ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही का दावा—महिला आरक्षण पहले ही संविधान का हिस्सा,
भाजपा चुनावी लाभ के लिए कर रही इस्तेमाल; परिसीमन और सीट बढ़ोतरी पर भी उठाए सवाल
रेवाडी, 16 अप्रैल 2026। स्वयंसेवी संस्था ‘ग्रामीण भारत’ के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने भाजपा पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” के नाम पर महिलाओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित कर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में वोट बटोरने की कोशिश की जा रही है।
विद्रोही ने कहा कि वास्तविकता यह है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला कानून वर्ष 2024 में पारित होकर संविधान का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में पहले से मौजूद आरक्षण को लेकर भाजपा द्वारा प्रचार करना केवल वोट बैंक की राजनीति है।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा महिला आरक्षण के मुद्दे को आगे बढ़ाकर लोकसभा सीटों में मनमानी बढ़ोतरी और परिसीमन के जरिए सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। विद्रोही के अनुसार, “कटु सत्य यह है कि महिला आरक्षण के नाम पर लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर लगभग 850 करने की योजना के जरिए भाजपा अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजनीतिक संतुलन अपने पक्ष में करना चाहती है।”
उन्होंने यह भी कहा कि यदि केंद्र सरकार वास्तव में महिला आरक्षण को लेकर गंभीर होती, तो 2024 में कानून पारित करते समय इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाता। वर्तमान 543 सदस्यीय लोकसभा में करीब 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जा सकती थीं, लेकिन इसे 2029 तक टालना सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है।
विद्रोही ने याद दिलाया कि जब महिला आरक्षण विधेयक संसद में पारित हो रहा था, तब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने बिना शर्त तत्काल आरक्षण लागू करने की मांग की थी। साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए भी समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का सुझाव दिया था। हालांकि, सरकार ने इन सुझावों को स्वीकार नहीं किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार कथनी और करनी में अंतर रखने वाली सरकार है, जो महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है। विद्रोही के अनुसार, “यह रणनीति लोकतंत्र को कमजोर करने वाली है और भविष्य में सत्ता पर कब्जा बनाए रखने के लिए षड्यंत्रात्मक कदम उठाए जा रहे हैं।”
अंत में उन्होंने सवाल उठाया कि जब महिला आरक्षण कानून पहले ही लागू है, तो फिर इसे तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनावों में मुद्दा बनाकर महिलाओं के वोट हासिल करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है।








