ऋषि प्रकाश कौशिक
गुरुग्राम – राजनीति सच में एक विचित्र कला है—जहाँ शब्दों से महल खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अक्सर एक झोपड़ी तक नहीं बचा पाती। इन दिनों “नारी वंदन” का शंखनाद पूरे देश में गूंज रहा है। मंच सज रहे हैं, भाषणों में तेज़ी है, और नारों में नारी को देवी का दर्जा दिया जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वंदन केवल मंचों तक सीमित है?
ज़रा इन सजी-धजी सभाओं से उतरकर हकीकत की धरती पर आइए—पंचकूला की गलियों में, जहाँ वही “देवी” चुनावी मैदान में खड़ी है। कांग्रेस ने मेयर पद के लिए सुधा भारद्वाज को उम्मीदवार बनाया है, वहीं बीजेपी ने उनके सामने श्यामलाल बंसल को उतारा है। अब यह तय करना जनता के लिए आसान नहीं रह गया कि यह वास्तव में नारी वंदन है या नारी की परीक्षा।
एक तरफ़ नारी वंदन बिल को लेकर विपक्ष और इंडी गठबंधन पर असफलता का ठीकरा फोड़ा जा रहा है, और दूसरी तरफ़ उसी विचारधारा के झंडाबरदार अपने ही निर्णयों से उस विचार को चुनौती देते नज़र आते हैं।
प्रधानमंत्री देशभर में महिला सशक्तिकरण की बात कर रहे हैं, महिला कार्यकर्ताओं को “धार” देने की बात कही जा रही है—उन्हें आगे बढ़ाने, नेतृत्व देने और निर्णय की धुरी बनाने का संदेश दिया जा रहा है। लेकिन जब बात ज़मीनी राजनीति की आती है, तो वही धार कहीं कुंद होती दिखती है।
बीजेपी के कुछ कार्यकर्ता खुद स्वीकार करते हैं—“यह राजनीति है साहब, यहाँ कथनी और करनी का रिश्ता उतना ही कमजोर होता है, जितना चुनावी वादों का।”
तो क्या नारी वंदन सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है?
क्या महिला सशक्तिकरण केवल भाषणों की शोभा है?
या फिर यह एक ऐसा आदर्श है, जिसे अभी भी ज़मीनी हकीकत बनने में लंबा समय लगेगा?
आज असली सवाल जनता के सामने है—
क्या वह नारों के उजाले में सच को पहचान पाएगी,
या फिर भाषणों की चकाचौंध में वास्तविकता धुंधली ही रह जाएगी?
क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ शब्द नहीं, निर्णय भी बोलते हैं—और वही इतिहास लिखते हैं।








