नगर निगम गुरुग्राम कार्यालय में सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट की तरफ से एक दिवसीय प्रशिक्षण हुआ आयोजित
एनसीएपी के तहत शहरों में धूल नियंत्रण और रीसाइक्लिंग मॉडल पर विशेष रिपोर्ट

गुरुग्राम, 12 फ़रवरी। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और निर्माण गतिविधियों के बीच निर्माण एवं ध्वस्तीकरण (सीएंडडी) वेस्ट और उससे उत्पन्न धूल प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बनकर उभरे हैं। ड्राइविंग क्लीन एयर – एक्शन अंडर एनसीएपी अध्ययन में विभिन्न भारतीय शहरों की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन और धूल नियंत्रण को सुदृढ़ किए बिना स्वच्छ वायु का लक्ष्य हासिल करना संभव नहीं है।
इस विषय को लेकर नगर निगम गुरुग्राम कार्यालय में सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट की तरफ से एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें निगम अधिकारियों को सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन और धूल नियंत्रण के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
क्यों चिंता का विषय है सीएंडडी वेस्ट और धूल
विशेषज्ञों ने बताया कि दिल्लीएनसीआर में पीएम10 प्रदूषण का लगभग 42% हिस्सा सड़क, मिट्टी और निर्माण से जुड़ी धूल से आता है। निर्माण क्षेत्र वैश्विक संसाधनों का 40–50% उपभोग करता है। यदि वेस्ट का वैज्ञानिक निस्तारण न हो तो यह जलाशयों के अवरुद्ध होने, शहरी बाढ़, भूमि अस्थिरता और हरित क्षेत्र में कमी का कारण बनता है। लगभग 80–90% सीएंडडी वेस्ट को पुनर्चक्रित कर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।अध्ययन के अनुसार, यदि निर्माण स्थलों पर सड़क प्रबंधन, सामग्री हैंडलिंग और विंड बैरियर जैसे उपाय अपनाए जाएं तो पीएम10 उत्सर्जन में 64% से 79% तक कमी संभव है।
नीतिगत पहल: 2014 से 2025 तक का सफर
प्रशिक्षण कार्यक्रम में बताया गया कि सरकार द्वारा वर्ष 2016 में C&D वेस्ट मैनेजमेंट नियम अधिसूचित किए गए। इसके बाद वर्ष 2019 में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) की शुरुआत हुई। वर्ष 2021 में स्वच्छ भारत मिशन 2.0 में सीएंडडी अपशिष्ट प्रबंधन पर जोर दिया गया तथा वर्ष 2023 के स्वच्छ सर्वेक्षण में 120 अंक सीएंडडी प्रबंधन के लिए निर्धारित किए गए। इसके साथ ही वर्ष 2025 में कड़े डिजिटल ट्रैकिंग और विस्तारित उत्पादक दायित्व (ईपीआर) प्रावधान लागू हुए। इन पहलों का उद्देश्य वेस्ट की वैज्ञानिक प्रोसेसिंग, धूल नियंत्रण और पुनर्चक्रित उत्पादों के उपयोग को अनिवार्य बनाना है।
विभिन्न शहरों के श्रेष्ठ मॉडल की दी जानकारी
प्रशिक्षण कार्यक्रम में दिल्ली के इकोसिस्टम आधारित मॉडल के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया कि वर्ष 2009 में 500 टन प्रतिदिन क्षमता का देश का पहला सीएंडडी रीसाइक्लिंग प्लांट बुराड़ी में स्थापित किया गया। वर्तमान में दिल्ली में कुल 5150 टीपीडी क्षमता के 5 संयंत्र, 132 कलेक्शन प्वाइंट और रंग-कोडेड स्किप सिस्टम चल रहे हैं। जीएनसीटीडी द्वारा 2%–10% तक पुनर्चक्रित सामग्री का अनिवार्य उपयोग किया गया है। दिल्ली मॉडल लगभग दो दशकों की नीतिगत निरंतरता और कानूनी हस्तक्षेप का परिणाम है। इसके अतिरिक्त चण्डीगढ़, हैदराबाद, पिंपडी चिंचवाड़, नोएडा आदि के मॉडल के बारे में भी जानकारी दी गई।
विशेषज्ञों ने बताया कि देश में 35 से अधिक सीएंडडी रीसाइक्लिंग संयंत्र हैं। इसके अतिरिक्त कई शहरों में अब भी अपशिष्ट का आकलन, बायलॉज, और पुनर्चक्रित उत्पादों की मांग सुनिश्चित करने में कमी है तथा दीर्घकालिक समाधान के बजाय कई स्थानों पर अल्पकालिक उपकरणों पर खर्च की प्रवृत्ति है।
अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया है कि एक समग्र इकोसिस्टम दृष्टिकोण—जिसमें बायलॉज, शुल्क संरचना, संग्रहण तंत्र, प्रोसेसिंग क्षमता और पुनर्चक्रित उत्पादों की अनिवार्य मांग शामिल हो, वही टिकाऊ समाधान दे सकता है।
सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन केवल कचरा निस्तारण का विषय नहीं, बल्कि यह स्वच्छ वायु, संसाधन दक्षता और जलवायु संरक्षण से सीधे जुड़ा मुद्दा है। यदि शहर दिल्ली, चंडीगढ़, हैदराबाद और पिंपरी-चिंचवड जैसे मॉडल अपनाते हैं, तो 40% तक कार्बन उत्सर्जन में कमी और धूल प्रदूषण में उल्लेखनीय गिरावट संभव है। स्वच्छ और टिकाऊ शहरों की दिशा में सीएंडडी वेस्ट प्रबंधन अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।
अतिरिक्त निगमायुक्त यश जालुका ने सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट के विशेषज्ञों का धन्यवाद करते हुए कहा कि नगर निगम गुरुग्राम सीएंडडी वेस्ट के वैज्ञानिक प्रबंधन और धूल नियंत्रण के लिए ठोस रणनीति अपनाएगा तथा प्रशिक्षण से प्राप्त सुझावों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।





