महाशिवरात्रि : चेतना के शिखर पर जीवन के रूपांतरण का महापर्व

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उमेश कुमार साहू

भारतीय मनीषा में महाशिवरात्रि केवल पंचांग की एक तिथि नहीं बल्कि चेतना के ऊर्ध्वगमन की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक घटना है। जब फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी की गहन कालिमा अपने चरम पर होती है, तब ब्रह्मांड का हर कण उस ‘महाशून्य’ की ओर झुकता है जिसे हम ‘शिव’ कहते हैं। यह पर्व शिव की पूजा मात्र नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर छिपे ‘शिवत्व’ की खोज है, एक ऐसी यात्रा जो हमें खंडित व्यक्तित्व से अखंड बोध की ओर ले जाती है।

शून्य की पूर्णता : जहाँ अंत और आदि एक हैं

विज्ञान कहता है कि ब्रह्मांड का अधिकांश हिस्सा ‘अस्तित्वहीन रिक्तता’ है, जिसे हम डार्क मैटर या डार्क एनर्जी के करीब मान सकते हैं। अध्यात्म उसी रिक्तता को ‘शिव’ कहता है। ‘शिव’ का शाब्दिक अर्थ ही है – ‘वह जो नहीं है’। महाशिवरात्रि उस रिक्तता का उत्सव है। आज का मनुष्य ‘संग्रह’ और ‘होने’ की अंधी दौड़ में इतना थक चुका है कि वह ‘रिक्त’ होने का आनंद भूल गया है। शिव हमें सिखाते हैं कि जब तक आप भीतर से खाली (शून्य) नहीं होंगे, तब तक ईश्वरत्व की पूर्णता आपमें नहीं भर पाएगी। यह पर्व अहंकार के विसर्जन से अस्तित्व के विराट उत्सव तक पहुँचने का सेतु है।

विज्ञान और नटराज : ब्रह्मांडीय नृत्य का भौतिकी

आधुनिक भौतिकी और शिव के नृत्य में गहरा संबंध है। विश्व की सबसे बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला ‘सर्न’ (CERN) के बाहर नटराज की विशाल प्रतिमा का होना कोई संयोग नहीं है। वैज्ञानिकों ने माना है कि ब्रह्मांडीय कणों का सृजन और विनाश (Creation and Destruction of subatomic particles) ठीक उसी लय में होता है जैसे शिव का तांडव। महाशिवरात्रि हमें याद दिलाती है कि यह संसार स्थिर नहीं है, बल्कि एक निरंतर ऊर्जा का कंपन है। शिव का डमरू उस ‘बिग बैंग’ की ध्वनि है जिससे सृष्टि का विस्तार हुआ। जब हम शिवरात्रि की रात जागते हैं, तो हम ब्रह्मांड की इसी मौलिक ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास करते हैं।

विषपायी नायक : उत्तरदायित्व का सर्वोच्च मानक

शिव का ‘नीलकंठ’ स्वरूप आज के कॉरपोरेट और सामाजिक नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा पाठ है। समुद्र मंथन से उत्पन्न विष को पीना पलायन नहीं, बल्कि एक सजग चुनाव था। शिव सिखाते हैं कि जो समाज के विष (बुराई, द्वेष, संकट) को पीकर उसे अपने भीतर रूपांतरित करने का साहस रखता है, वही महादेव कहलाने का अधिकारी है। आज जब हर व्यक्ति सुख के अमृत की ओर भाग रहा है और दुखों का विष दूसरों पर उगल रहा है, तब शिव का संयम हमें यह प्रश्न करने पर विवश करता है – “क्या हम अपने हिस्से की कड़वाहट पीकर दुनिया को थोड़ी मिठास दे पा रहे हैं?”

