व्यंग्यात्मक लेख : एक नया बार्टर सिस्टम

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विश्व दीपक त्रिखा

सोशल मीडिया का अपना ही संसार है। यहाँ लोग अपनी प्रोफाइल पर जो लिखते हैं, वही उनका परिचय बन जाता है। एक दिन यूँ ही फेसबुक देखते-देखते मेरी नज़र एक नाम पर अटक गई— “नाट्य भूषण अशोक कुमार”। मैंने सोचा, अच्छा है, देश में प्रतिभाओं को सम्मान मिल रहा है। दूसरे दिन फिर देखा— “हरियाणा गौरव अशोक कुमार”। तीसरे दिन मामला और दिलचस्प हो गया— “राष्ट्रीय गौरव अशोक कुमार”।

अब मेरी जिज्ञासा स्वाभाविक थी। मैं ठहरा थोड़ा छेड़खानी स्वभाव का आदमी। सो मैंने एक-एक कर तीनों सज्जनों को फोन कर ही लिया।

पहले भाई साहब से पूछा— “ये नाट्य भूषण क्या है?”
उन्होंने बड़े गर्व से बताया— “सर, हमें इस अवॉर्ड से नवाज़ा गया है।”
मैंने पूछा— “जैसे पद्म भूषण होता है, वैसे?”
वे बोले— “जी, बिल्कुल वैसा ही।”
मैंने फिर पूछा— “तो केंद्र सरकार ने दिया होगा?”
उत्तर मिला— “नहीं सर, भिलाई की एक बहुत बड़ी संस्था है, उन्होंने दिया है।”

मैंने फोन रखा और सोचा— अच्छा, अब सम्मान भी स्थानीय स्तर पर राष्ट्रीय भाव के साथ मिलने लगे हैं।

दूसरे सज्जन से पूछा— “हरियाणा गौरव अवॉर्ड मिला है?”
वे बोले— “जी सर।”
मैंने सहज पूछा— “तो हरियाणा सरकार ने दिया होगा?”
उन्होंने कहा— “नहीं सर, सिरसा की एक संस्था है। हर साल देती है।”
मैंने पूछा— “कोई सरकारी मान्यता? नौकरी में वरीयता? रेल में कंसेशन?”
वे बोले— “नहीं सर, ऐसा कुछ नहीं।”

अब तीसरे सज्जन की बारी थी। उन्होंने बताया कि उन्हें “राष्ट्रीय गौरव” से सम्मानित किया गया है।
“कितने लोगों को दिया गया?” मैंने पूछा।
“पूरे भारत से 78 लोग थे।”
“कितने साल से दे रहे हैं?”
“लगभग 20 साल से।”

मैंने मन ही मन हिसाब लगाया— अब तक करीब 1500 लोग तो ‘राष्ट्रीय गौरव’ बन चुके होंगे।
“सरकार कोई सुविधा देती है?”
“नहीं सर।”

यहीं से मेरे मन में प्रश्न उठने लगे। आखिर इन अवॉर्ड्स की अहमियत क्या है? नाम के आगे इन्हें जोड़ने का औचित्य क्या है? यदि कोई उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान जैसा महान कलाकार हो और उसे कोई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय सम्मान मिला हो, या संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार मिला हो, तब तो समझ आता है। वह सम्मान वर्षों की साधना का परिणाम होता है, जिसकी सामाजिक और सांस्कृतिक स्वीकृति होती है।

पर यहाँ तो हर शहर में एक संस्था है, हर संस्था के पास एक ट्रॉफी है, और हर ट्रॉफी के पीछे एक फोटो और एक सोशल मीडिया पोस्ट है।

इसी प्रसंग ने मुझे एक पुरानी घटना याद दिला दी। एक सज्जन मेरे पास आए और बोले— “सर, आप नाटक के क्षेत्र में अद्भुत काम कर रहे हैं। हम आपको ‘टी-री खान अवॉर्ड’ से सम्मानित करना चाहते हैं।”
मैंने पूछा— “ये कौन सा अवॉर्ड है?”
वे बोले— “सर, हमने डिजाइन किया है, स्पेशल आपके लिए।”

फिर उन्होंने धीरे से असली बात कही— “तीन-चार महीने बाद आप हमें ‘फन्नेखान थिएटर अवॉर्ड’ दे दीजिएगा। आपका भी नाम हो जाएगा, हमारा भी।”

मैंने कहा— “लोग क्या कहेंगे?”
वे मुस्कुराए— “सर, लोग क्या कहेंगे? इस हमाम में सब नंगे हैं। कोई किसी को दे रहा है, कोई किसी से ले रहा है। यही सिस्टम है।”

उस दिन मुझे पहली बार समझ आया कि यह सम्मान नहीं, विनिमय है। यह साधना का पुरस्कार नहीं, बल्कि अहंकार की संतुष्टि का माध्यम है। यह एक आधुनिक “बार्टर सिस्टम” है— तू मुझे दे, मैं तुझे दूँ।

पहले के समय में लोग वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। अब लोग उपाधियों का आदान-प्रदान कर रहे हैं। पहले अनाज के बदले कपड़ा मिलता था, अब अवॉर्ड के बदले अवॉर्ड मिलता है।

सम्मान की असली पहचान प्रमाणपत्र से नहीं, समाज की स्वीकृति से होती है। वह तब मिलता है जब लोग बिना लिखे आपके नाम के साथ सम्मान जोड़ दें। असली गौरव वह है जो कार्य से कमाया जाए, न कि ट्रॉफी से चिपकाया जाए।

आज हर गली में एक “राष्ट्रीय” संस्था है, हर मंच पर एक “गौरव” है, और हर प्रोफाइल पर एक “भूषण”। पर प्रश्न वही है— क्या यह सचमुच सम्मान है, या केवल आत्मतुष्टि का व्यापार?

जब तक हम सम्मान को साधना की जगह सजावट समझते रहेंगे, तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा।
तू मेरे को दे, मैं तेरे को दूँ—
और यूँ ही चलता रहेगा…

अवॉर्ड : एक नया बार्टर सिस्टम।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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