एनसीआर में मजदूर आंदोलन : किसके पक्ष में खड़ी है भाजपा सरकार?

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जायज मांगों पर संघर्ष तेज़, श्रम कानूनों के लागू न होने से बढ़ा असंतोष

: संजय पराते

नोएडा, दिल्ली और एनसीआर के सटे हुए औद्योगिक क्षेत्रों में इन दिनों मजदूरों का आंदोलन तेज़ हो गया है। हजारों फैक्टरियों और कंपनियों में काम करने वाले लाखों मजदूर न्यूनतम मजदूरी, समय पर वेतन, अतिरिक्त काम के उचित भुगतान और छुट्टियों के अधिकार जैसी बुनियादी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं। हरियाणा से उठी यह आवाज अब पूरे एनसीआर में फैल चुकी है।

चिंता का विषय यह है कि इन जायज मांगों पर संवाद की बजाय पुलिस सख्ती का सहारा लिया जा रहा है, जिससे कई स्थानों पर तनाव, हिंसा और आगजनी की घटनाएं सामने आई हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि सरकार आखिर किसके पक्ष में खड़ी है।

मजदूरों की मांगों पर नजर डालें तो इनमें कुछ भी असामान्य नहीं है। न्यूनतम मजदूरी, ओवरटाइम का भुगतान, समय पर वेतन और निर्धारित छुट्टियां—ये सभी अधिकार भारतीय श्रम कानूनों और नई श्रम संहिताओं में पहले से ही दर्ज हैं। फिर सवाल उठता है कि इन अधिकारों को पाने के लिए मजदूरों को आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?

असल समस्या कानून बनाने में नहीं, बल्कि उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति में है। जैसा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था—संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाली व्यवस्था कमजोर या पक्षपाती है, तो वह प्रभावी नहीं हो सकता। आज की स्थिति कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है।

पिछले वर्षों में यह आरोप लगातार उठते रहे हैं कि सरकार की नीतियां कॉरपोरेट हितों की ओर अधिक झुकी हुई हैं। मजदूरों का कहना है कि घोषित न्यूनतम मजदूरी भी उन्हें पूरी नहीं मिलती, वेतन स्लिप नहीं दी जाती, और 8 घंटे की मजदूरी पर 10–12 घंटे काम कराया जाता है।

नई श्रम संहिताओं में जहां काम के घंटों और ओवरटाइम के स्पष्ट प्रावधान हैं, वहीं जमीनी हकीकत इससे उलट दिखाई देती है। काम के घंटे बढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन उसके अनुरूप भुगतान और सुविधाएं नहीं दी जा रहीं। छुट्टियों के प्रावधान भी कागजों तक सीमित हैं।

वर्तमान में कई राज्यों में मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी 12 से 15 हजार रुपये के बीच है, जबकि वास्तविक भुगतान इससे भी कम होता है। इस आय में एक मजदूर को अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण करना पड़ता है—किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और परिवहन जैसे बुनियादी खर्चों के साथ।

सरकारी समितियां और विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आज के समय में एक परिवार के सम्मानजनक जीवन के लिए कम से कम 25 से 30 हजार रुपये मासिक आय आवश्यक है। ऐसे में मजदूरों की मांगें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा से जुड़ी हुई हैं।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब उद्योगों और कॉरपोरेट कंपनियों के मुनाफे लगातार बढ़ रहे हैं, तो मजदूरों की मजदूरी उसी अनुपात में क्यों नहीं बढ़ रही? और जब मजदूर अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो उनके आंदोलनों को देशविरोधी या उग्र बताने की कोशिश क्यों की जाती है?

सरकार को स्पष्ट करना होगा कि वह श्रम कानूनों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रही और इसके बजाय आंदोलनों को दबाने का रास्ता क्यों चुन रही है।

यह आंदोलन केवल मजदूरी का नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं का सवाल बन चुका है—क्या सरकार मजदूरों के साथ खड़ी है या पूंजी के साथ?

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Author: Bharat Sarathi

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