हैं। दलगत स्तर पर भाजपा के सबसे अधिक 163 महिला विधायक हैं, इसके बाद कांग्रेस के 59 और तृणमूल कांग्रेस के 34 महिला विधायक हैं, जो यह स्पष्ट करता है कि समस्या व्यापक और संरचनात्मक है।
इसके विपरीत, भारत के पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान (1956), बांग्लादेश (1972) और नेपाल ने दशकों पहले ही महिला आरक्षण के प्रावधान लागू कर दिए थे जबकि वैश्विक स्तर पर अर्जेंटीना ने 1991 में 30% कोटा लागू कर महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाया । वर्ष 2026 तक वैश्विक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी लगभग 27.5% है, यानी हर चार सांसदों में केवल एक महिला है। कुछ देशों ने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है—रवांडा में लगभग 64%, क्यूबा में 57%, निकारागुआ में 55%, और मेक्सिको में करीब 50% महिलाएं संसद में हैं। विकसित देशों में स्वीडन (45%), फिनलैंड (45.5%) और न्यूज़ीलैंड (45.5%) भी उच्च स्तर का प्रतिनिधित्व दिखाते हैं। क्षेत्रीय रूप से, अमेरिका महाद्वीप में लगभग 35.6% महिलाओं की भागीदारी है जबकि मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में यह केवल लगभग 16% है। वहीं भारत में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 14% है जो वैश्विक औसत से काफी कम है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि जिन देशों में आरक्षण या कोटा जैसी नीतियां लागू हैं, वहां महिलाओं की भागीदारी अधिक है जबकि अन्य देशों में अभी भी समानता हासिल करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है ।
दिलचस्प बात यह है कि भारत ने 1992 में पंचायत स्तर पर 33% (कई राज्यों में 50%) आरक्षण लागू कर एक सफल मॉडल प्रस्तुत किया लेकिन जमीनी स्तर पर “सरपंच पति”, “प्रधान पति” और “प्रमुख पति” जैसी प्रवृत्तियाँ आज भी देखने को मिलती हैं, जहाँ निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर उनके परिजन वास्तविक निर्णय लेते हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि करीब 30–35 वर्षों के अनुभव के बाद क्या सरकारों ने इस व्यवस्था की गंभीर समीक्षा की ?महिला आरक्षण ने लाखों महिलाओं को राजनीति में प्रवेश का अवसर दिया और उनकी नेतृत्व क्षमता भी विकसित हुई लेकिन इसके साथ “प्रॉक्सी नेतृत्व” की समस्या भी उभरकर सामने आई, जहाँ वास्तविक निर्णय निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के बजाय उनके परिजन लेते हैं । इस चुनौती को दूर करने के लिए प्रयास पूरे देश में न तो एक समान रहे और न ही पर्याप्त प्रभावी साबित हो सके ।
जहाँ तक कांग्रेस का सवाल है, उसने लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए महिला आरक्षण पर पहल तो की लेकिन इसे लागू करने में निर्णायक कदम नहीं उठा सकी। उदाहरण के तौर पर 1996 में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया जिसके बाद 1998, 1999 और 2008 में भी इसे लाने की कोशिश हुई । 2010 में राज्यसभा ने इसे पारित भी किया लेकिन लोकसभा में यह लंबित रह गया और कानून नहीं बन सका। यह उस दौर में हुआ जब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में थी। इसके अलावा, 1996 को जब देवेगौड़ा सरकार ने यह बिल पेश किया, तो यह तीखी बहस का मुद्दा बन गया। कई पुरुष सांसदों ने यह सवाल उठाया कि क्या आरक्षण से “सक्षम महिलाएँ” आ पाएंगी । कुछ सांसदों ने बिल के अंदर ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए कोटा न होने का हवाला देकर इसका विरोध किया । अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान, जब 13 जुलाई 1998 को तत्कालीन कानून मंत्री एम. थंबीदुरई बिल पेश करने के लिए उठे तो राजद और सपा के सांसदों ने कड़ा विरोध किया । एक सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने स्पीकर जीएमसी बालयोगी से बिल की कॉपी छीनकर उसे फाड़ दिया।
“कोटा में कोटा” की अवधारणा, यानी महिला आरक्षण के भीतर पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वर्गों के लिए अलग उप-कोटा, व्यवहार में जितनी न्यायसंगत लगती है, उतनी ही जटिल और लागू करने में बाधक भी साबित होती है। इसके साथ ही, महिला आरक्षण को बार-बार “कोटा में कोटा” की बहस में उलझाया गया—जिसके कारण विधेयक पर सहमति बनना कठिन होता गया। नतीजतन, एक ऐसा विधेयक जो व्यापक सहमति से पास हो सकता था, वह दशकों तक टलता रहा।
इसके अलावा, वैश्विक अनुभव भी यही दिखाता है कि अधिकांश देशों ने महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए सीधे और स्पष्ट जेंडर कोटा अपनाया, न कि उसके भीतर बहु-स्तरीय वर्गीय विभाजन किया । इसके विपरीत भारत में “कोटा में कोटा” की बहस ने कई बार मूल महिला आरक्षण को ही टालने का काम किया है, जिससे नीति का उद्देश्य कमजोर हुआ है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि यह मुद्दा केवल सामाजिक न्याय का नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन गया है, जहाँ जटिलता बढ़ाकर निर्णय को आगे बढ़ाने के बजाय रोका जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या “कोटा में कोटा” वास्तव में समाधान है, या फिर यह महिला प्रतिनिधित्व को टालने का एक परोक्ष माध्यम बनता जा रहा है।