अर्धनारीश्वर : संतुलन की आदिम आचार संहिता

शिव और शक्ति का मिलन केवल दो देहों का संगम नहीं, बल्कि पुरुषत्व और स्त्रीत्व के पूर्ण संतुलन का प्रतीक है। शिव ‘महायोगी’ होकर भी ‘महागृहस्थ’ हैं। एक ओर वे श्मशान की भस्म में वैराग्य ढूंढते हैं, तो दूसरी ओर हिमालय की चोटियों पर पार्वती के साथ गृहस्थी का धर्म निभाते हैं। उनका परिवार, जहाँ सिंह और बैल, मोर और सर्प जैसे घोर विरोधी स्वभाव एक साथ रहते हैं, इस बात का प्रमाण है कि विविधता का सम्मान ही शांति का एकमात्र मार्ग है। आज के विघटित होते परिवारों के लिए शिव का ‘मैनेजमेंट’ अनिवार्य है।

 तीसरी आँख : अंतर्ज्ञान और विवेक का जागरण

शिव का तीसरा नेत्र कोई चर्म-चक्षु नहीं, बल्कि ‘अन्तर्दृष्टि’ (Insight) है। जीव विज्ञान की दृष्टि से इसे ‘पीनियल ग्लैंड’ (Pineal Gland) से जोड़ा जाता है, जो हमारे मस्तिष्क के केंद्र में स्थित है और बोध का द्वार मानी जाती है। जब हम बाहरी दुनिया के आकर्षणों से अपनी आँखें बंद करते हैं, तभी विवेक की तीसरी आँख खुलती है। महाशिवरात्रि वह रात है जब हम काम (वासना) को भस्म करके ज्ञान के प्रकाश में कदम रखते हैं। यह आँख हमें बताती है कि जो दिखता है वह हमेशा सत्य नहीं होता, सत्य वह है जिसे केवल चेतना से महसूस किया जा सके।

उपवास और जागरण : देह से चेतना की ओर

अक्सर हम महाशिवरात्रि को केवल भूखे रहने और रात भर जागने तक सीमित कर देते हैं। परंतु, ‘उपवास’ का वास्तविक अर्थ है – ‘उप’ (निकट) और ‘वास’ (बैठना), यानी अपनी आत्मा के निकट बैठना। ‘जागरण’ का अर्थ केवल नींद का त्याग नहीं, बल्कि अज्ञान की तंद्रा से जागना है। यह रात रीढ़ की हड्डी को सीधी रखकर बैठने का विधान इसलिए देती है क्योंकि प्राकृतिक रूप से इस दिन ऊर्जा का प्रवाह ऊपर की ओर होता है। यह दिन मोबाइल की स्क्रीन से हटकर अपनी अंतरात्मा के ‘नोटिफिकेशन’ पढ़ने का है।

शिव और प्रकृति : पर्यावरण का आदि दर्शन

गंगा को जटा में धारण करना, मस्तक पर चंद्रमा का शीतल लेप और शरीर पर पशु चर्म – शिव प्रकृति के आदि संरक्षक हैं। वे बताते हैं कि ईश्वर पहाड़ों के एकांत और नदियों की धारा में है। आज जब हम जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहे हैं, तब शिव की पूजा का अर्थ केवल शिवलिंग पर जल चढ़ाना नहीं, बल्कि नदियों को प्रदूषण मुक्त रखना और पहाड़ों की शुचिता बचाना होना चाहिए। प्रकृति की रक्षा ही शिव की वास्तविक आराधना है।

निष्कर्ष : ‘स्व’ से ‘सर्व’ की ओर

महाशिवरात्रि हमें आत्ममंथन की उस ऊँचाई पर ले जाती है जहाँ ‘मैं’ मरता है और ‘हम’ जन्म लेते हैं। यह पर्व हमें निर्भय होने का संदेश देता है क्योंकि जो काल (समय) का भी महाकाल है, उसका भक्त मृत्यु से कैसा डरे? इस वर्ष की महाशिवरात्रि पर हमारा संकल्प केवल अनुष्ठान तक न रहे। हम अपने भीतर के ‘विष’ को त्यागें, ‘संयम’ को आभूषण बनाएँ और जीवन में ‘संतुलन’ की स्थापना करें। जब हमारे भीतर करुणा का जल बहेगा और विवेक की तीसरी आँख खुलेगी, तभी समझना चाहिए कि हमारे जीवन में महाशिवरात्रि का आगमन हुआ है।

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Author: Bharat Sarathi

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